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पिरूल का सही इस्तेमाल किया जाए तो जंगलों में धधकी आग पर तो हमेशा के लिए काबू पाया ही जा सकेगा

22/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
Reading Time: 1min read
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड के 71.05 प्रतिशत वन भूभाग वाले उत्तराखंड में 15.9 प्रतिशत हिस्से में चीड़ के जंगल हैं। एक अनुमान के मुताबिक प्रतिवर्ष चीड़ के जंगलों में 23 लाख मीट्रिक टन से अधिक पिरुल गिरता है। ग्रीष्मकाल में यही पिरुल जंगलों में आग के फैलने की वजह बनता है तो जमीन में बिछी रहने वाली पिरुल की परत से पानी धरती में नहीं समा पाता।उत्तराखंड के जंगलों में आग के फैलाव की बड़ी वजह बनने वाली चीड़ की पत्तियां (पिरुल) फिर इसे ब्रिकेट्स-पैलेट्स बनाने के लिए संबंधित इकाइयों को उपलब्ध कराया जा रहा है। मुख्य वन संरक्षक वनाग्नि एवं आपदा प्रबंधन के अनुसार उरेडा के माध्यम से इस पहल को आगे बढ़ाया जा रहा है।उन्होंने बताया कि राज्य में पिरुल की दृष्टि से 57 संवेदनशील रेंज हैं। अभी तक नौ रेंज में ये इकाइयां लग चुकी हैं और जल्द ही शेष में इनकी स्थापना के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। ब्रिकेट-पैलेट का उपयोग ईंधन के रूप में करने के लिए बाजार भी उपलब्ध है। उत्तराखंड में जैसे-जैसे गर्मी का प्रकोप बढ़ रहा है, वैसे ही उत्तराखंड के जंगल भी धधकने लगे है. इस साल फायर सीजन की शुरुआत को राहत भरी रही उत्तराखंड में हर साल 15 फरवरी से लेकर 15 जून तक का समय फायर सीजन का होता है. इस दौरान जंगलों में आग लगने की घटनाएं सबसे ज्यादा सामने आती है. हालांकि फरवरी, मार्च और अप्रैल में बारिश व बर्फबारी के कारण जंगलों में नमी बनी रही थी. इसीलिए आग की घटनाएं ना के बराबर थीं, लेकिन बीते कुछ दिनों से पौड़ी और आसपास के क्षेत्रों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ने लगी हैं. भारत में मौसम के लिहाज से अप्रैल से जून का महीना जंगलों के लिए ‘फायर सीजन’ कहा जाता है. लेकिन आग पहाड़ी वाले राज्यों में ज्यादा लगती है. जैसे अभी उत्तराखंड के जंगलों में लगी है. ये जंगल उत्तराखंड की खूबसूरती की बुनियाद हैं. इसी पर यहां का पूरा सांस्कृतिक, आर्थिक और पूरा सामाजिक ढांचा टिका है. लेकिन पिछले तीन दिन की धधकती आग के आगे ये पूरा ढांचा चरमराया हुआ है. पब्लिक और गवर्नमेंट सबको पता है, आग लग सकती है गर्मी के महीने में, लेकिन आग फिर भी लगातार साल दर साल फैल रही है. अब सवाल है कि हर साल जिस जंगल की आग में उत्तराखंड धधकता है, करोड़ों का नुकसान होता है, वो आग लगती क्यों है? दरअसल उत्तराखंड में आमतौर पर 15 फरवरी से 15 जून तक फायर सीजन माना जाता है. आग लगने के लिए तीन चीजों की जरूरत होती है. पहला ईंधन, दूसरा ऑक्सीजन और तीसरा हीट.जंगलों में ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं होती. इसके अलावा यहां पेड़ों के सूखे पत्ते और टहनियां ईंधन का सबसे सोर्स होती हैं. पहाड़ों पर चीड़ और देवदार के पेड़ बहुतायत में हैं. हीट की बात करें तो वो गर्मी के मौसम में पैदा हो ही जाती है. रिपोर्ट में 2030, 2050 और 2080 के अनुमानों के आधार पर भारतीय जंगलों में जलवायु परिवर्तन के हॉटस्पॉट को चिन्हिंत किया था और सचेत किया गया है कि राज्य में तापमान में अधिकतम इजाफा और संभवतः बारिश में कमी दर्ज की जाएगी. पर सिर्फ मौसम के बदलते तेवर को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है, जंगलों में आग की वजहें कुछ और भी हैं. सिर्फ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि दुनियाभर में जंगलों में आग लगने की घटनाओं के पीछे मानवीय दखल भी एक मुख्य कारण माना जाता है. भारत के पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले वन अनुसंधान संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, 95% जंगल की आग मानवीय भूल की वजह से होती है.