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सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था की अनमोल जड़ी-बूटी !

07/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अद्भुत चीजों का भंडार है. यहां चमत्कारी जड़ी-बूटियां बहुतायत में मिलती हैं. ऐसी ही एक जड़ी है ‘कीड़ा जड़ी’ या ‘यारसा गुंबा’. कीड़ा जड़ी को हिमालयन वियाग्रा भी कहते हैं. ये हिमालय के बर्फ वाले चरागाहों में पाई जाती है. जैसे-जैसे बर्फ पिघलने लगती है, उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोग कीड़ा जड़ी की खोज में निकल जाते हैं. यह हिमालय के 3000 मीटर से ऊपर के हिस्सों में पाई जाती है. कीड़ा जड़ी तब बनती है, जब कैटरपिलर एक घास खाता है. उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों धारचूला और मुनस्यारी में कीड़ा जड़ी पाई जाती है. एक महीने पहले तक मुनस्यारी और धारचूला के ऊंचाई वाले बुग्याल बर्फ की मोटी चादर से ढके हुए थे. अप्रैल और मई में हुई बर्फबारी के कारण यारसा गुंबा यानी कीड़ा जड़ी का सीजन तय समय पर शुरू नहीं हो पाया था. अब बर्फ पिघलने के बाद हालात बदल गए हैं.उत्तराखंड का हिमालयी क्षेत्र अद्भुत चीजों का भंडार है. यहां चमत्कारी जड़ी-बूटियां बहुतायत में मिलती हैं. ऐसी ही एक जड़ी है ‘कीड़ा जड़ी’ या ‘यारसा गुंबा’. कीड़ा जड़ी को हिमालयन वियाग्रा भी कहते हैं. ये हिमालय के बर्फ वाले चरागाहों (जिन्हें स्थानीय भाषा में बुग्याल कहते हैं) में पाई जाती है. जैसे-जैसे बर्फ पिघलने लगती है, उत्तराखंड के ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले लोग कीड़ा जड़ी की खोज में निकल जाते हैं. यह हिमालय के 3000 मीटर से ऊपर के हिस्सों में पाई जाती है. कीड़ा जड़ी तब बनती है, जब कैटरपिलर एक घास खाता है. उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों धारचूला और मुनस्यारी में कीड़ा जड़ी पाई जाती है. एक महीने पहले तक मुनस्यारी और धारचूला के ऊंचाई वाले बुग्याल बर्फ की मोटी चादर से ढके हुए थे. अप्रैल और मई में हुई बर्फबारी के कारण यारसा गुंबा यानी कीड़ा जड़ी का सीजन तय समय पर शुरू नहीं हो पाया था. अब बर्फ पिघलने के बाद हालात बदल गए हैं. सीमांत क्षेत्र के हजारों ग्रामीण घर छोड़कर उच्च हिमालयी बुग्यालों की ओर रवाना हो चुके हैं. मुनस्यारी, धारचूला और बंगापानी तहसील से 15 हजार से अधिक महिला-पुरुष इन दिनों यारसा गुंबा की तलाश में बुग्यालों में डेरा डाले हुए हैं. इसके चलते अधिकतर गांवों में केवल बुजुर्ग और छोटे बच्चे ही रह गए हैं. कई गांवों में दिनभर सन्नाटा पसरा रहता है, क्योंकि परिवार के ज्यादातर सदस्य ऊंचाई वाले चारागाहों में पहुंच चुके हैं. ग्रामीणों के लिए यह सिर्फ एक मौसमी गतिविधि नहीं, बल्कि सालभर की कमाई का बड़ा जरिया भी है. यही वजह है कि मौसम साफ होते ही लोग टेंट, राशन, गर्म कपड़े और जरूरी सामान के साथ बुग्यालों की ओर निकल पड़े हैं. हालांकि वैज्ञानिक लगातार बढ़ते दोहन और बदलते