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विकास की भेंट चढ़ते उत्तराखंड के परंपरागत नौले

27/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ों पर पानी के प्राकृतिक स्रोतों की बात ही अलग है. आज भी जब घरों में नलों से पानी सूख जाता है, तो जनता इन्हीं नौलों और धारों पर निर्भर रहती है. ये प्राकृतिक स्रोत आज भी इंसानों की प्यास बुझा रहे हैं. वैसे तो पहाड़ों के ज्यादातर स्रोत निचले हिस्से या मैदानी इलाकों में होते हैं, लेकिन अल्मोड़ा में काफी ऊंचाई पर स्थित श्री सिद्ध नौला (आज भी खुद में कई रहस्य समेटे हुए हैं. समुद्र तल से इतनी ज्यादा ऊंचाई पर जमीन से निकलता पानी वाकई हैरान करता है.एक समय ऐसा था जब अल्मोड़ा में 300 से ज्यादा नौले हुआ करते थे, अब सिर्फ करीब 50 नौले ही बचे हैं. आज भी दूरदराज से लोग सिद्ध नौले से पानी लेने आते हैं. लोगों का मानना है कि आज भी इस नौले का पानी गंगा के समान पवित्र है. माना जाता है कि श्री सिद्ध नौले का निर्माण चंद वंश के राजाओं ने कराया था. इस नौले में एक सुरंग भी है, जो कथित तौर पर मल्ला महल निकलती थी. कहा जाता है कि इसी सुरंग से होते हुए रानियां यहां तक पहुंचती थीं. बदलते वक्त के साथ यह सुरंग बंद हो गई. इस नौले को लेकर और भी कई किस्से-कहानियां हैं. अल्मोड़ा के पलटन बाजार में स्थित श्री सिद्ध नौला तक पहुंचने के लिए तीन रास्ते हैं. पहला एलेक्जेंडर गेट से होते हुए आप यहां पहुंच सकते हैं. दूसरा एसएसपी कार्यालय से ऊपर की ओर आते हुए आप यहां आ सकते हैं, वहीं तीसरा रास्ता अल्मोड़ा की मेन मार्केट से होते हुए आपको इस नौले तक ले आएगा. इतिहासकार ने बताया कि चंद राजाओं के द्वारा नौले का निर्माण किया गया था. एक वक्त ऐसा था जब 360 से ज्यादा नौले हुआ करते थे पर आज 50 करीब ही नौले देखने को मिलते हैं. उसे वक्त के दौर में जब पानी नहीं होता था, तो लोग नौलों के आश्रित रहते थे. उन्होंने बताया कि सिद्धि नौला काफी ऊंचाई पर है. इसके अलावा ऐसा ही नौला चंपावत के मनेश्वर नौला देखने को मिलता है. जो काफी ऊंचाई में स्थित है. क वक्त ऐसा था जब अल्मोड़ा में करीब 300 से ज्यादा नौले हुआ करते थे पर अब करीब 50 ही नौले देखने को मिलते हैं. धीरे-धीरे अतिक्रमण बढ़ने की वजह से ये नौले खत्म होते गए, पर जो नौले बचे हैं वे आज भी लोगों को पानी दे रहे हैं.जब अल्मोड़ा शहर में पानी नहीं आता है तो लोग इन नौलों पर ही आश्रित रहते हैं और तब लोगों की यहां काफी भीड़ देखने को मिलती है. अल्मोड़ा शहर के विभिन्न इलाकों में आपको यह नौले देखने के लिए मिल जाते हैं. स्थानीय निवासी ने बताया कि शहर में वह पढ़ाई कर रही हैं. अल्मोड़ा में पानी की किल्लत होती है पर यहां के नौले लोगों के लिए जीवनदायी हैं. विभिन्न इलाकों में नौले देखने को मिलते हैं, जो आज भी संरक्षित किए गए