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भारत में बढ़ रही ई-कचरे की समस्या पर्यावरण को पहुंच रहा नुकसान

27/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
डिजिटल युग ने हमारे जीने और काम करने के तरीके को बदल दिया है, लेकिन इसने एक बढ़ती हुई समस्या भी पैदा कर दी है: इलेक्ट्रॉनिक कचरा, या ई-कचरा। हर बार जब हम अपने स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी या रसोई के उपकरण अपग्रेड करते हैं, तो हम पुराने उपकरणों को पीछे छोड़ देते हैं। यदि इन वस्तुओं का सही ढंग से निपटान न किया जाए, तो ये पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती हैं। इस ब्लॉग में, हम जानेंगे कि व्यक्ति और व्यवसाय ई-कचरे का जिम्मेदारी से प्रबंधन कैसे कर सकते हैं, वैश्विक स्तर पर कौन से समाधान विकसित किए जा रहे हैं, और एक चक्रीय इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था का समर्थन करने के लिए नीतियां कैसे विकसित हो रही हैं। भारत ही नहीं दुनिया ई-कचरे के निस्तारण की समस्या से जूझ रही है। ऐसे में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास के शोधकर्ताओं ने मेक इन इंडिया के अंतर्गत एक स्वदेशी प्रायोगिक संयंत्र विकसित किया है।यह प्रतिवर्ष 100 टन इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट का प्रसंस्करण करने की क्षमता रखता है। यह प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (पीसीबी) के उपचार के लिए डिजाइन किया गया है। इसे भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के तिरुचिरापल्ली में स्थित परिसर में स्थापित किया गया है। पीसीबी इलेक्ट्रॉनिक अपशिष्ट सबसे अधिक खतरनाक और धातुओं से भरपूर घटकों में से एक हैं। इनमें तांबा, सीसा और टिन जैसी धातुएं पर्याप्त मात्रा में होती हैं।यदि इस कचरे का उचित प्रबंधन नहीं किया जाए तो ये धातुएं मिट्टी और भू-जल में रिसकर लंबे समय तक पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर सकती है। ऐसे समय में जब भारत हर वर्श लगभग 50 लाख मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा कर रहा हो, तब आईआईटी मद्रास के षोधार्थियों की यह उपलब्धि बहुत बड़ी है। क्योंकि यह अनुपयोगी हुए ई-उपकरणों से मिट्टी पानी या वायु को प्रदूशित किए बिना मूलवान धातुएं निकाल कर उन्हें पुनः उपयोग के लायक बना देता है।आआईटी मद्रास के रासायनिक अभियांत्रिकी विभाग के प्राध्यापक का कहना है कि भारत में ई-कचरे की चुनौती बढ़ने के साथ यह संयंत्र साफ-सुथरे तरीके से धातु निकालने के लिए एक ऐसा माॅडल है, जिसे आसानी से बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकता है। यह काम मेक इन इंडिया सर्कुलर इकोनाॅमी और जरूरी खनिजों की सुरक्षा के लक्ष्यों के अनुरूप है। यह अकादमिक अनुसंधान को प्रौद्योगिकी विकास में बदलने का दुर्लभ उदाहरण है।इस प्रक्रिया को एकमात्र अम्ल के प्रयोग से संपन्न कर लिया जाता है। इसमें उच्च स्तरीय सुरक्षा के स्वचालित उपाय किए गए हैं। यह संयंत्र पूरी तरह भारतीय कंपनियों द्वारा निर्मित है। यह संयंत्र भारत और एषियाई देषों के लिए इसलिए बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि पर्यावरण पर वैष्विक निगरानी रखने वाली सिएटल स्थित संस्था बासेल एक्षन नेटवर्क (बीएएन) की रिपोर्ट में जानकारी दी है कि अमेरिका से लाखों टन खराब इलेक्ट्रोनिक सामग्री कई देषों में ठिकाने लगाने की दृश्टि से भेजी जा रही है। जिनमें से अधिकांष दक्षिण-पूर्व एषिया के विकासषील देष हैं।इन देशों में इस खतरनाक कचरे का सुरक्षित रूप से नष्ट करने का कोई उपाय नहीं है, इसलिए वे इसे लेने को तैयार नहीं हैं। बावजूद दस अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रयोग की उम्र समाप्त कर चुके इलेक्ट्रॉनिक कचरे को एशिया और पश्चिमी एशिया के निर्धन देशों में ठिकाने लगा रही है। इसे ई-कचरे की छिपी हुई सुनामी माना जा रहा है।