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फूलों की खुशबू बिखेरता हर्षिल

12/10/20
in उत्तरकाशी, उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
जीवन में खुशियां भरने वाले फूलों का अपना एक संसार होता है, जो अपने रंग और महक से मन को हर्षित कर देते हैं। फूलों की ऐसी बयार हिमालय की तलहटी में फैली सुंदर घाटियों में हों, तो इनकी अनुभूति ही आनंदित कर देती है। शहरी भाग-दौड़ से दूर कुछ पल प्रकृति के साए में गुजार कर आनंदित होना है, तो चले आइए हर्षिल की घाटियों में, जहां आप हिमालयी फूलों की दुनियां से रू.ब.रू तो होंगे ही, साथ ही खुद को नदी.नालों, जल.प्रपातों और गगन को चूमते हिम शिखरों के सानिध्य में पाएंगे। नागणी.क्यारकोटी, गंगनानी क्यारकोटी, अपर क्यारकोटी, छोलमी, सात ताल यहां हैं। जो सभी हर्षिल से 10 से 16 किलोमीटर के दायरे में हैं।गंगनानी क्यारकोटी, लोअर क्यारकोटी, अपर क्यारकोटी का एक ही ट्रैक है। जिसमें सबसे अधिक फूलों का दीदार होता है।
यहां जाने के लिए उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से 75 किमीण् दूर हर्षिल तक सड़क सुविधा है। जिसके बाद पैदल मार्ग शुरू होता है। तेज वेग से बहती जलद्री नदी किनारे.किनारे और देवदार के सघन वृक्षों की छांव के बीच शीतल मंद पवन भरे रास्ते से होकर आगे बढ़ते हैं। छह किमीण् की पैदल दूरी पर लाल देवता स्थल है। हर्षिल से लालदेवता स्थल तक हल्की चढ़ाई है। लाल देवता स्थल बगोरी के जाड़ व भोटिया ग्रामीणों का प्रमुख धार्मिक स्थल है। लाल देवता स्थल से एक किमीण् की दूरी पर भोजपत्र के वृक्षों का बड़ा जंगल हैं। इसके पास ही हिमालयी सफेद.गुलाबी बुरांश के सुर्ख लाल फूलों का दीदार होता है। लालदेवता स्थल से चार किमीण् दूरी पर गंगनानी क्यारकोटी है। यहां घाटी रंग.बिरंगे फूलों से अपनी बांहें फैलाएं हैं। मानो प्रकृति का यह श्रृंगार हमारे लिए ही हो। 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गंगनानी क्यारकोटी में पर्यटक रात्रि विश्राम का ठिकाना बनाते हैं। इसके लिए अपने साथ टेंटए स्लिपिंग बैग और खाने की व्यवस्था रखनी पड़ती है। जो हर्षिल में पोर्टर के साथ आसानी से उपलब्ध हो जाती है। फूलों की खुशबू के बीच यहां रात बिताने का भी अपना आनंद है। यहां की भोर भी किसी कुदरती करिश्मे से कम नहीं होती। जब हिम शिखरों पर सूरज की पहली किरण पड़ती हैए तो सफेद बर्फ से ढके शिखर भी स्वर्ण मुकुट से दिखते हैं। सुबह होते ही फूलों की पंखुडि़यां अपना रंग बिखेरने लगती है। गंगनानी क्यारकोटी से दो किमीण् की दूरी पर लोअर क्यारकोटी और वहां से दो किमीण् की दूरी पर अपर क्यारकोटी है। 3250 मीटर की ऊंचाई पर स्थित यह क्षेत्र बेहद ही सुंदर है। यहां कदम.कदम पर सुंदर फूलों के कुनबे नजर आते हैं। नागणी क्यारकोटी ट्रैक आठ किमीण् लंबा है। जो हर्षिल से शुरू होता है। हर्षिल आर्मी कैंप से होते हुए एक किमीण् दूरी पर कचोरा स्थान पड़ता है, जहां से दो किमीण् चढ़ाई पार करने के बाद छंछरा पड़ाव आता है।
