डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
कभी धराली बाजार के पीछे नजर आने वाले खूबसूरत सेब के बगीचों की जगह आज दूर-दूर तक सैलाब के साथ आये मलबे व पत्थरों का ढेर नजर आता है,उत्तराखंड के हर्षिल क्षेत्र में एक बार फिर आपदा का खतरा गहराने लगा है। बीते साल अगस्त में धराली और हर्षिल में आई आपदा के दौरान भागीरथी नदी में बनी झील अब तक खत्म नहीं हुई है। करीब नौ महीने बीत जाने के बाद भी झील का जलस्तर जस का तस बना हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ गई है।ग्रामीणों के अनुसार यह झील लगभग एक किलोमीटर तक फैली हुई है। हैरानी की बात यह है कि इस समय नदी में पानी की मात्रा कम होने के बावजूद झील का जलस्तर कम नहीं हुआ है। इससे यह आशंका और गहरी हो गई है कि आने वाले मॉनसून में स्थिति और गंभीर हो सकती है। स्थानीय लोगों ने सिंचाई विभाग पर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आपदा के बाद विभाग ने केवल नदी को चैनलाइज करने का काम किया और किनारों पर मलबा डाल दिया। लेकिन पानी की निकासी के लिए कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई। इसके चलते झील का पानी बाहर निकलने के बजाय वापस उसी में जमा हो रहा है। उनका कहना है कि बरसात के समय तेलगाड़ नदी के उफान पर आने से स्थिति और बिगड़ सकती है। तेज बहाव मलबे को धक्का देगा, जिससे पानी का प्रवाह अनियंत्रित हो सकता है। ऐसे में पूरे हर्षिल कस्बे पर खतरा मंडराने की आशंका जताई जा रही है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि अब तक सुरक्षा के नाम पर केवल सीमित उपाय किए गए हैं, जैसे कुछ जगहों पर वायरक्रेट लगाए गए हैं। लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। लोगों में डर है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बड़ी आपदा हो सकती है। ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से मांग की है कि जल्द से जल्द स्थायी समाधान निकाला जाए। उन्होंने जल निकासी की उचित व्यवस्था करने और मॉनसून से पहले मजबूत सुरक्षात्मक कार्य शुरू करने की अपील की है, ताकि भविष्य में किसी बड़े खतरे से बचा जा सके। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के रूप में एक बड़ी समस्या का सामना कर रही है. इस समस्या से निपटन के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं. इस जलवायु परिवर्तन के भविष्य में क्या दुष्परिणाम होंगे इसको लेकर जर्मनी स्थित पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं एक शोध किया है, जिसमें उन्होंने चौंकाने वाले खुलासे किये हैं.शोधकर्ताओं के अनुसार पृथ्वी पर बढ़ रहे तापमान के चलते हिमालय क्षेत्र की हजारों प्राकृतिक झीलों से बाढ़ का खतरा बन सकता है. उत्तराखंड में भी हजारों प्राकृतिक झील मौजूद है. इन पर जलवायु परिवर्तन का क्या असर पड़ेगा. क्या जिस खतरे की आशंका पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने जताई है वो उत्तराखंड के लिए कोई बड़ी तबाही को कारण तो नहीं बनेगा अगर यहां दोबारा से बादल फटने या भारी वर्षा से तेल गाड में पानी बढ़ता है तो यह दोबारा से हर्षिल घाटी के लिए आपदा का सबब बन सकता है। हालांकि एसडीआरएफ ने इससे इनकार किया है।दंश झेल रहे हैं. लेकिन चुनाव के बाद ये वादे और जनता दोनों को ही राजनीतिक दल भूल जाते हैं. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












