————– प्रकाश कपरुवाण ———–।
ज्योतिर्मठ।
आद्य जगदगुरु शंकराचार्य की तपस्थली ज्योतिर्मठ को वर्ष 2023मे भू धसाव की अनोखी आपदा ने झकझोर कर रख दिया था, भू धसाव से इस ऐतिहासिक एवं पौराणिक संस्कृति के नगर के अस्तित्व को बचाने के लिए आंदोलन का सहारा भी लेना पड़ा। भू धसाव की इस अनोखी आपदा की तह तक पहुँचने के लिए देशभर की भू वैज्ञानिक संस्थानों व ख्याति प्राप्त वैज्ञानिकों ब्यापक सर्वेक्षण किया और जोशीमठ के भू धसाव प्रभावित उच्च जोखिम व जोखिम वाले क्षेत्रों मे सुरक्षात्मक कार्य क्या क्या किए जाने हैं उसकी विस्तृत रिपोर्ट भारत सरकार को प्रस्तुत की।
देश के आठ वैज्ञानिक संस्थानों की रिपोर्ट के आधार पर सरकार के विभिन्न महकमों ने धरातल पर पहुंचकर डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट “डीपीआर” तैयार की और डीपीआर के अनुरूप केन्द्र सरकार ने डेढ़ हजार करोड़ से अधिक की धनराशि स्वीकृत की और तीन वर्ष बाद मार्च 2026 मे कार्यदायी संस्थाओं ने कार्य भी शुरू कर दिया जिसे लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है और तरह तरह की आशंकायें पैदा हो गई है।
भू धसाव आपदा के दौरान मनोहर बाग वार्ड, सिंहधार वार्ड, गांधीनगर वार्ड तथा सुनील, रविग्राम व नृसिंह मंदिर वार्ड के कुछ हिस्से प्रभावित हुए जहाँ से लोगों को घरों से निकालकर सुरक्षित स्थानों व राहत शिविरों मे रखा गया, और खतरे की जद मे आ चुके आवासीय भवनों का जिस प्रभावित ने मुआवजा लेना चाहा उन्हें मुआवजा भी दिया गया। लेकिन जिन होटलों व पहाड़ी शैली मे बने पुश्तेनी घरों को तोड़ा गया उसका मुआवजा आज तक नहीं दिया गया।
इन सब विसंगतियों के बीच ट्रीटमेंट कार्य शुरू तो हुए लेकिन जिन वार्डों मे सबसे ज्यादा नुकसान हुआ वहाँ कार्य शुरू न करते हुए सड़कों के किनारे एनएच की तर्ज पर सड़कों को सुरक्षित करने का कार्य किया जा रहा है। भू धसाव आपदा प्रभावित स्थानों पर आखिर सुरक्षात्मक कार्य क्यों नहीं किए जा रहे हैं इसे लेकर तरह तरह की चर्चाएं तो हैं लोगों मे आक्रोष भी पनप रहा है, लोग समझ नहीं पा रहे हैं जिन स्थानों पर ट्रीटमेंट कार्य किया जा रहा है वह तो उच्च जोखिम व जोखिम वाले चिन्हित क्षेत्रों मे भी नहीं थे जैसा कि तत्कालीन आपदा सचिव ने खुली बैठक मे स्क्रीन पर दर्शाया था।
तो क्या सड़कों के किनारे व ऊपरी ओर ट्रीटमेंट करने से प्रभावित वार्ड सुरक्षित हो जायेंगे.? यदि ऐसा होता है तो यह किसी वैज्ञानिक चमत्कार से कम नहीं होगा और यदि सड़कों के आसपास जारी कार्य केवल और केवल सहूलियत के अनुसार हो रहे हैं तो इसे धन की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।
वर्तमान मे जारी सुरक्षात्मक कार्य वैज्ञानिक रिपोर्ट्स के अनुरूप हो रहे हैं तो स्वीकृत डीपीआर को सार्वजनिक किया जाना बेहद जरुरी है ताकि भू धसाव प्रभावित वार्डों के प्रभावित जो विगत तीन वर्षों से ट्रीटमेंट की राह देख रहे हैं वे भी समझ सकें कि सड़कों के किनारे खाली भूमि पर ट्रीटमेंट हो जाने से उनका वार्ड भी हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाएगा। इन कार्यों को कराने वाले जिम्मेदार महकमों की जिम्मेदारी भी है कि वे भू धसाव आपदा पीड़ितों को आश्वास्त करें कि वर्तमान मे जो ट्रीटमेंट कार्य हो रहे हैं इससे उनका जीवन सुरक्षित रहेगा।
वैज्ञानिक रिपोर्ट एवं उनके द्वारा सुझाए गए सुझावों के अनुरूप ट्रीटमेंट कार्य किया जाना ही जोशीमठ के सुरक्षित भविष्य के जरुरी है और बद्रीनाथ मास्टर प्लान निर्माण कार्यों की तर्ज पर कार्य स्थल या प्रमुख स्थान पर ट्रीटमेंट प्लान की रूप रेखा दर्शायी जानी चाहिए ताकि भू धसाव पीड़ित समझ सकें कि वर्तमान मे निर्माणाधीन ट्रीटमेंट कार्यों से उनका क्षेत्र सुरक्षित हो जाएगा और यदि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों मे भी ट्रीटमेंट कार्य होने हैं तो इसकी प्राथमिकता क्या है..?
समय रहते इन सब आशंकाओं का निदान होना बेहद जरुरी है अन्यथा जोशीमठ के अस्तित्व को बचाने के लिए आपदा पीड़ितों को एक बार फिर सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा।
क्या कहते हैं आपदा सचिव………
आपदा एवं पुर्नवास सचिव विनोद कुमार सुमन से संपर्क करने पर उन्होंने कहा कि प्रभावित वार्डों के चिन्हित स्थान खाली होने पर वहाँ भी ट्रीटमेंट कार्य होंगें इसके लिए वे डीएम चमोली से वार्ता करेंगें।।











