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उत्तराखंड में जलस्रोत पर गंभीर संकट

12/02/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जल ही जीवन है कहते हम थकते नहीं मगर जल बचाने के लिए कुछ करते धरते भी नहीं। शायद यह सोचकर चुप बैठ जाते है कि मेरा पडोसी जल बचाएगा मुझे क्या जरुरत है। हमारी यही धकियानुसी सोच हमें बबार्दी की और ले जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब हमारे प्यासे मरने की नौबत आ जाएगी। तब तक बहुत देर हो जाएगी। भारत सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग की माने तो देश इस समय भीषण जल संकट से गुजर रहा है और इस आसन्न संकट पर जल्द काबू नहीं पाया गया तो हालत बदतर होने की सम्भावना है। नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार भारत अब तक के सबसे बड़े जल संकट से जूझ रहा है। आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के करीब 60 करोड़ लोग पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। करीब 75 प्रतिशत घरों में पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। साथ ही, देश में करीब 70 प्रतिशत पानी पीने लायक नहीं है। आयोग का कहना है कि इस संकट के चलते लाखों लोगों की आजीविका और जिंदगी खतरे में है। आयोग ने चेतावनी भी दी है कि हालात और बदतर होने वाले हैं। उसके मुताबिक साल 2030 तक देश में पानी की मांग मौजूदा आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है। साफ और सुरक्षित पानी नहीं मिलने की वजह से हर साल करीब दो लाख लोगों की मौत होती है। रिपोर्ट में कहा गया है प्रदूषण के मुद्दे पर लोगों को जागरूक करने के लिए जिस तरह मीडिया कैंपेन चलाए गए हैं, समय आ गया है कि पानी के मुद्दे पर भी उसी तरह कैंपेन चलाए जाएं । गौरतलब है जल गुणवत्ता सूचकांक में भारत दुनिया के 122 देशों में 120वें स्थान पर है।जल की उपलब्धता को लेकर वर्तमान में भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व चिन्तित है। जल ही जीवन है। जल के बिना सृष्टि की कल्पना नहीं की जा सकती। मानव का अस्तित्व जल पर निर्भर करता है। पृथ्वी पर कुल जल का अढ़ाई प्रतिशत भाग ही पीने के योग्य है। इनमें से 89 प्रतिशत पानी कृषि कार्यों एवं 6 प्रतिशत पानी उद्योग कार्यों पर खर्च हो जाता है। शेष 5 प्रतिशत पानी ही पेयजल पर खर्च होता है। यही जल हमारी जिन्दगानी को संवारता हैआँकड़े बताते हैं कि विश्व के पौने 2 अरब लोगों को पीने का शुद्ध पानी नहीं मिल रहा है। आज विश्व में जल का संकट सर्वत्र व्याप्त है। विश्व में चहुंमुखी विकास का दिग्दर्शन हो रहा है। किंतु स्वच्छ जल मिल पाना कठिन हो रहा है। साफ जल की अनुपलब्धता के चलते ही जल जनित रोग महामारी का रूप ले रहे हैं। इंसान जल की महत्ता को लगातार भूलता गया और उसे बर्बाद करता रहा, जिसके फलस्वरूप आज जल संकट सबके सामने है। देश के कई हिस्सों में अभी से जबरदस्त जल संकट गहरा गया है। जनसंख्या के भारी विस्फोट के साथ कल-कारखाने, उद्योगीकरण और पशुपालन को बढ़ावा दिया गया, उस अनुपात में जल संरक्षण की ओर ध्यान नहीं गया, जिस कारण आज गिरता जल स्तर बेहद चिंता का कारण बना हुआ है। एक रपट में बताया गया है कि पृथ्वी के जलमण्डल का 97.5 प्रतिशत भाग समुद्रों में खारे जल के रूप में है और केवल 2.4 प्रतिशत ही मीठा पानी है । यूएचओ के अनुसार, भारत में लगभग सत्तानवे लाख लोगों को पीने के पानी के स्वच्छ स्रोत प्राप्त नहीं है। यदि यह आंकड़ा सही है तो यह हमारे लिए बेहद दुखदाई और कष्टकारी है। धरती प्यासी है और जल प्रबंधन के लिए कोई ठोस प्रभावी नीति नहीं होने से, हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। आंकड़े बताते हैं, पृथ्वी का 70 फीसदी हिस्सा पानी से लबालब है लेकिन इसमें पीने लायक अर्थात मीठा पानी केवल 40 घन किलोमीटर ही है। जल जीवन का सबसे आवश्यक घटक है और जीविका के लिए महत्वपूर्ण है। यह समृद्र, नदी, तालाब, पोखर, कुआं, नहर इत्यादि में पाया जाता है।हमारे दैनिक जीवन में जल का बहुत महत्व है। हमारा जीवन तो इसी पर निर्भर है। यह पाचन कार्य करने के लिए शरीर में मदद करता है और हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है। यह हमारी धरती के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह हमारे जीवन की गुणवत्ता निर्धारित करने में महत्वपूर्ण घटक है और सार्वभौमिक है। धरती पर जब तक जल नहीं था तब तक जीवन नहीं था और जल ही नहीं रहेगा तो जीवन के अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती। वर्त्तमान समय में जल संकट एक विकराल समस्या बन गया है। नदियों का जल स्तर गिर रहा है. कुएं, बावडी, तालाब जैसे प्राकृतिक स्त्रोत सूख रहे हैं. घटते वन्य क्षेत्र के कारण भी वर्षा की कमी के चलते जल संकट बढ़ रहा है. वहीं उद्योगों का दूषित पानी की वजह से नदियों का पानी प्रदूषित होता चला गया लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।