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आस्था का महासंगम पौराणिक स्याल्दे बिखौती मेला

15/04/26
in अल्मोड़ा, उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

पाली पछांऊ क्षेत्र में आयोजित होने वाला पौराणिक स्याल्दे बिखौती मेला इस वर्ष 13 अप्रैल से पूरे हर्षोल्लास और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हो रहा है। यह मेला न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि क्षेत्र की समृद्ध लोकसंस्कृति, परंपराओं और सामाजिक एकता का जीवंत उदाहरण भी है। हर वर्ष की तरह इस बार भी मेले को लेकर स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। मेले का शुभारंभ सोमवार शाम 4 बजे विभांडेश्वर मंदिर में होगा, जहां रणां ग्रामवासियों द्वारा नगाड़ों और निशानों के साथ मंदिर की परिक्रमा की जाएगी। इस भव्य आयोजन के साथ ही मेले की औपचारिक शुरुआत होगी। उद्घाटन अवसर पर विभिन्न विद्यालयों और सांस्कृतिक टीमों द्वारा रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे, जो देर रात तक दर्शकों का मन मोहते रहेंगे। रात होते-होते मेले का स्वरूप और भी भव्य हो उठेगा, जब आल, गरख और नौज्यूला धड़ों से जुड़े विभिन्न गांवों के रणबांकुरे पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोल-नगाड़ों, रणसिंघों, दुंदुभियों और बीनबाजों के साथ मेले में पहुंचेंगे। हुड़के और चिमटे की थाप पर गूंजते झोड़ा-चांचरी गीत वातावरण को लोकसंगीत से सराबोर कर देंगे। सभी दल मंदिर परिसर में अपने निर्धारित स्थानों पर एकत्र होकर परंपरागत रीति से भाग लेंगे। अगली सुबह श्रद्धालु सरस्वती, सुरभि और नंदिनी नदियों के संगम स्थल पर स्नान कर पुण्य अर्जित करेंगे और इसके बाद मंदिर में विधिवत पूजा-अर्चना करेंगे। यह धार्मिक अनुष्ठान मेले की पवित्रता और आस्था को और अधिक प्रगाढ़ बनाता है। स्नान और पूजा के बाद श्रद्धालु अपने-अपने गांवों को प्रस्थान करते हैं।13 अप्रैल को ही द्वाराहाट नगर में बट पुजै मेले का आयोजन भी किया जाएगा। इस दौरान विद्यालयों द्वारा सांस्कृतिक जुलूस निकाला जाएगा, जिसमें स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। शाम 4 बजे नौज्यूला धड़े की ओर से ओड़ा भेंटने की पारंपरिक रस्म अदा की जाएगी, जो मेले की प्रमुख परंपराओं में से एक है। इसके पश्चात शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। 15 अप्रैल को मुख्य स्याल्दे मेले में गरख और आल धड़ों की ओर से ओड़ा भेंटने की रस्म निभाई जाएगी।इस अवसर पर झोड़ा-भगनौल गायन से पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सवपूर्ण हो उठेगा। शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए स्थानीय कलाकार अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे। मेले का समापन 16 अप्रैल को व्यापारिक मेले और मीना बाजार के रूप में होगा। इस दिन क्षेत्रीय उत्पादों की प्रदर्शनी लगेगी, जहां स्थानीय हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र और अन्य उत्पादों की झलक देखने को मिलेगी। यह मेला न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी सशक्त बनाता हैओ भिना कसिकै जानूं द्वारहाटा’ जैसे कुमाऊं के लोकप्रिय लोक गीतों में वर्णित और कत्यूरी शासनकाल में राजधानी रहा द्वाराहाट अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-प्रदेश में प्रसिद्ध है। उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा जिले में रानीखेत तहसील मुख्यालय से लगभग 21 किलोमीटर दूर गेवाड़ घाटी में स्थित इस छोटे से कस्बे में 8वीं से 13वीं शदी के बीच निर्मित महामृत्युंजय, गूजरदेव, मनिया, शीतला देवी व रत्नदेव आदि अनेक मंदिरों के अवशेष आज भी अपनी स्थापत्य कला से प्रभावित करते हैं। मंदिरों के चारों ओर अनेक भित्तियों को कलापूर्ण तरीके से शिलापटों अलंकृत किया गया है।