रपट के अनुसार यह ई-कचरे की अदृश्य सुनामी है, क्योंकि ये गरीब देश इस कचरे का पुनर्चक्रण करने में समर्थ नहीं हैं। फिर भी ताकतवर पूंजीपति देश इन देशों को अपने कचरे का ठिकाना बनाने में लगे हुए हैं।अतएव पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाली संस्थाओं को यह आकलन करना कठिन हो रहा है कि घातक कचरा जिन देशों में फेंका जा रहा है, वहां का वायुमंडल किस हद तक प्रभावित एवं प्रदूषित होगा। वहां के लोगों के स्वास्थ पर कितना असर पड़ेगा, यह अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा है। इस कचरे में कंप्यूटर, लैपटाॅप, टैबलेट, मोबाइल और अन्य आईटी उपकरण षामिल हैं।इनमें सीसा, कैडमियम और पारा जैसी सामग्रियां हैं, जो मूल्यावन होने के साथ विशाक्त हैं। जैसे-जैसे गैजेट्स नए माॅडल के साथ तेजी से बदले जा रहे हैं, वैसे-वैसे पुनर्चक्रित नहीं किए जाने वाला कचरा पांच गुना बढ़ता जा रहा है। इस नजरिये से भारत में निर्मित यह संयंत्र अत्यंत उपयोगी है। भविश्य में इसके निर्यात से भारत विदेषी पूंजी भी कमाएगा।संयुक्त राश्ट्र के अंतरराश्ट्रीय दूरसंचार संघ और अनुसंधान षाखा (यूएनआईटीएआर) के अनुसार एकत्रित आंकड़े बताते है कि वैष्विक स्तर पर 2022 में 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कबाड़ उत्पन किया गया। 2030 तक इसके उत्पादन की मात्रा 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाने का अनुमान है।रपट के अनुसार हर महीने लगभग 2000 कंटेनरों में लगभग 33,000 मीट्रिक टन अमेरिका में इस्तेमाल किया गया ई-कचरा अमेरिकी बंदरगाहों से बाहर भेजा जाता है। इन कंटेनरों की खेपों की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को ई-कचरा ब्राॅकर कहा जाता है। ये आमतौर पर स्वयं कचरे का पुनर्चक्रण करने की बजाय इसे लाचार गरीब देषों के बंदरगाहों पर उतार देती हैं। यह कचरा लगातार एषियाई देषों में कचरे के बोझ को बढ़ाकर कई तरह के पर्यावरणीय संकट पैदा कर जल, वायु और पृथ्वी को प्रदूशित कर रहा है।इस कचरे से घातक लैंडफिल गैसों का भी उत्सर्जन कुछ सालों के बाद होने लगता है। इनसे उत्पन जहरीला रसायन जल और मिट्टी को दूशित करता है। इस कचरे का बहुत बड़ा हिस्सा गरीब लोग अपनी आजीविका चलाने के लिए कबाड़खानों में पहुंचा देते हैं।यहां काम करने वाले मजदूर अकसर बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के उन्हें हाथों से जला एवं पिघला कर अलग कर खोलते हैं। इस प्रक्रिया से विषाक्त धुआं निकलता है, जो अत्यंत हानिकारक होता है। बासेल एक्शन नेटवर्क की संधि के मुताबिक इस्तेमाल किए गए ई-कचरे को एक देश से दूसरे देश भेजने की अनुमति केवल ऐसे कचरे को है जिसे पुनर्चक्रित करके पुनः इस्तेमाल किया जा सके और जो पर्यावरण को प्रदूषित नहीं करने वाला हो। लेकिन ये कंपनियां ऐसी किसी शर्त का पालन नहीं कर रही हैं। यही कारण है कि दुनिया में पुनर्चक्रण की तुलना में ई-कबाड़ में पांच गुना वृद्धि हो रही है।      आज ई-कचरा,जिसमें बड़ी मात्रा में प्लास्टिक के उपकरण भी षामिल हैं,नश्ट करना भारत समेत दुनिया के देषों के लिए मुष्किल हो रहा है। इसे नष्ट करने के जैविक उपाय तलाशे जा रहे हैं। जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने एक ऐसे जीवाणु के अनुसंधान का दावा किया है,जो जैविक रूप से प्लास्टिक नष्ट कर सकता है। हालांकि भारत में यही काम औद्योगिक एवं प्रौद्योगिकी कचरे को नष्ट करने के लिए केंचुओं से कराया जा रहा है।