देहरादून, 12 अगस्त 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में बुधवार को राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के अवसर पर पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन की 134वीं जयंती श्रद्धापूर्वक मनाई गई। इस अवसर पर ‘रंगनाथन से जनरेटिव एआई तक : एआई के युग में पुस्तकालय विज्ञान के पाँच नियमों की पुनर्कल्पना’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पुस्तकालय विज्ञान, डिजिटल तकनीक, पठन संस्कृति तथा बदलते समय में पुस्तकालयों की भूमिका पर गंभीर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. प्रवीण कपूर, वरिष्ठ एसोसिएट लाइब्रेरियन, यूपीईएस तथा डॉ. राजीव कुमार अत्री, लाइब्रेरियन, यूपीईएस रहे। वक्ताओं ने डॉ. एस. आर. रंगनाथन के पुस्तकालय विज्ञान के क्षेत्र में योगदान को रेखांकित करते हुए बताया कि उनके द्वारा प्रतिपादित पाँच नियम आज भी पुस्तकालय व्यवस्था के मूल आधार हैं। उन्होंने कहा कि जनरेटिव एआई और डिजिटल तकनीक के दौर में इन नियमों को नए संदर्भों में समझने की आवश्यकता है। पुस्तकालय अब केवल पुस्तकों के संग्रह और निर्गमन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ज्ञान, सूचना, तकनीक और समाज के बीच सेतु की भूमिका निभा रहे हैं।
वक्ताओं ने कहा कि एआईआधुनिक पुस्तकालय कार्यों जैसे अधिग्रहण, सूचीकरण, वर्गीकरण, मेटाडेटा निर्माण, संग्रह विकास, ई-संसाधनों की खोज एवं अभिगम, संदर्भ एवं उपयोगकर्ता सेवाओं, व्यक्तिगत अनुशंसाओं तथा शोध सहयोग को किस प्रकार प्रभावी बना सकता है। नैतिक एवं उत्तरदायी उपयोग, अकादमिक ईमानदारी, गोपनीयता, कॉपीराइट तथा सूचना के आलोचनात्मक मूल्यांकन में पुस्तकालयाध्यक्षों की उभरती भूमिका पर भी जोर दिया । यह भी कहा गया कि रंगनाथन का उपयोगकर्ता-केंद्रित दर्शन आज भी प्रासंगिक है और एआई पुस्तकालयों को अधिक सुलभ, समावेशी, बुद्धिमान एवं भविष्य के लिए तैयार बनाने के नए अवसर प्रदान करता है।
कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुई। इसके बाद कु. वैदेही भट्ट ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। कार्यक्रम में वरिष्ठ पुस्तकालयाध्यक्ष जय भगवान गोयल ने अतिथि वक्ताओं का स्वागत किया। उन्होंने पुस्तकालय सेवा की बदलती आवश्यकताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पुस्तकालयकर्मियों की भूमिका आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
पुस्तकालयाध्यक्ष एवं प्रशासनिक अधिकारी डॉ. डी. के. पाण्डे ने कार्यक्रम की रूपरेखा और आयोजन की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की विभिन्न गतिविधियों और समाज में उसके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पुस्तकालय को केवल पुस्तकों के संग्रह के रूप में नहीं, बल्कि अध्ययन, संवाद, शोध और सांस्कृतिक गतिविधियों के जीवंत केन्द्र के रूप में विकसित करना आवश्यक है।
कार्यक्रम में दून पुस्तकालय की लाइब्रेरी प्रोफेशनल मीनाक्षी कुकरेती ने डिजिटल युग में पठन संस्कृति की चुनौतियों पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने मोबाइल और डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध सामग्री के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में यह सवाल उठाया कि पुस्तकों और पुस्तकालयों की आवश्यकता आज भी क्यों बनी हुई है। उन्होंने कहा कि मोबाइल पर उपलब्ध त्वरित सामग्री के बावजूद पुस्तक का गहन अध्ययन व्यक्ति में एकाग्रता, चिंतन और विषय की गहराई को समझने की क्षमता विकसित करता है।
मधु डंगवाल ने पुस्तकालय सेवा के मूल उद्देश्य पर विचार रखते हुए कहा कि चुनौतियां अनेक हैं, लेकिन पुस्तकालय समुदाय के पास “सम्मान, सुधार और सेवा” का संकल्प होना चाहिए। उन्होंने कहा, “किताबें रीडर्स के लिए हैं और लाइब्रेरी समाज के लिए।” पुस्तकालयों की सार्थकता तभी है जब वे समाज और पाठकों की बदलती जरूरतों के अनुरूप स्वयं को निरंतर विकसित करें।
शकुंतला मरछ्याल ने “किताबों से बदलती सोच, सोच से बदलता समाज” विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि एक अच्छी किताब व्यक्ति की सोच को बदलने और उसे जीवन में सही दिशा देने की क्षमता रखती है। बदली हुई सोच केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह परिवार, समाज और व्यापक स्तर पर सकारात्मक परिवर्तन का आधार बन सकती है।
प्रियंका चौहान ने पुस्तकालय प्रोफेशनल्स की समाज में भूमिका पर विचार प्रकट किये.
मीनू चौधरी ने भी पुस्तकालय की समाज में भूमिका पर अपना शोध पत्र पढ़ा.
कार्यक्रम में दून पुस्तकालय के वरिष्ठ पाठक सदस्य शशि भूषण गर्ग, युवा पाठक मोहित रतूड़ी तथा राघव उनियाल ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने पुस्तकालय के साथ अपने अनुभवों और पठन के महत्व पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर शुभम बिष्ट और राधा पुंडीर ने कबीर गायन प्रस्तुत कर कार्यक्रम में साहित्य और संगीत का सुंदर समावेश किया।
राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के अवसर पर दून पुस्तकालय के वरिष्ठ सहायक मधन सिंह बिष्ट को उत्कृष्ट पुस्तकालय सेवा के लिए सम्मानित किया गया। उनके पुस्तकालय के प्रति समर्पण और सेवाभाव की सराहना की गई।
कार्यक्रम का संचालन श्री जगदीश सिंह महर ने किया। जबकि धन्यवाद ज्ञापन सुमन भारद्वाज ने किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में योगिता थपलियाल, सुंदर बिष्ट और गीतांजलि का विशेष सहयोग रहा।
इस अवसर पर अर्थशास्त्री व समाज विज्ञानी डॉ. पंकज नैथानी, आलोकसरीन,हरि चंद निमेष, पीताम्बर दत्त जोशी, सुर्कीति आर्या, स्वीटी, पंकज शर्मा, रेणुका वेदपाठी, गामा चंद, राकेश कुमार, अवतार सिंह, विजय बहादुर, सुनील, हिमांशु सहित दून पुस्तकालय के पुस्तकालय सदस्य, पाठक, पुस्तकालयकर्मी एवं अन्य लोग उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में यह भावना प्रमुखता से उभरकर सामने आई कि डिजिटल तकनीक पुस्तकालयों का विकल्प नहीं, बल्कि उनके विकास का नया माध्यम बन सकती है। रंगनाथन के विचारों को जनरेटिव एआई के वर्तमान संदर्भ से जोड़ते हुए पुस्तकालयों को अधिक पाठक-केंद्रित, तकनीक-सक्षम और समाजोन्मुख बनाने की आवश्यकता पर बल दिया गया। राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस का यह आयोजन इसी संकल्प के साथ सम्पन्न हुआ कि पुस्तकालय ज्ञान और समाज के बीच जीवंत सेतु की अपनी भूमिका को भविष्य में और अधिक मजबूत करेंगे।











