भगवती गौरा देवी की छतोली आज फंयूला नारायण मंदिर पहुंचेगी चमोली(लक्ष्मण सिंह नेगी) उत्तराखंड वैसे तो संपूर्ण पहाड़ उत्तराखंड में आजकल नंदा देवी यात्रा की धूम मची हुई वही कल्प क्षेत्र उरगम भरकी घाटी में भगवती गौरा की आज पारंपरिक रूप से छतोली कल्प घाटी के देवग्राम गौरा देवी मंदिर से छतोली पूजन के बाद कैलाश के लिए रवाना होगी यह परंपरा सैकड़ो साल पुरानी है आज उरगम घाटी के देवग्राम निवासी भल्ला लोग भगवती के लिए ककड़ी,चंयूडा,ब्युंला, 12 तरह के चावल, भगवंती के लिए ढाका की मलमल, माथे की बिंदी, सांकुरी, रेशमी साड़ी,मावा की रसाद, चीणा कौणी के चंयूडा बासी लावण भगवती के लिए ले जाएंगे। आज गौरा मंदिर से भगवती की छतोली देव ग्राम, रांता, कल्पेश्वर, जब्बर खेत विनायक, दुदला पाटीविनायक, खरसू पार्टी विनायक , कुँदी विनायक, खौड़ विनायक होते हुए नारायण धाम पहुंचेगी, प्रतिवर्ष नंदा अष्टमी की द्वितीया तिथि को भगवती के बुलावा कैलाश भेजा जाता है और केलाश से भगवती को मायके बुलाया जाता है इस क्षेत्र की यह जात अपने में अलग तरह की है बड़ी संख्या में आज श्रद्धालु फंयूला नारायण धाम पहुंचते हैं यहां पर इस वर्ष फ्यूंला नारायण के पुजारी अशीष पंवार के द्वारा महिला पुजारी आनंदी देवी एवं अन्य गणमान्य लोगों के द्वारा जात यात्री का स्वागत किया जाएगा। कल 14 सितंबर 2026 को भगवती की छतोली रोखनी बुग्याल की ओर जाएगी। यहां से यात्रा की अगवानी क्षेत्रपाल देवता के द्वारा किया जाता है। फंयूला नारायण से मौलगडा बुग्याल, मल्यूं बुग्याल, होते हुए रोखनी बुग्याल यात्रा पहुंचेंगी यहां पर जात की जाएगी। जात का अर्थ है कि भगवती को मायके के लोगों के द्वारा जो भी प्रसाद भेंट दिया जाता है उसको एक ऊन(छो) से बना वस्त्र में रखा जाता है और जात यात्री के द्वारा जो भी भगवती के निशान यहां पर साथ में लाये जाते हैं उन्हें रखा जाता है और यहां से हिमालय का दृश्य बड़ा मनमोहक लगता है यहां पर जो कंडी और छतोली लेकर जात यात्री जाता है वही पूजा करता है और पूजा करने के साथ-साथ ब्रह्म कमल तोड़ने की प्रक्रिया शुरू होती है यह प्रक्रिया मात्र 15 से 20 मिनट की होता है। इस समय जितने भी यात्री साथ में गये हैं। वही हल्ला नहीं करते हैं बड़ी सावधानी से ब्रह्म कमल को तोड़ा जाता है ब्रह्म कमल की पूजा की जाती है। उसके बाद भगवती को यह माना जाता है कि मायके के लोगों के साथ अपने मैती मुल्क भगवती आ गई है। जितने भी यात्री एवं छतोली लेकर जाते हैं वापस दो से तीन बजे के मध्य में फंयूला नारायण पहुंचते हैं यहां पर भगवती का भव्य स्वागत किया जाता है और ब्रह्म कमल से भगवान नारायण भगवती नंदा सुनंदा जाख देवता, पितृ गणौ की पूजा अर्चना की जाती है। उसी दिन यह जात यात्रा वापस देवग्राम के लिए आ जाती है जगह-जगह पर जहां भी देव निशान होते हैं वहां ब्रह्म कमल चढ़ाया जाता है कल्पेश्वर महादेव में शिव पार्वती का मिलन होता है उसके बाद यात्री देवग्राम के गौरा मंदिर पहुंचते हैं यहां पर सभी ग्रामवासी इकट्ठा होकर भगवती का भव्य स्वागत करते हैं यहां गौर मंदिर में भगवती की मूर्ति को भव्य रूप से ब्रह्म कमल सेसजाया जाता है ब्रह्म कमल के द्वारा जिससे फूल कौठा कहते हैं। यहां पर गौरा देवी के पुजारी के द्वारा भगवती को ब्रह्म कमल से सजाने के बाद भगवती को भोग लगाया जाता है आरती की जाती है उसके बाद साथ ग्रहण के बाद यह जात यात्रा संपन्न हो जाती है।











