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करोड़ों की आस्था, फिर भी प्रदूषण का दंश झेल रही गंगा

12/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

गंगोत्री धाम के बाद अब यमुनोत्री धाम में श्रद्धालु यमुना नदी में रंग बिरंगे अंग वस्त्र और कपड़े यमुना नदी में अर्पित कर रहे हैं. इससे यमुना नदी की पवित्र धारा अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषण का दंश झेलने को मजबूर हो गई है. नदी में डाले जा रहे कपड़े और अन्य सामग्री न केवल जल की स्वच्छता को प्रभावित कर रहे हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी खतरा बनते जा रहे हैं. तीर्थ पुरोहितों और प्रशासन ने श्रद्धालुओं से अपील की है कि वे अपनी आस्था को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के साथ जोड़ें व यमुना नदी में वस्त्र और अन्य सामग्री प्रवाहित न करें.मां यमुना के दर्शन के लिए यमुनोत्री धाम पहुंच रहे श्रद्धालुओं की आस्था अब पर्यावरण के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है. श्रद्धालु यमुना नदी में रंग-बिरंगे अंग-वस्त्र और कपड़े अर्पित कर रहे हैं. इससे यमुना नदी अपने उद्गम स्थल से ही प्रदूषण की मार झेलने को मजबूर हो गई है. स्थिति यह है कि धाम क्षेत्र में नदी तटों पर बहकर आए कपड़ों का अंबार लग चुका है. इससे न केवल यमुना का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित हो रहा है, बल्कि जल की स्वच्छता पर भी गंभीर असर पड़ रहा है. श्रद्धालु मंदिर में चढ़ावा देने के बजाय सीधे नदी में सामग्री प्रवाहित कर रहे हैं, जो बाद में कचरे के रूप में तटों पर जमा हो जाती है. चारधाम यात्रा से जुड़े कर्मचारी लगातार अपील कर रहे हैं कि श्रद्धालु नदी में कपड़े न डालें, लेकिन इसका जमीनी असर नजर नहीं आ रहा. प्रशासन और संबंधित विभाग स्वच्छता को लेकर दावे तो कर रहे हैं, लेकिन हकीकत इससे उलट दिखाई दे रही उद्गम स्थल गोमुख से प्रदूषित गंगा का हाल मैदान में आते-आते और भी बदतर हो जाती है। उत्तराखंड पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार हरिद्वार में गंगा के जल में ई कोलीफार्म नामक बैक्टीरिया की मात्रा बहुत ज्यादा पाई गई है। यहां का पानी पीने योग्य तो दूर कृषि योग्य भी नहीं बचा है। गोमुख से हरिद्वार पहुंचते-पहुंचते गंगा में प्रतिदिन 89 मिलियन लीटर मल-मूत्र मिलता है। अकेले धर्मनगरी हरिद्वार में प्रतिदिन 37.36 मिलियन लीटर मल-मूत्र गंगा में बहाया जाता है। अस्पतालों का कचरा, अधजले मानव शरीर, लेड, कैडमियम, क्रोमियम जैसी धातुओं और डीडीटी जैसे कीटनाशक के गंगा में मिलने से इसका पानी जहरीला बनता जा रहा है। सरकारी और गैरसरकारी स्तर पर इसे बचाने के लिए कई योजनाएं बनीं। लेकिन ये योजनाएं धरातल पर नहीं आ पाईं। अधिकतर योजनाओं को भ्रष्टाचार की काली छाया ने घेर लिया। 1984 में बने ‘गंगा एक्शन प्लान’ के तहत आज तक लगभग 1500 करोड़ रुपये गंगा शुद्ध करने में बहाए गए। लेकिन इसका कोई सफल नतीजा सामने नहीं आ पाया है। हां, इन योजना को कार्य रूप देने में लगे ‘महानुभावों’ के घर की रौनक जरूर बढ़ी गई। भारत की प्रमुख व पवित्रतम मानी जाने वाली गंगा नदी एक तरफ जहां प्रदूषण का विकराल दंश झेल रही है, वहीं दूसरी ओर इसकी जलधारा को स्त्रोत देने वाले गंगा के ग्लेशियर को लेकर भी स्थिति गंभीर होती जा रही है. उत्तराखण्ड में गंगोत्री नामक हिमनद की पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित गोमुख ग्लेशियर, जहां से गंगा नदी का पहली धारा भागीरथी का उद्गम होता है, आज विलुप्त होती जा रही है. वैज्ञानिक अध्ययन के बाद यह सामने आया है कि गोमुख ग्लेशियर का स्वरूप  धीरे – धीरे छोटा होता जा रहा है और यदि ऐसे ही चलता रहा तो यह भारत की ऐतिहासिक नदी के लिए चिंता का सबब हो सकता है.