हैं. खासतौर से बारिश और गर्मी के समय में पानी की काफी दिक्कत होती है तो ये नौले ही काम आते हैं. इतिहासकार ने बताया कि अल्मोड़ा के नौले जीवन रेखा का काम करते हैं. गर्मियों के समय में देखा जाता है कि लोग नौलों में जाकर पानी लेकर जाते हैं. सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात यह है कि अल्मोड़ा के नौले सुरक्षित नहीं हैं, उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है. ग्लोबल वॉर्मिंग का असर पहाड़ के पानी को भी सुखा रहा है. सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में ही कभी 360 नौले (प्राकृतिक जल स्रोत) हुआ करते थे और लोग नौलों से ही पानी पीते थे. लेकिन कुछ तो ग्लोबल वॉर्मिंग और उससे भी अधिक अंधाधुंध निर्माण कार्य. नौले सूखते गए और लोगों को प्यास बुझाने तक के लिए संघर्ष करना पड़ता हैदरअसल अल्मोड़ा शहर के तेज और अनियंत्रित विकास की कीमत इन नौलों को चुकानी पड़ी है. लोगों ने प्राकृतिक स्रोतों के आस-पास ही मकान बना लिए. और तो और कई नौलों पर ही मकान बना डाले. हालत यह हो गई अब नगर में सिर्फ 40-से 50 नौले ही अस्तिव में हैं. उन नौलों में से भी भी कई नौलों में सीवर का पानी आ जाता और यह पीने लायक नहीं रह गए हैं. जब नौले सूख गए तो जल संस्थान द्वारा लोगों की पेयजल आपूर्ति के लिए टैंकरों का सहारा लिया जाने लगा.  पिछले 20 साल से नगर और आस-पास के साथ दूरस्थ ब्लॉकों के गांवों में भी टैंकरों से पानी की सप्लाई हो रही है. राज्य बनने के बाद लोगों को उम्मीद थी कि पेयजल की परेशानी दूर  हो जाएगी, पर ऐसा नही हुआ. लोगों ने पेयजल की समस्या का समाधान न होने पर अपने गांव ही छोड़ दिए.

जल संस्थान के अधिशासी अभियंता का कहना है कि कुछ गांवों में पंपिग पेयजल योजनाएं बन गई हैं. लेकिन तेज गर्मी पड़ने के बाद स्रोतों में पानी सूख जाता है और गांवों में भी पानी की आपूर्ति के लिए टैंकरों से भी पानी भेजना पड़ता है. राज्य बनने के बाद लोगों को पेयजल किल्लत से निजात मिलने की उम्मीद थी लेकिन राज्य के हुक्मरानों ने इस तरफ ध्यान नही दिया और आज गांव के गांव खाली होने की वजह पानी की कमी भी है. अल्मोड़ा शहर में जिसे 360 नौलों का शहर कहा जाता है, जिसका जिक्र पंडित बद्रीदत्त पांडेय ने ‘कुमाऊ के इतिहास’ में किया है। दूसरी तरफ नैनीताल की कथित तौर पर खोज करने वाला बैरन जो 1840 में अल्मोड़ा आया। उसने लिखा कि अल्मोड़ा में उस समय लगभग 100 जल स्त्रोत थे। ‘पर्वतीय जल स्त्रोत’ नाम किताब के लेखक प्रफुल्ल चंद पंत ने 1988-93 के बीच नौलों और धारों पर एक गम्भीर अध्ययन किया और उन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि बैरन सही था।