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प्राकृतिक जल स्रोत की सिमटती विरासत

15/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
खारे जल से समुद्र भरा है
मीठ जल से भरा है लोटा
प्यासे को तो समुद्र से बड़ा दिखाई दे लोटा”
उपर्युक्त पक्तियो के माध्यम से समझा जा सकता है की पृथ्वी पर इतने बड़े समुद्र सागर होने के बावजूद भी केवल 3%पानी ही पीने योग्य है ।“जल ही जीवन है” और “जल है तो कल है ” ये दोनों मुहावरे काफी प्रचलित है लेकिन इसका वास्तविक अर्थ देश की अधिकांश जनसंख्या को नहीं पता है क्योंकि वो पानी के महत्व को न ठीक से समझते हैं ना ही ठीक से समझना चाहते हैं। पानी के बिना जीवन की क्या स्थिति होती है ये उन इलाको में जाकर समझा जा सकता है जहाँ लोग घण्टों भर से बर्तन लेकर नलके के पास खड़े रहते हैउत्तराखंड भी पानी के मामले में गम्भीर जल संकट की स्थिति से गुज़र रहा है जिस उत्तराखण्ड से प्रवाहित सतत् नदिया जो उत्तर भारत के अनेक राज्यो के लिए जल की आपूर्ति करता है  देवभूमि में पानी की किल्लत भविष्य के लिए अशुभ संकेत है । अगर समय रहते इसके लिये प्रबन्ध नहीं किए गए तो आने वाले समय में पुरे देश में विपरीत स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। देश में पानी के अधिकांश स्थस्रोत सुख चुके हैं या उनका अस्तित्व नहीं रह गया है।देश की सैकड़ों छोटी नदियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं ,देश के अधिकांश गाँव और कस्बों में तालाब और कुएँ भी बिना संरक्षण के सुख चुके हैं। देश के अधिकांश जगहों में गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित है जिसकी वजह से इसका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया है। कुल मिलाकर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिख रही है।देश की सैकड़ों छोटी नदियाँ विलुप्ति के कगार पर हैं ,देश के अधिकांश गाँव और कस्बों में तालाब और कुएँ भी बिना संरक्षण के सुख चुके हैं। देश के अधिकांश जगहों में गंगा और यमुना अत्यधिक प्रदूषित है जिसकी वजह से इसका पानी भी पीने योग्य नहीं रह गया है। कुल मिलाकर देश में जल संकट और जल संरक्षण को लेकर बहुत ज्यादा संजीदगी नहीं दिख रही है।पहाड़ों की गोद में बसा दून कभी अपने स्वच्छ और मीठे पानी के लिए जाना जाता था। प्राकृतिक स्रोतों से मिलने वाला पानी यहां की पहचान था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। तेजी से होते शहरीकरण, भूजल के अंधाधुंध दोहन और प्रदूषण ने इस मीठे पानी के शहर के सामने चुनौती खड़ी कर दी हैपहाड़ों से उतरती स्वच्छ धाराएं सिमट रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है और नलों तक पहुंचने वाले पानी की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। बढ़ती आबादी और बेतरतीब शहरीकरण के बीच अब हर बूंद की कीमत समझ में आने लगी है। देहरादून में पानी की गुणवत्ता एक जैसी नहीं है। शहर के अलग-अलग हिस्सों में इसकी स्थिति अलग-अलग नजर आती है। राजपुर रोड, पटेल नगर और प्रेमनगर जैसे शहरी इलाकों में पानी की कठोरता 150 से 300 एमजी प्रति लीटर के बीच पाई जा रही है, जो सामान्य से मध्यम श्रेणी में आती है।वहीं, आसपास के पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी अपेक्षाकृत कम हार्ड और ज्यादा मीठा है। हालांकि, कुछ बोरवेल वाले इलाकों में यह कठोरता 400 एमजी प्रति लीटर तक पहुंच रही है, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बन सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अधिकतम 200 एमजी प्रति लीटर तक का पानी पीने के लिए अच्छा माना जाता है, जबकि 400 एमजी प्रति लीटर से अधिक कठोरता बेहद नुकसानदेह हो सकती है।एक समय था जब देहरादून का भूजल बिना किसी शुद्धिकरण के पीने योग्य माना जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। शहर के कई हिस्सों में पानी में नाइट्रेट, फ्लोराइड और बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आ रही है।सीवेज लीकेज, कचरे का अनुचित निस्तारण और लगातार बढ़ते निर्माण कार्य भूजल को प्रभावित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अब बोरवेल या हैंडपंप का पानी सीधे पीना सुरक्षित नहीं है। इसे या तो फिल्टर से शुद्ध करना चाहिए या कम से कम उबालकर उपयोग करना चाहिए।देहरादून की बढ़ती आबादी पानी के संकट को और गहरा रही है। पिछले 25 वर्ष के भीतर दून की आबादी लगभग दोगुना हो चुकी है। जिससे पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसका परिणाम यह है कि भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पारंपरिक जल स्रोत धाराएं और नौले सूखते जा रहे हैं। गर्मियों के मौसम में कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत आम समस्या बन जाती है।देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में पहले सैकड़ों छोटे-बड़े प्राकृतिक जल स्रोत सक्रिय थे। इनमें धाराएं, नौले, कुएं और झरने प्रमुख रहे शहरी विस्तार और निर्माण कार्यों के कारण कई स्रोत खत्म हो गए। जो बचे हैं, उनमें भी पानी का प्रवाह घटा है। एक अनुमान के अनुसार, दून घाटी में पिछले दो दशकों में 30-40 प्रतिशत प्राकृतिक जल स्रोत या तो सूख चुके हैं या कमजोर हो गए हैं।देहरादून शहर की बढ़ती आबादी के साथ पानी की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में अनुमानित मांग करीब 220-250 मिलियन लीटर प्रतिदिन है। जबकि, वास्तविक उपलब्धता लगभग 160-180 एमएलडी है। यानी हर दिन 40-70 एमएलडी पानी की कमी बनी रहती है, जो गर्मियों में और अधिक बढ़ जाती है।विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो दून में जल संकट और गहरा सकता है। वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन, भूजल रिचार्ज के लिए ठोस नीति, अंधाधुंध बोरवेल पर नियंत्रण, हरियाली और जलागम क्षेत्रों का संरक्षण आदि उपाय ही एकमात्र समाधान हैं।उत्तराखंड जल संस्थान की ओर से पेयजल की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए नियमित निगरानी किए जाने का दावा किया गया है। शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के सैंपल नियमित रूप से लिए जाते हैं। जल शोधन संयंत्र और सप्लाई लाइनों पर क्लोरीन स्तर की जांच, संदिग्ध क्षेत्रों में विशेष सैंपलिंग अभियान, शिकायत मिलने पर तुरंत पानी की जांच का भी दावा है।जल संस्थान के मुख्य महाप्रबंधक के अनुसार, जल संस्थान समय-समय पर वाटर क्वालिटी टेस्टिंग रिपोर्ट भी जारी करता है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है। देहरादून में पेयजल की जांच के लिए बहु-स्तरीय लैब नेटवर्क विकसित किया गया है। पूरे राज्य में ऐसे करीब 30 के करीब पानी जांच प्रयोगशालाएं संचालित हैं।इन प्रयोगशालाओं में पानी के कई महत्वपूर्ण पैरामीटर जांचे जाते हैं, जिनमें पीएच, टीडीएस, हार्डनेस, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयरन, क्लोरीन स्तर, ई कोलाई.और टोटल कोलीफार्म बैक्टीरिया शामिल हैं। जल संस्थान के अनुसार, देहरादून की जिला स्तरीय लैब को मानक परीक्षण गुणवत्ता के अनुरूप मान्यता भी मिली है। वर्षाजल एक अनमोल प्राकृतिक उपहार है जो प्रतिवर्ष लगभग पूरी पृथ्वी को बिना किसी भेदभाव के मिलता रहता है। परन्तु समुचित प्रबन्धन के अभाव में वर्षाजल व्यर्थ में बहता हुआ नदी, नालों से होता हुआ समुद्र के खारे पानी में मिलकर खारा बन जाता है। अतः वर्तमान जल संकट को दूर करने के लिये वर्षाजल संचय ही एक मात्र विकल्प है। यदि वर्षाजल के संग्रहण की समुचित व्यवस्था हो तो न केवल जल संकट से जूझते शहर अपनी तत्कालीन ज़रूरतों के लिये पानी जुटा पाएँगे बल्कि इससे भूजल भी रिचार्ज हो सकेगा। अतः शहरों के जल प्रबन्धन में जल की हर बूँद को सहेजकर रखना जरूरी है। हमारे देश में प्राचीन काल से ही जल संचय की परम्परा थी तथा वर्षाजल का संग्रहण करने के लिये लोग प्रयास करते थे। इसीलिये कुएँ, बावड़ी, तालाब, नदियाँ आदि पानी से भरे रहते थे। इससे भूजल स्तर भी ऊपर हो जाता था तथा सभी जलस्रोत रिचार्ज हो जाते थे। परन्तु मानवीय उपेक्षा, लापरवाही, औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण ये जलस्रोत मृत प्रायः हो गए। कई जलस्रोत तो कचरे के गड्ढे के रूप में बदल गए। कई जलस्रोतों पर अवैध कब्जे हो गए। मिट्टी और गाद भर जाने से उनकी जल ग्रहण क्षमता समाप्त हो गई और समय के साथ वे टूट-फूट गए। अभी भी समय है कि इनमें से कई परम्परागत जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करके उन्हें बचाया जा सकता है। वर्षाजल के संचय से इन जलस्रोतों को सजीव बनाया जा सकता है। यदि आज हमने जल संरक्षण के महत्व को नहीं समझा, तो वह दिन दूर नहीं, जब भविष्य की पीढ़ियों के लिए धरती पर भीषण जल-संकट खड़ा हो जाएगा। आज विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अलग-अलग मंचों पर जल संरक्षण के महत्व को रेखांकित करने और लोगों को इसके प्रति जागरूक बनाने की दिशा में काम कर रही हैं। भारत सरकार द्वारा भी इस दिशा में योजनाबद्ध ढंग से काम किया जा रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व जल दिवस की मूल भावना को अपने दैनिक जीवन में उतारकर हर व्यक्ति, हर दिन जल संरक्षण का यथासंभव प्रयास करे। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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