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पहाड़ों का ग्रीन गोल्ड बना पीला बांस

12/05/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

विश्व में बांस की करीब 1500 प्रजाति है वही देश में करीब 130 प्रजातियां विकसित है उत्तराखंड में केवल पीला बांस ही नहीं बल्कि काला बांसा, सॉलिड बैम्बू और रिंगाल जैसी कई प्रजातियां भी पाई जाती हैं. अलग-अलग ऊंचाई और जलवायु के अनुसार इन प्रजातियों की खेती की जाती है.‌ रिंगाल खासतौर पर ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है, इससे सुंदर हस्तशिल्प उत्पाद बनाए जाते हैं. वहीं सॉलिड बैम्बू मजबूत निर्माण कार्यों में उपयोगी माना जाता है. राज्य में बांस की विविध प्रजातियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकती हैं पहाड़ों में तेजी से सूखते जल स्रोत, बढ़ता भूस्खलन और बंजर होती जमीन अब लोगों की बड़ी चिंता बन चुके हैं. ऐसे समय में उत्तराखंड का पीला बांस उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आया है. यह सिर्फ हरियाली बढ़ाने वाला पौधा नहीं, बल्कि मिट्टी बचाने, पानी रोकने और ग्रामीणों की कमाई बढ़ाने का मजबूत जरिया भी बन रहा है. बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे कई पहाड़ी जिलों में किसान अब बड़े पैमाने पर पीले बांस की खेती की ओर बढ़ रहे हैं. इसकी खास बात यह है कि एक बार लगाने के बाद कई साल तक इससे फायदा मिलता रहता है. यही वजह है कि अब लोग इसे पहाड़ों का “ग्रीन गोल्ड” और भविष्य की खेती मानने लगे हैं.उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में पीला बांस पर्यावरण संरक्षण के लिए बेहद उपयोगी माना जाता है. इसकी मजबूत और गहरी जड़ें पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी को मजबूती से पकड़कर रखती हैं, जिससे बारिश के दौरान होने वाले भूस्खलन का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है. जहां पहाड़ों में लगातार कटाव बढ़ रहा है, वहां बांस की खेती प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम कर रही है. यही वजह है कि इसे ग्रीन शील्ड भी कहा जाता है. बागेश्वर, पिथौरागढ़ और चंपावत जैसे जिलों में ग्रामीण अब खेतों की मेड़ों और खाली ढलानों पर पीला बांस लगाने लगे हैं. इससे मिट्टी संरक्षण के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलती है.पर्यावरण विद् बताते हैं कि पीला बांस तेजी से बढ़ने वाले पौधों में शामिल है, यह वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अधिक मात्रा में सोखने की क्षमता रखता है. बांस जलवायु परिवर्तन से लड़ने में काफी मददगार साबित हो सकता है. यह अन्य कई पेड़ों की तुलना में कम समय में अधिक हरियाली देता है. पहाड़ों में बढ़ते तापमान और जंगलों की कटाई के बीच बांस को पर्यावरण संरक्षण का मजबूत विकल्प माना जा रहा है. बांस के बड़े झुरमुट आसपास के वातावरण को ठंडा और स्वच्छ बनाए रखने में भी मदद करते हैं, जिससे जैव विविधता को लाभ मिलता है.पीला बांस पहाड़ों में विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने का बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है. जहां एक ओर यह मिट्टी, पानी और हरियाली को बचाता है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीणों की आय बढ़ाने में मदद करता है. तेजी से बदलते मौसम और बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के दौर में बांस की खेती को सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प माना जा रहा है. स्थानीय लोगों को रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसर भी मिलेंगे. यही वजह है कि अब बांस को पहाड़ों का भविष्य कहा जाने लगा है. उत्तराखंड