औसतन एक टन ई-कचरे के टुकड़े करके उसे यांत्रिक तरीके से पुनर्चक्रित किया जाए तो लगभग 40 किलो धूल या राख जैसा पदार्थ तैयार होता है। इसमें अनेक कीमती धातुएं समाहित रहती हैं।इन धातुओं को अलग करने की प्रक्रिया में हाथों से छंटाई, चुंबक षक्ति से विलगीकरण, विद्युत-विच्छेदन, सेंट्रीफ्यूजन और उलट आॅस्मोसिस जैसी तकनीकें षामिल हैं। लेकिन ये तरीके मानव शरीर और पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले हैं, इसलिए इस हेतु बायो-हाइड्रो मेटलर्जिकल तकनीक कहीं ज्यादा बेहतर मानी जा रही है। इस तकनीक को अमल लाते वक्त सबसे पहले बैक्टीरियल लिंचिंग प्रोसेस ;बायो लिंचिंग  का प्रयोग करते हैं। इसके लिए ई-कचरे को बारीक पीसकर उसे जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। बैक्टीरिया में मौजूद एंजाइम कचरे में उपस्थित धातुओं को ऐसे यौगिकों में बदल देते हैं कि उनमें गतिशीलता पैदा हो जाती है। बायो-लिंचिंग की विधि में जीवाणु कुछ विशेष धातुओं को अलग करने में मदद करते हैं। हालांकि कई प्रकार के जीवाणुओं और फफूंद का उपयोग प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से सीसा, तांबा और टिन को अलग करने के लिए किया जाता रहा है। इस हेतु जीवाणुओं की बेसिलस प्रजातियां मसलन सेक्रोमाइसिस सेरेविसी, यारोविया लिपॉलिटिका प्रयोग में लाई जाती हैं।इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के विशेषज्ञों का मानना है कि औसतन एक स्मार्टफोन में 30 मिलीग्राम सोना होता है। यह फोन के सर्किट बोर्ड और इंटरनल कंपोनेंट्स में होता है। एपल ऐसे लाखों आईफोन और कंप्यूटर की रीसाइक्लिंग करता है,जिनमें सोना होता है। एपल अपने निगरानी एडिशन को पुनर्चक्रित भी करता है। इनमें 18 कैरेट की गुणवत्ता वाले तकरीबन 50 ग्राम सोने का इस्तेमाल होता है। साफ है,समस्या बने ई-कचरे को यदि पुनर्चक्रित करने के संयंत्र बड़ी संख्या में लगाए जाते हैं तो बड़े पैमाने पर युवा तकनीकियों को रोजगार तो मिलेगा ही, विकासषील और गरीब देष बड़े स्तर पर इस कचरे को नश्ट करने के झंझट से भी मुक्त हो जाएंगे। इसलिए इस कचरे को जो कंपनियां जिन देषों में ठिकाने लगा रही हैं, वहां इस कचरे के निस्तारण के लिए आईआईटी मद्रास द्वारा निर्मित संयंत्रों को निर्यात भी करने का रास्ता भविश्य में भी खुल जाएगा। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2024 के अनुसार , 2030 तक वैश्विक पुनर्चक्रण दरों को 22% से बढ़ाकर 60% करने से लगभग 346 मिलियन मीट्रिक टन CO₂-समकक्ष उत्सर्जन से बचा जा सकता है और 130 बिलियन डॉलर से अधिक मूल्य की सामग्री को पुनः प्राप्त किया जा सकता है।ई-कचरा पृथ्वी पर सबसे तेजी से बढ़ते कचरे के स्रोतों में से एक है। लेकिन यह एक अधिक चक्रीय और संसाधन-कुशल अर्थव्यवस्था के निर्माण का एक उल्लेखनीय अवसर भी प्रदान करता है। जिम्मेदार निपटान की आदतों को अपनाकर, दूरदर्शी नीतियों का समर्थन करके और नवाचार को बढ़ावा देकर, हम नुकसान को कम कर सकते हैं और उन उपकरणों से मूल्य प्राप्त कर सकते हैं जिनकी हमें अब आवश्यकता नहीं है सरकार को रीसाइक्लिंग करने वाली कंपनियों की मदद करनी चाहिए ताकि वे नई तकनीक का इस्तेमाल कर सकें। वहीं, सभी विशेषज्ञों ने मिलकर कहा कि नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, कचरे पर नजर रखने के लिए सिस्टम होना चाहिए, और अनौपचारिक क्षेत्र के लोगों को भी इस काम में शामिल करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऑडिट होना चाहिए, कीमतों को कम रखने से बचना चाहिए, और लोगों को जागरूक करना चाहिए। बैटरी और ई-कचरा रीसाइक्लिंग को सुरक्षित और टिकाऊ बनाने के लिए नियमों और व्यवस्था में सुधार करने की जरूरत है। ।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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