यहां से यह ट्रैक फूलों की वादियों से होकर गुजरता है। करीब तीन किमीण् चलने पर 3300 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सुरम्य बुग्याल और फूलों से भरा नागणी पड़ाव आता है। यहां से कुछ किमी की दूरी पर फूलों की वादियों से घिरा मंगलाछु ताल आता है। यहां से पर्यटक एक दिन में भी लौट सकते हैं, लेकिन अधिकांश पर्यटक नागणी के पास अपने टैंट लगाते हैं। सात ताल जाने के लिए धराली गांव के सेब के बागीचों के बीच से होकर जाते हैं। रास्ते में सुंदर तालों का दीदार होता है और सफेद बुरांस के फूलों का संसार दिखता है।
हिमालय की गगन चूमती चोटियों की गोद में 7860 फीट की ऊंचाई पर बसे हर्षिल को भारत का मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। यहां की खूबसूरत वादियांए देवदार के घने जंगलए चारों ओर फैले बेशुमार सौंदर्यए रंग.बिरंगे खिले फूलए पहाड़ों पर पसरे हिमनद के बीच शांत होकर बहती भागीरथी ;गंगाद्ध नजर आती है। यहां जलद्री नदी और भागीरथी नदी के संगम तट पर प्राचीन हरि मंदिर है। विश्र्व प्रसिद्ध हर्षिल में पर्यटकों के रुकने और खाने की पूरी व्यवस्थाएं हैं। हर्षिल से बमुश्किल एक किमीण् दूरी पर स्थित बगोरी गांव में लकड़ी के बने घर अपनी सुंदरता बिखरते हैं। आप इन घरों में होम स्टे के तहत रुक सकते हैं। इस गांव के ग्रामीण जाड़, भोटिया और बौद्ध समुदाय के हैं। हर्षिल की वादियों में कंपानुला, मोरिना, लिगुलारिया, लेबिलिया, स्ट्राबेरी, एनीमोन, जर्मेनियम, मार्श, गेंदा, प्रिभुला, पोटेन्टिला, जिउम, तारक, लिलियम, हिमालयी नीला पोस्त, बछनाग, डेलफिनियम, रानुनकुलस, कोरिडालिस, इन्डुला, सौसुरिया, कम्पानुला, पेडिक्युलरिस, मोरिना, इम्पेटिनस, बिस्टोरटा, लिगुलारिया, अनाफलिस, सैक्सिफागा, लोबिलिया, थर्मोपसिस आदि जैसे फूलों का दीदार होता है। हर्षिल स्थित विल्सन हाउस, अब वन विश्राम गृह है।
कहते हैं 1850 के आसपास विल्सन गुलाबी और अपने बच्चों के साथ यहीं रहते थे। उस दौर में यहाँ लकड़ी का एक खूबसूरत घर हुआ करता था। हालांकि मौजूदा वन विश्राम गृह भी लकड़ी का ही बना हुआ है और बहुत खूबसूरत है। लेकिनए पुराने घर में एक बार आग लग गई और उसे बचाया नहीं जा सका। बाद में यहाँ एक नया विश्राम गृह बना। हालांकि गेट पर आज भी विल्सन हाउस का ही बोर्ड लगा है। हर्षिल का सेब भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खूब पसंद किया जाता है। अपनी गुणवत्ता की वजह से इसने अब अन्य विदेशी बाजारों के साथ ही अमेरिकी बाजार में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। पिछले चार दशक में इस इलाके में सेब की काश्त करने वाले लोग विशेषज्ञता हासिल कर अब इससे अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। पर्यटन के अलावा आलू, राजमा, चेरी और सेब के बागान स्थानीय ग्रामीणों की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। हरसिल की जैविक राजमा देश.