डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड
उत्तराखंड में महिलाओं की सामाजिक हलचलों में भूमिका और संघर्ष का इतिहास बहुत पुराना है.ब्रिटिश हुकूमत के दौर में उससे पहले राजशाही के दौर में समाज की विभिन्न जकड़बंदियों के खिलाफ उत्तराखंड की महिलाएं अपनी लड़ाई के लिए जानी जाती हैं. आज़ादी के राष्ट्रीय आंदोलन में इन देहाती महिलाओं की भूमिका और सक्रियता तो और भी खुलकर सामने आ गई थी. वे अपने जीवन परिवार और समाज की धुरी तो थी हीं लेकिन स्वाधीनता आंदोलन और सामाजिक बुराइयों से लड़ने में भी उन्होंने बढ़चढ़कर भूमिका निभाई. महिलाओं की पीढ़ियां की पीढ़िया रहीं हैं जो अपने संघर्ष और साहस और जीवट के दम पर याद की जातीहैं. मंगला देवी उपाध्याय, नारायण गिरीमाई, तारा प्रकाश जैसी सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इलाके में महिला शिक्षा के लिए लड़ाई लड़ी को मंगला देवी जुयाल जैसे नाम अपने दम पर अपने संसाधनों से एक औषधालय चलाकर समाज सेवा में जुटे रहे. कुंती देवी, तुलसी देवी रावत, भक्ति देवी, भागीरथी देवी, भागुली देवी, शकुंतला देवी, सरस्वती देवी जैसे नाम स्वाधीनता की लड़ाई के ओजस्वी नाम थे. शराबबंदी के खिलाफ तो उत्तराखंड में महिला संघर्ष का इतिहास ही रहा है. कुंतीदेवी वर्मा, बिश्नीदेवी साह, तुलसीदेवी रावत, दुर्गादेवी पंत, टिंचरी माई आदि नाम आज भी याद किए जाते हैं. समाज में फैली बुराइयों के अलावा जल जंगल जमीन की लड़ाई में भी गांवों की महिलाएं आगे रही हैं. अपनी दोस्तों के साथ पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनसे चिपक जाने वाली, चिपको वूमेन गौरा देवी हो, खीराकोट आंदोलन की मालती देवी और पहाड़ के दूसरे हिस्सों में महिलाएं, पर्यावरण संरक्षण की कोशिशों के लिए जानी जाती रहीं हैं. एवरेस्ट फतह कर बचेंद्री पाल ने महिलाओं की जीवटता को एक महान ऊंचाई पर जा पहुंचाया. जल जंगल जमीन को लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों में महिलाओं के संघर्ष को मशहूर पर्यावरणविद वंदना शिवा ने बखूबी अपनी एक किताब-“स्टेइंग अलाइव विमेन एंड इकोलजी” में रेखांकित करते हुए इसे नाम दिया है “इकोफ़ेमेनिज़्म” का. वंदना शिवा का ये सिद्धांत पर्यावरण संरक्षण और औरत की आज़ादी के बीच अटूट संबंध मानता है. उत्तराखंड के पहाड़ों में स्त्री जिजीविषा और साहस की कई कहानियां बिखरी हुई हैं. राज्य बन जाने के 20 साल बाद आज जो इस इलाके का हश्र हुआ है और पूरा पहाड़ जैसे नोच डाला गया है, ये विपदा शायद एक दो दशक पहले ही आ गिरती, अगर जो पहाड़ी महिलाएं उस जीवन सूत्र को न थामे रहती जिनसे गांव खेत मिट्टी पानी नदी जंगल बने हैं. यहां हम अपने पाठकों के लिए एक ऐसी निपट देहाती औरत की जीवनगाथा संक्षेप में साझा कर रहे हैं जो समाज में पसरी बुराइयों से लड़ने के लिए पहाड़ी महिलाओं के विवेक, साहस और अटूट जिद की प्रतीक मानी जाती है. आजादी के 70 साल पूरे हो गए हैं. पर देशवासियों के दिल में आज भी उन शख्सियतों के लिए प्यार और सम्मान कम नहीं हुआ है, जिन्होंने आजादी की खातिर अपनी जान गंवा दी. आजादी के लिए कुर्बानी देने और देश के लिए लड़ने वाले वीरों में देश की विरंगनाएं भी थीं. आजादी के 70 साल पूरे होने पर हम आपको कुछ ऐसी विरंगनाओं ने आजादी में जिनका योगदान सराहनीय है.
(साभार संदर्भ स्रोतः उत्तराखंड की वरिष्ठ कवि वीणापाणि जोशी का धाद ग्रंथ आयोजन 1994 में संकलित निबंध)
स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.
लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत है.