मौसम के कारण यारसा गुंबा के भविष्य को लेकर चिंता भी जता रहे हैं. यारसा गुंबा एक तरह के कीड़े का लार्वा होता है. कीड़ा जड़ी या यारसा गुंबा  कैटरपिलर फंगस या सेकॉर्डिप्स कहा जाता है. सर्दी के मौसम में, जब लार्वा जमीन के अंदर रहते हैं, तब एक खास किस्म की फफूंद इनके शरीर में प्रवेश कर जाती है. इसके बाद फफूंद उसके सिर वाले हिस्से से एक पौधे के अंकुर की तरह बाहर निकलती है. कीड़ा जड़ी बर्फ से ढकी रहती है. मई-जून माह में जब बर्फ पिघलती है, तो इसे निकाला जाता है. नीचे कीड़ा (लार्वा) और सिर पर फफूंद के घास जैसा नजर आने से इसे पिथौरागढ़ और नेपाल में कीड़ा जड़ी कहा जाता है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत गुणवत्ता के आधार पर लगभग ₹10 लाख से ₹20 लाख प्रति किलो तक होती है. पिथौरागढ़ में इस समय कीड़ा जड़ी की कीमत 15 लाख रुपए प्रति किलो तक है. कीड़ा जड़ी का उपयोग भारत में बेहद कम होता है. यह बेशकीमती कीड़ा जड़ी नेपाल के रास्ते चीन की मंडी तक पहुंचती है. चीन में इससे टॉनिक और दवाइयां बनाई जाती हैं. पिथौरागढ़ जिले में मुनस्यारी के रालम, राजरंभा, नागनीधुरा और नामिक क्षेत्र के अलावा धारचूला और बंगापानी के छिपलाकेदार, सुमढुंग, दारमा घाटी के सौन, नागलिंग, बालिंग, फिलम तथा व्यास घाटी के नज्यांग धुरा क्षेत्र यारसा गुंबा के प्रमुख जोन माने जाते हैं. इन्हीं इलाकों में ग्रामीण अस्थायी शिविर लगाकर रहते हैं. पिथौरागढ़ के अलावा बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील तथा चमोली और उत्तरकाशी के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भी यारसा गुंबा पाया जाता है.  यारसा गुंबा को पहचानना सबसे कठिन काम होता है. बर्फ पिघलने के बाद इसका केवल बेहद पतला हिस्सा जमीन से बाहर दिखाई देता है. इसे देखने के लिए घंटों झुककर घास और मिट्टी को बारीकी से खंगालना पड़ता है. दिखाई देने पर इसे नुकीले औजार से सावधानीपूर्वक निकाला जाता है. क्योंकि टूटने पर इसकी गुणवत्ता प्रभावित हो जाती है.  स्थानीय लोगों का कहना है कि एक दशक पहले तक नवंबर से फरवरी के बीच अच्छी बर्फबारी होती थी और मार्च से बर्फ पिघलने लगती थी. लेकिन हाल के वर्षों में मौसम का पैटर्न तेजी से बदला है. अब अप्रैल और मई तक हिमपात देखने को मिल रहा है. इस बार भी मई की शुरुआत तक कई बुग्याल बर्फ से ढके रहे. इस कारण यारसा गुंबा सीजन समय पर शुरू नहीं हो पाया. जून में जाकर बड़े पैमाने पर दोहन शुरू हुआ है. उत्तराखंड में कीड़ा जड़ी को लेकर एक नीति बनी है. इसके अनुसार कीड़ा जड़ी दोहन के लिए रजिस्ट्रेशन करवाना होता है. संबंधित जिलों के डीएफओ कीड़ा जड़ी ढूंढने के अनुमति प्रदान करते हैं. कीड़ा जड़ी केवल स्थानीय निवासियों या वन पंचायत के सदस्यों को परमिट के आधार पर निकालने की अनुमति मिलती है. संग्रहकर्ताओं और व्यापारियों को उत्तराखंड वन विकास निगम या संबंधित वन पंचायत के साथ पंजीकृत होना अनिवार्य है. इकट्ठा की गई कीड़ा जड़ी पर नियमानुसार