डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ के समाज की जीवन-संस्कृति और रहन-सहन दोनों अनूठा रहा है। यहां की लोक परंपराएं व रहन-सहन प्रकृति के करीब और सृष्टि से संतुलन बनाने वाली रही है।पहाड़ों में कभी मिट्टी और पत्थर से बने सुंदर और मजबूत घर हुआ करते थे. इन घरों की मोटी दीवारें सर्दी में गर्म और गर्मी में ठंडी रहती थीं. पत्थर की छतें और लकड़ी के दरवाजों पर की गई सुंदर नक्काशी इन घरों की खास पहचान होती थी. ये घर सिर्फ रहने की जगह नहीं थे, बल्कि पहाड़ों की संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी थे. इनकी बनावट पूरी तरह पहाड़ों के मौसम और प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुसार होती थी. जो इन्हें सबसे अलग बनाती थी. पुराने समय में लोग घर बनाने के लिए स्थानीय सामग्री का ही उपयोग करते थे.आसपास के पहाड़ों से पत्थर मिल जाता था और अच्छी मिट्टी भी आसानी से उपलब्ध होती थी. गांव के लोग मिलकर घर बनाते थे, जिससे आपसी भाईचारा भी बढ़ता था. उस समय के कारीगरों को इस काम का गहरा अनुभव होता था. वे पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला सीखते और सिखाते थे. यही कारण था कि हर घर में मेहनत, कला और अपनापन साफ झलकता था. यह तकनीक न केवल सस्ती थी बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी थी. समय के साथ गांवों की तस्वीर अब बहुत बदल गई है. आज पहाड़ों में भी सीमेंट और कंक्रीट के मकान तेजी से बन रहे हैं. इसका एक बड़ा कारण यह है कि अब सीमेंट, सरिया और अन्य आधुनिक निर्माण सामग्री बाजार में आसानी से मिल जाती है. लोग शहरों से जुड़ गए हैं, इसलिए आधुनिक तकनीक और सामग्री गांवों तक पहुंचने लगी है. इसके विपरीत, अब अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर और मिट्टी को खोजना पहले जैसा आसान नहीं रहा. परंपरा के टूटने का एक बड़ा कारण यह भी है कि पारंपरिक तरीके से घर बनाने वाले कारीगर अब बहुत कम रह गए हैं. नई पीढ़ी इस कठिन कला में रुचि नहीं ले रही है. पत्थर का काम बहुत मेहनत और समय मांगने वाला होता है. पत्थर काटना, उसे सही आकार देना और फिर दीवार में सटीक तरीके से जमाना एक धैर्य का काम है. युवा पीढ़ी अब आसान और जल्दी होने वाले निर्माण कार्यों को ज्यादा पसंद कर रही है. पत्थर का काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि उन्होंने अपने पिता से यह कला सीखी थी, लेकिन अब पत्थर वाले मकानों की मांग बहुत कम हो गई है. काम कठिन होने के कारण लोग इसे अपनाना नहीं चाहते और धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म होती जा रही है. वहीं, 80 वर्षीय बुजुर्ग कहते हैं कि पहले गांव में कई कुशल कारीगर होते थे, लेकिन अब वे ढूंढने से भी नहीं मिलते. लोग सुविधा और समय बचाने के लिए सीमेंट के मकान बना रहे हैं क्योंकि वे जल्दी तैयार हो जाते हैं, भले ही वे मौसम के अनुकूल न हों.भले ही पत्थर के घर मजबूत, टिकाऊ और भूकंप रोधी होते हैं, लेकिन आधुनिकता की होड़ ने हमें अपनी जड़ों से दूर कर दिया है. आज जरूरत है कि हम अपनी इस लुप्त होती कला को बचाएं. अगर सरकार पारंपरिक निर्माण को प्रोत्साहन दे और नई पीढ़ी को इस हुनर का महत्व समझाया जाए, तो पहाड़ों की यह सुंदर पहचान फिर से जीवित हो सकती है. भले ही पत्थर के घर मजबूत, टिकाऊ और भूकंप रोधी होते हैं, लेकिन आधुनिकता की होड़ ने हमें अपनी जड़ों से दूर कर दिया है. आज जरूरत है कि हम अपनी इस लुप्त होती कला को बचाएं. अगर सरकार पारंपरिक निर्माण को प्रोत्साहन दे और नई पीढ़ी को इस हुनर का महत्व समझाया जाए, तो पहाड़ों की यह सुंदर पहचान फिर से जीवित हो सकती है. मिट्टी के घरों में नमी और तापमान का संतुलन प्राकृतिक रूप से बना रहता है, जिससे ये स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी होते हैं. इनके निर्माण में किसी भी प्रकार का हानिकारक रसायन प्रयोग नहीं होता है, जिस कारण ये घर पर्यावरण के अनुकूल होते हैं. उनका मानना है कि आज भले ही आधुनिकता के दौर में कंक्रीट के मकानों का चलन बढ़ गया है लेकिन मिट्टी और पत्थर के घरों का महत्व अभी भी जिंदा है. ये कम लागत में आरामदायक जीवनशैली देते हैं और पर्यावरण के साथ ही परंपरा को भी संरक्षित करते हैं. मिट्टी के घर पहाड़ी जीवनशैली का हिस्सा हैं मुखवा गांव केबताते हैं कि उनका पैतृक मकान लगभग 240 वर्ष पुराना है। इसने कई भूकंप और आपदाएं झेली हैं लेकिन न तो इसकी संरचना बदली और न ही इसका अस्तित्व हिला। आज सीमेंट और कंक्रीट के बढ़ते प्रचलन ने इस अनोखी भवन निर्माण शैली को लगभग विलुप्त कर दिया है जो घर कभी गांवों की पहचान हुआ करते थे वे अब इतिहास और यादों में सिमटते जा रहे हैं।. सरकार और स्थानीय संस्थाएं इन घरों को होमस्टे के माध्यम से भी बढ़ावा दे .लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