जैसा कि हम जानते हैं कि 1864 में स्थापित अल्मोड़ा नगर पालिका भारत की सबसे पुरानी नगर पालिकाओं में से एक है। इसके नियम कानून की पुस्तिका में लिखा है कि चेचक के रोगियो अथवा किसी भी संक्रामक रोग से पीड़ित व्यक्ति के कपड़े को धोने के लिए अलग नौले की व्यवस्था थी। रजस्वला स्त्रिायों के स्नान के नौले अलग थे। पीने का पानी जहां से लिया जाए वहां कपड़े धोने और स्नान करने की मनाही थी। क्रिया कर्म के नौले अलग थे। यहां नियम का पालन ना करने वालों पर जुर्माने की व्यवस्था भी थी। मृत्यु के बाद 12 दिनों तक चलने वाले कर्म कांड के लिए क्रिया नौलों का इस्तेमाल किया जाता था। यहां उल्लेखनीय है कि जिन नौलों का इस्तेमाल क्रिया कर्म के लिए किया जाता था, उन्हीं नौलों का पानी कुमाऊ में पीने योग्य बचा हुआ है। दूसरे नौलों की हालत खराब हुई है। संभव है समाज में मौजूदा मृत्यु से भय ने क्रिया नौलों की रक्षा की होगी। सुनारी नौला, चौधरी नौला जैसे जाति आधारित नौले भी कुमाऊ में देखने को मिलते हैं।
कोसी पेयजल योजना सन 1952 में बनी। बावजूद इसके अल्मोड़ा में पानी के लिए नौलों की शरण में जाना मजबूरी थी। इस योजना का पानी भी अल्मोड़ा के लिए पर्याप्त नहीं था। सन 1882 में अल्मोड़ा की जनसंख्या 5000 थी। उस वक्त भयानक सूखा पड़ा था। सारे जल स्त्रोत सूख गए थे। बची थी सिर्फ कपीना धारा। उन दिनों कपीना धारा पर चाय का बगान हुआ करता था। उस धारा के पानी ने लगभग 135 साल पहले पूरे अल्मोड़ा शहर के जीवन की रक्षा की थी। पंडित बद्री दत्त जोशी जिन्होंने बदरिश्वर मंदिर बनाया, ने जिलाधिकारी को जल परियोजना के लिए एक पत्रा लिखा था, जिसमें इस घटना का उल्लेख मिलता है।बल्ढ़ौटी में पांच जलस्त्रोत थे। उस पानी को पहली बार पाइप के जरिए अल्मोड़ा शहर में लाया गया लेकिन उस पानी से अल्मोड़ा की जरूरत पूरी नहीं हुई। कचहरी के पास रम्फा नौला है। वहां जल परियोजना का पानी छोड़ा गया। 1928 में स्याही देवी जल परियोजना आई। स्याही देवी अल्मोड़ा के पास एक बड़ा पहाड़ है। इस पहाड़ को अल्मोड़ा के अभिभावक जैसा माना जाता है। कसार देवी और वानर देवी की पहाड़ी को मिला दें तो इस तीन तरफ से पहाड़ियों से घिरने की वजह से अल्मोड़ा का मौसम ना अधिक गर्म हो पाता है और ना अधिक ठंडा। लेकिन अब अल्मोड़ा कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया है।
वर्ष 1952 कोसी पेयजल योजना बनी। हर गोविन्द पंत विधानसभा अध्यक्ष थे और गोविन्द वल्लभ पंत मुख्यमंत्राी थे। उस समय डिजल के पंप से पानी खींचकर अल्मोड़ा तक लाया गया। कोसी पेयजल योजना आने के बाद घरों में नल आ गया। घरों में सहजता से पानी उपलब्ध होने की वजह से शहर में नौलों की उपेक्षा हुई। कोसी परियोजना का पानी बंद होने के बाद जरूर लोगों को नौलों का ख्याल आता है। पूरा शहर उसके बाद नौलों धारों की तरफ भागता है।जब व्यक्ति श्मशान में जाता है, उसे थोड़ी देर के लिए वैराग्य महसूस होता है और जैसे ही वह घर लौटता है, उसका वैराग्य पीछे छूट जाता है। अल्मोड़ा में भी नौलों धारों की चिन्ता नगरवासियों को उसी समय तक रहती है, जब तक नल में पानी ना आ जाए। नल में पानी आते ही लोग नौलों का चिन्तन भूल जाते हैं। वैराग्य खत्म हो जाता है।