वो कैसे? तो अक्सर ग्रामीण जंगल में जमीन पर गिरी पत्तियों पर या सूखी घास पर आग लगा देते हैं ताकि उसकी जगह पर नई घास उग सके. ये आग भड़क जाने पर बेकाबू होती जाती है और फिर विकराल रूप ले लेती है. इसके अलावा टूरिस्ट कई बार जलती हुई सिगरेट या दूसरे पदार्थ जंगल में फेंक देते हैं, जिसके कारण आग पूरे जंगल में फैल जाती है. वन विभाग में आवश्यकता से कम कर्मचारी भी एक बड़ी वजह है. उपर से स्टाफ को ठीक ट्रेनिंग नहीं मिलती है. छोटा स्टाफ में कमी हो रही है, लोग रिटायर हो रहे हैं और उपरे से नई भर्ती भी नहीं हो रही है.” इन सभी मोर्चों पर प्रशासन, जिला प्रशासन और वन विभाग को नए सिरे से सोचने की जरूरत है. आग से लड़ने के लिए नवंबर के महीन से ही खुद को तैयार करना होगा जो जून तक बिना किसी के रूकावट के चलते रहनी चाहिए. वनाग्नि रोकने में सामुदायिक सहभागिता बहुत ज़रूरी है और इसे मज़बूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए. चीड़ की पत्तियों से बिजली उत्पादन भी किया जाता है. उत्तराखंड में छोटे स्तर पर सही लेकिन कई संस्थाएं इससे बिजली पैदा कर रही हैं. जबकि, विदेशों में तो इसका इस्तेमाल गार्डनिंग के साथ ही चाय बनाने के लिए भी होता है. पेंट, पेपर, पेपर बोर्ड और फ्यूल बनाने में भी इसका अहम रोल हैं. पिरूल के इस्तेमाल के लिए उत्तराखंड ने अलग पॉलिसी तो बनाई है, लेकिन उस पर अमल होता नहीं दिखाई देता. कुमाऊं के के वन संरक्षक बताते हैं कि पिरूल के इस्तेमाल के लिए नीति बनाई गई है. लेकिन अभी तक इसका उतना उपयोग नही हो रहा है, जितनी उम्मीद थी. अब हरित अर्थव्यवस्था का नया आधार बनने जा रही हैं। पिरुल को महज एक ज्वलनशील अपशिष्ट न मानकर बहुमूल्य संसाधन के तौर पर स्थापित किया जा रहा है।इसके लिए पिरुल से ब्रिकेट्स-पैलेट्स (कोयले की ईंट-गुटिका) इकाइयों की स्थापना पर सरकार विशेष जोर दे रही है। अभी तक नौ इकाइयां स्थापित की जा चुकी हैं, जिनकी संख्या 57 तक ले जाने का लक्ष्य है। इस पहल से जंगल तो आग से बचेंगे ही, स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के द्वार भी खुलेंगे। ऐसे में दूसरी वनस्पतियां नहीं उग पातीं। इस परिदृश्य में पिरुल से पार पाने के दृष्टिगत इसे संसाधन के तौर पर उपयोग में लाने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। पिरुल से ब्रिकेट्स-पैलेटस को सबसे बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।पिरुल एकत्रीकरण में समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित की गई है। पिरुल एकत्र करने वाले समूहों व अन्य संस्थाओं से यह 10 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से खरीदा जा रहा है। तय है कि अगर पिरूल का सही इस्तेमाल किया जाए तो, जंगलों में धधकी आग पर तो हमेशा के लिए काबू पाया ही जा सकेगा, साथ ही युवाओं को रोजगार भी दिया जा सकता है. यही नहीं राज्य की इकोनॉमी को बढ़ाने में इसका बड़ा योगदान हो सकता है, बस जरूरत है तो मजबूत इच्छा शक्ति की. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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