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उत्तराखंड जल संकटः छोटे प्रयास से बड़े समाधान की पहल

17/03/21
in उत्तराखंड, चमोली
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
चमोली के तपोवन में आई जलप्रलय की घटनाएं पूरी दुनिया को बड़े बांधों के निर्माण और पर्यावरण असंतुलन से होने वाले दुष्परिणामों से आगाह कर रही है। यह बड़े बांध स्थानीय जनता को न तो सिंचाई और न ही पेयजल की पूर्ति करते हैं, बल्कि इसके विपरीत प्राकृतिक रूप से संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। बड़े बांधों में बहुत अधिक जलराशि एकत्रित होने से पहाड़ों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है। इसके निर्माण के दौरान भारी मशीनरी और विस्फोटकों आदि का प्रयोग होता है, जो पहाड़ों की नींव को भी हिला देते हैं, जिससे पहाड़ों में भूस्खलन, भूकंप आदि की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। चूंकि बड़े बांधों को भरने के लिए नदियों का प्रवाह रोकना पड़ता है, इसलिए नदी के पानी से जो नैसर्गिक भूमिगत जलसंचय होता है, उसमें भी व्यवधान पड़ता है।

विगत दिनों गढ़वाल क्षेत्र के तपोवन के पास ऋषि गंगा में ग्लेशियर टूटने से भयानक बाढ़ आने से काफी संख्या में जान और माल का नुकसान हुआ है, जिसमें बिजली उत्पादन संयत्र और कुछ जगह जलाशय भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। इससे पहले 2013 में भी उत्तराखंड ने केदारनाथ आपदा झेली है, जिसमें भूस्खलन या ग्लेशियर के टूटने से मन्दाकिनी नदी में अचानक भयंकर बाढ़ आ गई थी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए या लापता हो गए थे और अत्यधिक संपत्ति का भी नुकसान हुआ था। अगर कभी इस तरह का भूस्खलन बड़े बांधों के प्रभाव क्षेत्र में होगा तो निश्चय ही देश को भयानक आपदा झेलनी पड़ सकती है। कुल मिलाकर देखें तो जलसंचय के लिए पहाड़ी क्षेत्र में बड़े जलाशयों बांधों का निर्माण अत्यधिक जोखिम भरा है।

बड़े बांधों की बजाए जगह.जगह छोटे छोटे बांध बनाए जाएं तो वह न सिर्फ भूमिगत जलस्तर बढ़ाएंगे, बल्कि इससे पानी के प्राकृतिक जलस्रोत भी रिचार्ज होते रहेंगे। इसके अलावा बरसाती नालों में चेक.डैम बनाए जाने चाहिए, जिससे धरती की जलधारण क्षमता बढ़ती है और इस तरह वर्षा के पानी का भूमिगत जल संचय किया जा सकता है। इससे निःसंदेह ही प्राकृतिक जल स्रोत में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और पानी की कमी से जूझ रहे ग्रामीणों को बड़ी राहत प्रदान होगी।

अब प्रश्न यह उठता है कि इसके अतिरिक्त क्या कोई अन्य प्रयास भी किए जा सकते हैंए जिससे कम संसाधनों के बल पर पहाड़ में पानी की सुलभता सुनिश्चित की जा सके। इस दिशा में कई लोगों और संगठनों ने कई बार अलग.अलग जगहों में रचनात्मक प्रयास किए हैं। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए विगत दिनों नैनीताल जिले के रामगढ़ और धारी क्षेत्र में एक स्वयंसेवी संगठन ने पानी को बचाने की दिशा में सराहनीय कार्य किया है। चूंकि पहाड़ों में यदा कदा बारिश होती रहती है और बारिश का पानी बहकर नदियों में समा जाता है, इसलिए जरूरत थी कुदरत के इस निःशुल्क उपहार को समेटने की। इसके लिए संस्था ने बारिश के पानी को समेटने, सहेजने की तरफ अपना ध्यान केंद्रित किया। संगठन ने पानी को संग्रहित करने के लिए जमीन में गड्ढे खोद कर कच्चे टैंक बनाए, जिस पर प्लास्टिक शीट डालकर बरसात के पानी को जमा करने का इंतजाम किया।

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून रहीम ने आज से सैकड़ों साल पहले ये बात समझ ली थी, कि पानी का होना कितना जरूरी है। हालांकि रहीम के समय भी सदा नीरा गंगा, यमुना जैसी नदियां बहती थीं, फिर भी उन्होंने पानी की महत्ता समझ ली थी। खैर पानी की जरूरत और किल्लत की संभावना को देखते हुए कई विश्लेषक यहां तक कह रहे हैं कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। हालांकि दुनिया के सभ्य इंसान किसी भी चीज के लिए युद्ध नहीं चाहते, फिर पानी पिलाना तो धर्म का कार्य माना गया है। तो फिर ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि आखिर कैसे इस युद्ध को रोका जाए। जाहिर है अभी पानी बनाने वाली तकनीकी चलन में नहीं है। समुद्र के खारे पानी को पीने योग्य बनाने की तकनीक कुछ देशों में जरूर है, परंतु बहुत ही खर्चीला होने के कारण गरीब देशों की हैसियत से बाहर की चीज है। घूम फिरकर वही प्रश्न उठता है कि आखिर पानी की किल्लत कैसे दूर किया जाए, ताकि सभी को समान रूप से आवश्यकतानुसार न केवल पानी उपलब्ध कराया जा सके, बल्कि आने वाली पीढ़ी के लिए भी पानी को बचाया जा सके। पर्वतीय क्षेत्र उत्तराखंड के संदर्भ में देखा जाए तो यहां पर असंख्य नदियों में पानी की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद यहां का आमजन युगों से उस पानी का दोहन नहीं कर पाया है। कारण है कि पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण खेत खलियान ऊंचाई पर स्थित होते हैं और नदी का बहाव नीचे की ओर होता है। हालांकि पूर्व में कई जगह नदियों से नहर प्रणाली द्वारा खेतों की सिंचाई के लिए पानी की व्यवस्था की गई, परंतु वह नाकाफी साबित हुई और कालांतर में अधिकांश परियोजनाएं ठप पड़ती गईं। पहाड़ों में वर्षा ऋतु और उसके तीन चार महीने बाद तक तो पानी की उपलब्धता ठीक रहती है, क्योंकि बरसात के कारण भूमि में नमी रहती है और प्राकृतिक जलस्रोतों से भी पानी का उत्पादन अधिक मात्रा में होता रहता है। लेकिन ग्रीष्म ऋतु की आहट के साथ ही जहां एक ओर भूमि की नमी खत्म होने लगती है, वहीं प्राकृतिक जलधाराओं में भी पानी की उपलब्धता न्यून हो जाती है। कुल मिलाकर मार्च से जुलाई तक अर्थात मानसून के आने तक लगभग चार महीने उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में पानी की विकट समस्या रहती है। यदि पर्वतीय उत्तराखंड को तो उसके लिए सबसे पहला प्रयास जल का संचय कर हर ग्रामीण परिवार तक जल की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। तभी इस ग्रामीण प्रदेश का समेकित विकास संभव है। उत्तराखंड को आत्मनिर्भर बनाना है तो उसके लिए सबसे पहला प्रयास जल का संचय कर हर ग्रामीण परिवार तक जल की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। तभी इस ग्रामीण प्रदेश का समेकित विकास संभव है।

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