वर्ष 1975 का कुमाऊ गढ़वाल जल संचय संग्रह वितरण अधिनियम है, जो कहता है कि आप किसी भी जल स्त्रोत के 100 मिटर के अंदर कोई झाड़ी, पौधा, पेड़ नहीं काटेंगे। यानि आप ऐसी कोई कार्यवायी नहीं करेगे जिससे उस स्त्रोत को नुक्सान पहुंचता हो। जबकि कुमाऊ क्षेत्रा में ऐसा कोई नौला तलाशना आसान नहीं होगा, जिसका अतिक्रमण नहीं हुआ हो। कई नौलों और धारों को रसूख वाले लोगों ने अपने व्यक्तिगत कब्जे में ले लिया है। एक स्थानीय होटल के कब्जे में ऐसे ही तीन धारे हैं। शहर में सीवर नहीं है और लोगों ने नौलों धारों के साथ अपना सेप्टिक बनाया है। आप सोच सकते हैं कि पूरा अल्मोड़ा पीने के पानी के मामले में किस तरह उस डाल को काटने पर तुला है, जिस पर पूरा शहर बैठा हुआ है।
1563-70 के बीच अल्मोड़ा शहर चंद राजाओं ने विकसित किया। वे सबसे पहले खगमर कोर्ट आए। कोर्ट का अर्थ किला है। यहां आने की खास वजह जल स्त्रोत ही था। यहां पर्याप्त जल स्त्रोत मौजूद था। अब वे नौले खत्म हो गए। 1568 में राजा बालो कल्याणचंद के निधन के बाद उनकी गद्दी पर राजा रुद्रचंद बैठे। राजा रुद्रचंद ने अपने लिए इस पहाड़ी पर मल्ला महल का निर्माण कराया। जो इन दिनों अल्मोड़ा के जिलाधिकारी कार्यालय है।
खगमरकोट और नैल का पोखर जो सिद्ध के नौले के पास है। वहां भी राजा रहे। यह जगह वर्तमान में पल्टन बाजार के पास है। शहर का विस्तार उस समय उत्तर की तरफ हो रहा था। इसी समय मल्ला महल का निर्माण हुआ। गौरतलब है कि मल्ला महल के पूर्वी और पश्चिमी दोनों छोरों पर पानी का पर्याप्त स्त्रोत मौजूद था। जबकि राजाओं के पास नौकर चाकर कारिन्दों की कोई कमी नहीं होती थी। उनका महल कहीं भी बनता तो पानी की कमी नहीं होने पाती। इसके बावजूद राजाओं ने महल/किला बनाते हुए पानी के स्त्रोत का विशेष ख्याल रखा। वैसे अल्मोड़ा के थपलिया में एक राज नौला भी है। इस नौले का नाम राज नौला इसीलिए पड़ा क्योंकि यहां से राजा का पानी जाता था। आज वहां का पानी पीने लायक नहीं बचा, वह प्रदूषित हो चुका है।अल्मोड़ा के प्राकृतिक जल स्त्रोत एक के बाद एक प्रदूषण के शिकार हो रहे हैं। उनका पानी पीने योग्य नहीं बचा। गिनती के नौले और धारे कुमाऊ में बचे हैं, जिनका पानी पीने योग्य है। वर्ष 1947 में देश जब आजाद हुआ, उस समय कुमाऊ क्षेत्रा में ड्रेनेज की जो व्यवस्था थी, सन 2016 में भी हम उस व्यवस्था से एक कदम भी आगे नहीं बढ़े हैं। इतने सालों में कुछ नहीं बदला। उलट ड्रेनेज के साथ जुड़े हुए गदेरे अतिक्रमण के शिकार हो गए हैं। घर बन गए वहां। गदेरों के आस-पास सबसे अधिक नौले मौजूद हैं। गदेरे खत्म किए गए और शहर का सारा गंदा पानी