के कई पहाड़ी इलाकों में बंजर और खाली पड़ी जमीन अब पीले बांस की वजह से दोबारा उपयोग में लाई जा रही है. बांस कम उपजाऊ जमीन में भी आसानी से उग जाता है. धीरे-धीरे मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में मदद करता है. इसकी पत्तियां जमीन पर गिरकर प्राकृतिक खाद का काम करती हैं, जिससे मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ते हैं. ग्रामीण किसान अब उन खेतों में भी बांस लगाने लगे हैं, जहां पारंपरिक फसलें अच्छी नहीं होती थीं. इससे किसानों को अतिरिक्त आय का साधन मिल रहा है. साथ ही खाली जमीन हरियाली में बदल रही है. आने वाले समय में बांस पहाड़ों की बंजर भूमि को पुनर्जीवित करने का बड़ा माध्यम बन सकता है. पीला बांस उत्तराखंड के ग्रामीणों के लिए रोजगार का मजबूत साधन बनता जा रहा है. बांस से बनी टोकरियां, डलिया, फर्नीचर, सजावटी सामान और घरेलू उपयोग की वस्तुएं बाजार में अच्छी कीमत पर बिक रही हैं. खासकर महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों को इससे काफी फायदा मिल रहा है. बागेश्वर और अल्मोड़ा क्षेत्रों में कई परिवार अब बांस आधारित हस्तशिल्प से अपनी आय बढ़ा रहे हैं. पर्यटन क्षेत्रों में भी बांस के उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है. ग्रामीण कारीगर पारंपरिक कला को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर नए उत्पाद तैयार कर रहे हैं. इससे स्थानीय रोजगार बढ़ रहा है, पलायन रोकने में भी मदद मिल रही है. बांस की पत्तियों में ओरिएंटिन, विटेक्सिन, आइसोओरिएंटिन, ल्यूटोलिन जैसे कई फ्लेवोनोइड्स के साथ-साथ फेनोलिक एसिड, क्लोरोफिल, कोलीन और पॉलीसेकेराइड भी पाए जाते हैं। ये सिलिकॉन, सेलेनियम, मैग्नीशियम, कैल्शियम और पोटेशियम जैसे खनिजों का भी समृद्ध स्रोत हैं। इसके अलावा, बांस की पत्तियों में विटामिन सी और बी विटामिन भी मौजूद होते हैं। एक बार पौधे लगाने के बाद लंबे समय तक इससे उत्पादन मिलता रहता है. इसकी देखभाल में अन्य फसलों की तुलना में कम खर्च आता है. यही कारण है कि पहाड़ी किसान अब इसे नकदी फसल के रूप में अपनाने लगे हैं. बाजार में बांस की लगातार बढ़ती मांग किसानों को बेहतर कमाई का अवसर दे रही है. निर्माण कार्यों, फर्नीचर उद्योग और हस्तशिल्प में इसकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है. यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो बांस किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है.पीले बांस की खेती किसानों के लिए इसलिए भी फायदेमंद मानी जाती है, क्योंकि यह केवल 4 से 5 साल में तैयार हो जाता है. एक बार पौधे लगाने के बाद लंबे समय तक इससे उत्पादन मिलता रहता है. इसकी देखभाल में अन्य फसलों की तुलना में कम खर्च आता है. यही कारण है कि पहाड़ी किसान अब इसे नकदी फसल के रूप में अपनाने लगे हैं. बाजार में बांस की लगातार बढ़ती मांग किसानों को बेहतर कमाई का अवसर दे रही है. निर्माण कार्यों, फर्नीचर उद्योग और हस्तशिल्प में इसकी उपयोगिता लगातार बढ़ रही है. यदि वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो बांस किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है. जलवायु परिवर्तन को लेकर बैंबू बोर्ड का प्रस्ताव बेहद अहम होने जा रहा है. दावा है कि इस प्रस्ताव पर पूरी तरह से काम हुआ तो करीब 2 लाख किलोग्राम कार्बन के उत्सर्जन को रोका जा सकेगा. फिलहाल पहली बार उत्तराखंड बैंबू एंड फाइबर डेवलपमेंट बोर्ड की तरफ से शासन को यह प्रस्ताव भेजा गया है और जल्द ही इस पर बोर्ड को शासन से हरी झंडी मिलने की उम्मीद है. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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