रॉयल्टी जमा करनी होती है. बुग्यालों (उच्च हिमालयी घास के मैदानों) को नुकसान से बचाने के लिए रोटेशन के आधार पर कीड़ा जड़ी निकालने की अनुमति दी जाती हैयारसा गुंबा दोहन के लिए स्थानीय स्तर वन पंचायतों के द्वारा निर्धारित शुल्क जमा कराया जाता है. वन विभाग के द्वारा प्रभागीय वनाधिकारी पिथौरागढ़ के माध्यम से विज्ञप्ति जारी कर ठेकेदारों को लाइसेंस दिया जाता है. ठेकेदार फिर ग्रामीण द्वारा निकाले हुए यारसा गम्बू को खरीदते हैं. कीड़ा जड़ी दुर्गम स्थलों में रहने वाले लोगों के आजीविका का एक मुख्य साधन है और कीड़ा जड़ी से वहां के स्थानीय निवासियों को अच्छी-खासी इनकम होती है क्योंकि कीड़ा जड़ी का चीन में और ईस्ट एशिया के बाजारों में काफी डिमांड है दुर्गम स्थलों में रहने वाले लोगों के साल भर का इनकम कीड़ा जड़ी से ही होता है। और यह एक तरीके से प्रकृति का दुर्गम क्षेत्रों में रहने वाले स्थानीय लोगों की कमियों को पूरा किया है। यही वजह है की इन क्षेत्रों से अभी तक प्लान नहीं हुआ है लिहाजा यह दुर्गम क्षेत्र ऐसे हैं जहां सरकार चाहकर भी विकास नहीं कर सकती। उत्तराखंड के अलावा नेपाल, भूटान, तिब्बत समेत कुछ अन्य देश भी है जहां कीड़ा-जड़ी पाए जाते हैं इसके साथ ही नेपाल, भूटान, तिब्बत में कीड़ा जड़ी को लेकर तमाम रिस्ट्रिक्शंस भी लगाए हैं ताकि जहां कीड़ा जड़ी पाई जाती है वह क्षेत्र प्रभावित ना हो, और ज्यादा मात्रा में कीड़ा जड़ी का दोहन ना हो पाए। उसके साथ ही लोगों को इतनी ऊंचाई पर जाने की वजह से ग्लेशियर पर ज्यादा प्रभाव ना पड़े। लेकिन उत्तराखंड के इन क्षेत्रों पर ऐसी कोई नियम कानून नहीं बनाए गए हैं ताकि ज्यादा मात्रा में कीड़ा जड़ी का दोहन ना हो पाए इसके साथ ही पर्यावरण पर इसका ज्यादा फर्क ना पड़े। ‘नेपाल सरकार ने चीन-हांगकांग, ताइवान व कोरिया के साथ यारसा गंबू के व्यापार की सहमति तय की है. इस पर निर्यात शुल्क भी तय किया गया है. इसलिए 1992 में 1.50 लाख नेपाली रु. के भाव पर खरीदा-बेचा जा रहा यारसा गंबू नेपाल में आज 10-12 लाख प्रति किलो व चीन-ताइवान में 16-20 लाख रु. प्रति किलो की ऊंचाइयां छू रहा है.’लेकिन उत्तराखंड में हालात इतने अच्छे नहीं हैं. अखिल भारतीय किसान महासभा मुनस्यारी के अध्यक्ष का मानना है कि राज्य सरकार को केंद्र से मिलकर यारसा गंबू के संग्रहण व विपणन की एक सुस्पष्ट राष्ट्रीय नीति बनवानी चाहिए. वे कहते हैं, ‘इसके संग्रहण व व्यापार पर लगने वाले सभी करों, वन रॉयल्टी, वैट व आयात-निर्यात करों का निर्धारण कर इसे चीन-भारत व्यापार में सम्मिलित किया जाना चाहिए. तभी स्थानीय ग्रामीण शोषण व उत्पीड़न से बच सकते हंै. नहीं तो जो यारसा गंबू राज्य के सीमांत क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था के लिए कहीं बड़ा संसाधन बन सकता था वह यहां के लोगों के लिए दहशत व परेशानी का सबब बन गया है.’लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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