नौलों में जा मिला। सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों से कई बार शहर के जल स्त्रोतों के पानी का परीक्षण हुआ। उसके परिणाम चिन्ताजनक थे। लेकिन इन परिणामों के बाद भी शहर में अपने पीने के पानी को लेकर कोई बहस खड़ी नहीं हुई। जल स्त्रोतों के पुनर्जीवन को लेकर कोई चर्चा खड़ी नहीं हुई। यह समाज के लिए चिन्ता की बात होनी चाहिए थी क्योंकि जब हर तरफ अतिक्रमण करने वालों का कब्जा होगा, फिर अल्मोड़ा का गंदा पानी किस रास्ते बाहर जाएगा? अल्मोड़ा के घर-घर में सेप्टिक टैंक पहुंच गया लेकिन वहां इकट्ठा हो रहे मल मूत्रा के निपटारे के लिए शहर के पास कोई कार्ययोजना दिखती नहीं।
यह सवाल है कि नौलों को पुनर्जीवित करने के लिए क्या प्रयास किया जा सकता है? यदि वास्तव में इस विषय को लेकर कुमाऊ का समाज गम्भीर है तो इसके लिए सबसे पहले नौले के कैचमेन्ट एरिया को सुरक्षित करना होगा। ऐसा करने से नौले में पानी बढ़ेगा। लेकिन जिस अल्मोड़ा शहर को यहां के नागरिकों ने कंक्रीट का जंगल बनाया है, वहां के कैचमेन्ट के क्षेत्रा को सुरक्षित करने और आगे सुरक्षित रखने की बात वहां का समाज कैसे करेगा?अब बात करते है जल स्त्रोत की। शहर में ड्रेनेज की व्यवस्था नहीं है, यह बात पूरा शहर जानता है। उसके बावजूद पूरे शहर सेप्टिक टैंकों से भरा हुआ है। इसे आम तौर पर लोगों ने आंगन में ही बनवाया है। उस टैंक में इकट्ठा हो रहे मल मूत्रा की कोई निकासी नहीं है। उसका पानी रिस कर मिट्टी के रास्ते भू जल में मिल रहा है। यह बात अल्मोड़ा के लोगों को भी समझनी होगी कि उस पानी से उनके नौलों-धारों में आ रहा पानी अछूता नहीं रह सकता है। प्रदूषित जल की बात परीक्षणों से भी साबित हो चुकी है।
नौलों और धारों की उपेक्षा के कारण अल्मोड़ा जिस पानी की संकट से गुजर रहा है, यदि आने वाले समय में शहर इस समस्या से बाहर निकलना चाहता है तो इसका हल जनसहभागिता से ही निकल सकता है। जनसहभागिता से ही हालात में बदलाव आ सकता है। सरकारी परियोजनाएं एक हजार करोड़ की भी आ जाएं तो इस समस्या से कुमाऊ बाहर नहीं आ सकता। समाधान के लिए पानी के प्रति समाज में जागृति का आना जरूरी है। पानी का मोल जब तक कुमाऊ नहीं समझेगा और पानी की गुणवत्ता को लेकर वह जागरूक नहीं होगा, तब तक उसे इस बात की समझ नहीं होगी कि पानी से जुड़ी सभी बीमारियों के जड़ में प्रदूषित पानी है। और इससे बचाव के लिए परिवेश को साफ रखना होगा।पानी की सफाई के संकल्प से पहले पूरे अल्मोड़ा को मन की सफाई करनी होगी। मन का मैल साफ करना होगा। वहां मैल होगा तो असर नौलो और धारों की पानी में भी साफ दिखेगा। इस पूरी प्रक्रिया में सरकार की भूमिका नेतृत्व की नहीं बल्कि एक सहयोगी की होनी चाहिए।”लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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