बता दें गंगोत्री पर्वत श्रेणी के अंतर्गत केदारनाथ, शिवलिंग व मेरू जैसी हिमालय की प्रमुख चोटियां शामिल हैं तथा इसी के गोमुख ग्लेशियर से गंगा की प्रथम दो जलधाराओं में से एक भागीरथी का उद्गम होता है, जो कि देवप्रयाग में अलकनंदा नदी से मिलकर गंगा नदी का रूप ले लेती है. कहते हैं कि हजारों वर्ष पहले हिमालय पर कई ग्लेशियर पाए जाते थे, किन्तु वर्तमान में प्राकृतिक संसाधनों के दुरूपयोग व बढ़ते तापमान के चलते पिछले कई वर्षों से हिमालय पर ग्लेशियर पिघल रहे हैं तथा यह प्रक्रिया लगातार जारी है. इसी कारण गोमुख ग्लेशियर का स्वरूप भी दिन प्रतिदिन छोटा होता जा रहा है.पिछली शताब्दियों में गंगोत्री की यात्रा करने आए कई यात्रियों व शोधकर्ताओं ने गोमुख हिमनद व भागीरथी नदी के हिमाच्छादित प्रवाह का वर्णन किया है. वहीं पिछले कुछ समय में लोगों ने ग्लेशियर के घटने को लेकर भी टिप्पणियां दी हैं. गोमुख हिमालय की भागीरथी घाटी में स्थित ग्लेशियर है तथा इस घाटी में गोमुख के साथ ही सात से अधिक ग्लेशियर हैं. ये ग्लेशियर जहां भी बहते हैं, वहां अपना चिह्न छोड़ देते हैं. वैज्ञानिक शोधों के मुताबिक, पिछली शताब्दियों की तुलना में वर्तमान में गंगोत्री का लैंडफॉर्म सीमित हो गया है, जबकि पिछले वर्षों में इसके प्रवाह के चिह्न अधिक विस्तृत क्षेत्र में दिखाई पड़ते थे, जिससे स्पष्ट है कि ग्लेशियर का आकार छोटा होता जा रहा है. दस हजार वर्ष पहले यह 47 कि.मी. क्षेत्र में फैला था, किन्तु पिछले 500 वर्षों से यह प्रतिवर्ष 27.5 मीटर के औसत से विलुप्त होता जा रहा है, जो कि गंगा नदी के अस्तित्व के लिए गंभीर स्थिति उत्पन्न कर सकता है.भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षक ग्रिस्बैक द्वारा 1889 व डॉ ऑडेन द्वारा 1935 में  किए गए गंगोत्री के दौरे, मैपिंग व तत्कालीन तस्वीरों के तुलनात्मक अध्ययन में पाया गया कि गोमुख की स्थिति में परिवर्तन हो रहा है तथा ग्लेशियर का विस्तार पश्चिमी सीमा से पूर्वी सीमा की ओर स्थानांतरित हो रहा है. यही नहीं बल्कि सन् 1935 से लेकर 1996 तक 61 वर्ष की अवधि के दौरान गोमुख अपने बिन्दु से लगभग 1100 मीटर पीछे हट गया. एक अन्य शोध में यह पाया गया कि सन् 2001 से 2002 के बीच ग्लेशियर अपने स्थान से 15 मीटर पीछे हट गया. वहीं कुछ अन्य संस्थानों द्वारा किए गए शोधों के विश्लेषण से भी गोमुख की स्थिति में परिवर्तन से जुड़े परिणाम ही प्राप्त हुए हैं.गंगा की जलधारा ही नहीं बल्कि जीवन से जुड़े गोमुख ग्लेशियर की ऐतिहासिक ही नहीं भावी स्थिति पर भी शोध जारी हैं, जिनके मुताबिक यदि स्थितियों में सुधार नहीं किया गया तो यह ग्लेशियर भविष्य में पृथ्वी की सतह से गायब भी हो सकता है. यदि गोमुख ऐसे ही प्रति वर्ष अपने स्थान से लगभग 15 पीछे जाता रहा तो एक से डेढ़ सदी में यह पूरी तरह से अदृश्य हो जाएगा.गोमुख के साथ ही अन्य हिमनदों की भी यही स्थिति है तथा अन्य ग्लेशियर भी धीरे – धीरे इसी प्रकार पिघल रहे हैं. इससे पहले की ग्लेशियर महज़ एक इतिहास बन जाएं, हमें परिस्थितियों से सबक लेते हुए पर्यावरण संरक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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