सरकार को जनता में जागरूकता लाने के लिए विशेष प्रबन्ध और उपाय करने होंगे। है। आम आदमी को जल संरक्षण एवं समझाइश के माध्यम से पानी की बचत का सन्देश देना होगा। वर्षा की अनियमितता और भूजल दोहन के कारण भी पेयजल संकट का सामना करना पड़ रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम जल के महत्व को समझे और एक-एक बूंद पानी का संरक्षण करें तभी लोगों की प्यास बुझाई जा सकेगी। जल है तो कल है।’ सामान्य मानव जीवन में अक्सर सभी इन पंक्तियों को सुनते-पढ़ते आए हैं तथा इसके भावार्थ को भी अच्छे तरीके से समझते हैं, लेकिन ज्ञान होने के बावजूद भी लोग जल को व्यर्थ में बहाने से बाज नहीं आते, यह जानने के बावजूद भी कि जल ही इस पृथ्वी पर सभी जीवों के जीवन का आधार है। प्राकृतिक जल स्रोतों का एक विशेष महत्व है, जिसे हमारे पूर्वज भली-भांति जानते थे, लेकिन आज के लोगों की इन प्राकृतिक जल स्रोतों के प्रति प्रवृत्ति बिल्कुल असंवेदनशील हो गई है। पहले सभी एक साथ मिलकर प्राकृतिक जल स्रोतों से जल लेने जाते थे तथा वहां की सफाई भी करते थे, जिससे प्राकृतिक संतुलन भी बरकरार रहता था। लेकिन आज के लोग सुबह पानी लाना तो छोड़ो, नल में आए पानी को भर लें वही बहुत बड़ी बात है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार, दुनिया भर में 86 फीसदी से अधिक बीमारियों का कारण असुरक्षित व दूषित पेयजल है। वर्तमान में करीब 1600 जलीय प्रजातियां जल प्रदूषण के कारण लुप्त होने की कगार पर हैं, जबकि विश्व में करीब 1.10 अरब लोग दूषित पेयजल पीने को मजबूर हैं और साफ पानी के बगैर ही अपना गुजर-बसर कर रहे हैं।जल संरक्षण को हम सभी को अपने दैनिक जीवन का संकल्प बनाना होगा तथा इसे मानसिक से व्यावहारिक स्तर पर लाना होगा। हमें जल व वातावरण को अपने पूर्वजों की देन नहीं समझना, बल्कि इसे तो हमने अपनी आने वाली पीढ़ी के उद्धार स्वरूप लिया है, जिसे हमने जिस मात्रा व रूप में लिया है, उसे उसी रूप व मात्रा में दोबारा वापस करना है, ऐसी मानसिकता व धारणा के साथ जब सभी व्यक्ति जल जैसे सीमित संसाधनों का उपभोग करेंगे तभी इनका संरक्षण संभव हो सकता है।  उत्तराखंड का पर्वतीय क्षेत्र प्राकृतिक जलस्रोतों से परिपूर्ण हैं, मगर वर्तमान में इनकी जगह घर-घर में लगे नल, हैंडपंपों ने ले ली है। जिस कारण लोगों ने प्राकृतिक जलस्रोतों की ओर रु ख करना कम कर दिया है। इससे यह प्राकृतिक स्रोत लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं। शासन-प्रशासन स्तर पर इन प्राकृतिक जलस्रोतों को बचाने के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों को संजोना बेहद जरू री है। नौले-धारे हमारे धरोहर हैं। यह हमारी पारंपरिक व संस्कृति का भी हिस्सा हैं। विवाह संस्कार में दूल्हा-दुल्हन गांव के जलस्रोतों की पूजा करने के साथ ही उसके संरक्षण की शपथ भी लेते थे। समय के साथ अब यह पंरपरा समाप्त होने लगी है। युवा पीढ़ी को इस परंपरा को बनाए रखने के लिए नौले-धारों का संरक्षण करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। कारण चाहे जो भी रहे हों पानी की समस्या उत्तराखंड राज्य में होने वाले पलायन के मुख्य कारणों में से एक है। आज भी पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं और बच्चों को, अपने घरों से दूर स्थित पानी के स्रोतों से पानी लाते हुए बहुत आसानी से देखा जा सकता है। जिस कारण तमाम तरह की समस्या का सामना पहाड़ में रहने वाली महिलाओं को करना पढता है। हर घर जल योजना पहाड़ में रहने वाली इन महिलाओं के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा यदि कार्य दायी संस्थायें इस परियोना को पहाड़ की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ाये। समय के साथ हम आधुनिक तो होते जा रहे हैं और अपने जल के पुराने संसाधनों जैसे कुआँ, तालाब, झील इत्यादि को ख़त्म करते जा रहे हैं लेकिन अत्याधुनिकता के इस दौर में हम इनके विकल्पों को खोजने पर काम नहीं कर रहें हैं। सरकार को लोगों को जागरूक करना चाहिए कि कैसे वह जौहाद और चेक डैम का निर्माण कर जल का संरक्षण कर सकते हैं और साथ ही जल संरक्षण के विभिन्न उपायों पर भी जागरूक करने की आवश्यकता है।सरकार के साथ हमें भी इस गंभीर मसले को लेकर सजग हो जाना चाहिए और हमें सरकार के साथ मिलकर अपने पुरानेसंसाधनों को बचाने और जल संरक्षण के तमाम उपायों पर गौर करने कि सख्त ज़रूरत है। न केवल भारत देश को जल
संरक्षण नीति लाने कि आवश्यकता है बल्कि विश्व के तमाम देशों को जल संरक्षण की ओर निर्णायक कदम उठाने और इस
मुद्दे पर लामबंद होने की आवशयकता है, वर्ना वह दिन दूर नहीं जब हम पानी कि बून्द-बून्द को तरसने लगेंगे।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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