द्वाराहाट में मौजूद वर्ष 1048 में निर्मित बद्रीनाथ मंदिर समूह में तीन मन्दिरों को मिलाकर बना है। प्रमुख मंदिर में सम्वत 1105 अंकित काले पत्थर की विष्णु की मूर्ति स्थित है। स्थानीय नदी खीर गंगा के तट पर निर्मित एक अन्य वनदेव मन्दिर मध्य हिमालय के प्राचीन विकसित फांसना शैली के मन्दिरों में से एक है, जिसे पीड़ा देवल शैली के नाम से भी जाना जाता है। 13वीं शताब्दी में निर्मित तीसरा गुर्जर देव मन्दिर मध्य हिमालय में नागर शैली मंदिरों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। पंचायतन शैली में निर्मित यह मन्दिर एक ऊंचे चबूतरे पर स्थित है जिसका अधिष्ठान एवं जंघा भाग देव प्रतिमाओं, नर्तकों एवं पशु प्रतिमाओं से अलंकृत है। इस मन्दिर के स्थापत्य व ध्वसांवशेषों से ज्ञात होता है कि यह अत्यन्त भव्य मन्दिर था। कचहरी मन्दिर समूह में 11वीं से 13वीं शताब्दी में बने कुल 12 छोटे-बड़े अर्धमण्डप युक्त मूर्ति विहीन मन्दिर हैं। एक कुटुम्बरी मन्दिर की उपस्थिति 1960 तक बताई जाती है, पर अब यह अस्तित्व में नहीं है। इसकी वास्तु संरचनाओं के अवशेष निकटवर्ती घरों में किए गये निर्माणों में दिखते हैं। 11-12वीं शताब्दी में बना मनियान मन्दिर समूह नौ मन्दिरों का समूह है। इनमें से चार मन्दिर आपस में जुड़े हुए हैं। इनमें से तीन मंदिरों में जैन तीर्थकारों की तथा शेष में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां इतिहास की एक नई धारा की ओर इशारा करती हैं। इसी दौर में निर्मित मृत्युजंय मन्दिर समूह का प्रमुख मन्दिर भगवान शिव-मृत्युजंय को समर्पित है। नागर शिखर शैली में निर्मित यह पूर्वाभिमुखी मन्दिर त्रि-रथ योजना में निर्मित है, जिसमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप युक्त है। मन्दिर परिसर में एक मन्दिर भैरव का तथा दूसरा छोटा मंदिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था है। 11-13वीं शताब्दी में निर्मित रतनदेव मन्दिर समूह भी नौ मन्दिरों का समूह रहा है, पर अब इसमें छह मन्दिर ही बचे हैं। इनमें से ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को समर्पित तीन मन्दिर एक सामूहिक चबूतरे पर स्थित हैं। जिनके आगे उत्तरमुखी मंडप है जो सम्भवत् थे।कुमाऊं के एक अन्य लोकप्रिय लोक गीत-‘अलबेरै बिखौती मेरि हंसि रिसै गे’ में वर्णित द्वाराहाट के प्रसिद्ध स्याल्दे बिखौती (यानी विषुवत संक्रान्ति) के मेले में आज भी ग्रामीण परिवेश की झलक मिलती है। पाली पछाऊँ क्षेत्र की परंपरागत लोक संस्कृति को पेश करने वाले इस मेले का माहौल आसपास के गांवों में फूलदेई के त्योहार से ही बनना प्रारंभ हो जाता है, द्वाराहाट से आठ किमी दूर प्रसिद्ध शिव मंदिर विमांडेश्वर में इसकी औपचारिक शुरुआत हो जाती है।आगे मेला वैशाख माह की पहली तिथि तक द्वाराहाट बाजार तक पहुंच जाता है। मेले के दौरान गांवों में एक खास अंदाज में एक-दूसरे के हाथ थाम और कदम से कदम मिलाते हुए कुमाऊं के प्रसिद्ध लोक नृत्यों झोडे, चांचरी, छपेली आदि का परंपरागत वस्त्रों व अंदाज में लोग आनंद लेते मिल जाते हैं। मेले में द्वाराहाट बाजार की मुख्य चौक पर रखे एक खास पत्थर-ओड़ा को भेटने यानी छूने की एक खास परंपरा का निर्वाह किया जाता है। इस बारे में जनश्रुति है कि शीतला देवी के मंदिर से लौटने के दौरान एक बार किसी कारण दो गांवों के दलों में खूनी संघर्ष हो गया। हारे हुए दल के सरदार का सिर खड्ग से काट कर जिस स्थान पर गाड़ा गया वहां स्मृति चिन्ह के रूप में एक पत्थर रख दिया गया, जिसे ही ‘ओड़ा’ कहा जाता है। तभी से बनी ‘ओड़ा भेटने’ की परम्परा के अनुसर इस ओड़े पर चोट मार कर ही मेले में आगे बढ़ा जा सकता है। पहले इसके लिए ग्रामीणों को अपनी बारी आने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था, लेकिन इसके लिए अब आल, गरख और नौज्यूला धड़ों के बीच एक सुव्यवस्थित व्यवस्था तय कर दी गई है। लोक नृत्य और लोक संगीत से लकदक इस मेले में अब भी रात-रात भर भगनौले जैसे लोकगीत अजब समां बाँध देते हैं। जिसे देखने-सुनने को पर्यटक भी दूर-दूर से पहुंचते हैं।
लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं

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