विदेश तक में मशहूर हैण्हरसिल और इसके आसपास के गांवों में सेब की एक विशिष्ट प्रजाति पायी जाती है, जिसे विल्सन सेब कहा जाता है। इससे जुड़ा रोचक किस्सा है कि ब्रिटिश भारत में फ्रेडरिक ईण् विल्सन नाम के एक अंग्रेज ईस्ट इण्डिया कंपनी के कर्मचारी के रूप में भारत आए। एक दफा वे मसूरी घूमने आए और वहां से हरसिल की घाटी पहुँच गए। हरसिल के मोहपाश ने विल्सन को ऐसा बाँधा कि उन्होंने नौकरी छोड़कर यहीं बसने का फैसला कर लिया। वे हरसिल के होकर रह गए। यहाँ रहकर उन्होंने स्थानीयता को पूरी तरह अपना लिया। उन्होंने गढ़वाली भाषा सीखी और पहले स्थानीय लड़की रायमत्ता से विवाह किया। निस्संतान रहने पर विल्सन ने मुखबा की एक लड़की संग्रामी उर्फ़ गुलाबी से दूसरा विवाह भी किया। इस विवाह से विल्सन को 3 पुत्र हुए। विल्सन ने हरसिल में ही अपने लिए देवदार की लकड़ी से शानदार बंगला बनाया। यह बंगला आज भी हरसिल में वन विश्राम गृह के रूप में अपने मूल स्वरूप में मौजूद है। मुखबा के ग्रामीण बताते हैं कि विल्सन ने अपने ससुरालियों के लिए पांचेक लकड़ी के घर भी मुखबा में बनवाए। विल्सन यहाँ पर ब्रिटेन से सेब की ख़ास प्रजाति के पौधे लेकर आए, इन्हीं पेड़ों के सेब आज स्वादिष्ट विल्सन सेब के नाम से पहचाने जाते हैं। फ्रेडरिक ईण् विल्सन एक ब्रिटिश फौजी था जो हिमालय के अकूत सौन्दर्य को देखने की ललक से मसूरी से हरसिल आया। विल्सन ने यहाँ रहकर भारतीय रेल के लिए लकड़ी का अच्छा कारोबार किया। फ्रेडरिक ईण् विल्सन को पहाड़ी विल्सन, राजा विल्सन और हुलसन नामों से भी जाना जाता है। आज भी विल्सन की कब्र मसूरी में मौजूद है। हरसिल का जादू कुछ ऐसा है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के शोमैन के तौर पर पहचाने जाने वाले राजकपूर ने अपनी सुपरहिट फिल्म राम तेरी गंगा मैली का ख़ासा हिस्सा हरसिल में ही फिल्माया। आज भी देश.विदेश के पर्यटकों को हरसिल बहुत आकर्षित करता है। अप्रैल से अक्तूबर तक यहाँ भारी संख्या में सैलानी आते हैं। जाड़ों में बर्फ की सजधज के बीच हरसिल एक अलग तरह की खूबसूरती ओढ़ लेता है, तब भी यहाँ पर्यटक आया करते हैं। हरसिल में रहने.खाने के पर्याप्त ठिकाने मौजूद हैं। प्रकृति से बिना किसी छेड़छाड़ के पर्यटन गतिविधियां संचालित करना ही ईको टूरिज्म या पारिस्थितिकीय पर्यटन का सार है। यह दुनियाभर में पर्यटन के क्षेत्र में नया दृष्टिकोण है। इसके तहत पर्यावरण के साथ ही प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में पर्यटकों और स्थानीय जन की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। यही नहीं, इससे स्थानीय जनमानस के लिए रोजगार के अवसर भी सृजित होते हैं। देवभूमि उत्तराखंड भारत का एक बेहद खास पहाड़ी राज्य हैए जो अपने प्राकृतिक आकर्षणों से विश्व भर के सैलानियों को आकर्षित करता है। आप यहां कुदरत के अद्भुत नजारों को देखने के साथ.साथ उसे महसूस भी कर सकते हैं। आत्मिक और मानसिक शांति एक बहुत बड़ा स्रोत है उत्तराखंड । घने जंगल, नदी, झील, जलप्रपात, पहाड़ी बर्फीली चोटियां इस राज्य की मुख्य विशेषता हैं। यह राज्य न सिर्फ प्राकृतिक बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी काफी ज्यादा मायने रखता है। पर्यटन स्थलों का एक बहुत बड़ा भंडार इस राज्य में मौजूद है, जो सैलानियों को आनंदित करने के साथ.साथ काफी ज्यादा रोमांचित भी करते हैं। इनको विकसित करने के लिये सभी को सामूहिक प्रयास करने होगें।

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