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पहाड़ों पर उगने वाला मीठा करेला बन रहा सबकी पसंद

25/11/19
in उत्तराखंड
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला दून विश्वविद्यालय, देहरादून, उत्तराखंड

पहाड़ की संस्कृतियहां के खान-पान की बात ही अलग है। यहां के अनाज तो गुणों का खान हैं
ही, सब्जियां भी पौष्टिक तत्वों से भरपूर है। ऐसी ही खास पहाड़ी सब्जी है मीठा करेला, जिसे
अलग-अलग जगहों पर अलग नाम से जाना जाता है। कुछ लोग इसे परमला कहते हैं कई जगह
ये ककोड़ा के नाम से जानी जाती है।

शहरों में इसे राम करेला कहा जाता है। इसे ये नाम इसके गुणों की वजह से मिला है। इसे परमल, गुजकरेला, किंकोड़ा और घुनगड़ी भी कहा जाता है। अगर आप ठेठ पहाड़ी हैं तो मीठा करेला की सब्जी आपने जरूर खाई होगी। ये पहाड़ी सब्जी गुणों की खान हैं, अगस्त से लेकर नवंबर तक ये सब्जी पहाड़ में बेलों पर खूब उगती है।

इससे जुड़ी एक और मजेदार बात आपको बताते हैं दरअसल ये गुणों की खान तो है ही साथ ही
इसकी सब्जी बेहद स्वादिष्ट होती है अगस्त से लेकर नवंबर तक ये पहाड़ों में खूब उगता है अगर
हम आपको इसके गुणों के बारे में बताना शुरू करेंगे तो आप भी इस पहाड़ी सब्जी के मुरीद हो
जाएंगे।

एक शोध में पता चला है कि इसमें न केवल पर्याप्त मात्रा में आयरन मौजूद है, बल्कि
शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटी ऑक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व भी
हैं।

आप जानते ही होंगे कि आयरन तत्व न होने से एनीमिया, सिरदर्द या चक्कर आना,
हीमोग्लोबिन बनने में परेशानी होना जैसी परेशानियां शरीर को पस्त कर देती हैं। इसके अलावा
एंटीऑक्सिडेंट अक्‍सर अच्‍छे स्‍वास्‍थ्‍य और बीमारियों को रोकने का काम करते
है। 

कैंसर से बचाने, आंखों की रोशनी के लिए, मजबूत लिवर के लिए एंटी ऑक्सीडेंट शानदार
चीज है।करेला और वह भी मीठा। बात भले ही गले नहीं उतर रही हो, लेकिन है सोलह आने सच।
वैसे यह करेला चीनी की तरह मीठा नहीं होता, लेकिन कड़वा न होने के कारण इसे मीठा करेला कहते हैं।


पहाड़ में इसे ज्यादातर कंकोड़ा और कई इलाकों में परबल, राम करेला आदि नामों से भी जाना जाता है। कंकोड़ा ऊंचाई वाले इलाकों में अगस्त से लेकर नवंबर तक उगने वाली सब्जी है। पहाड़ में बरसात की सब्जियों के आखिरी पायदान पर यह लोगों के पोषण के काम आता है। हल्के पीले व हरे रंग और छोटे- छोटे कांटों वाली इस सब्जी मिनटों में तैयार हो जाती है।

बनाने की प्रक्रिया भी अन्य सब्जियों की तरह ही है। हां! यह जरूर ध्यान रखें कि कढ़ाई में छौंकते-छौंकते और अल्टा-पल्टी कर हल्की भाप देते ही कंकोड़े की सब्जी बनकर तैयार हो जाती है। कंकोड़े की की सूखी सब्जी जितनी जायकेदार होती है, उतनी ही आलण (बेसन का घोल) डालकर तैयार की गई तरीदार सब्जी भी। इसके अलावा कंकोड़े के सुक्सों की सब्जी भी बेहद स्वादिष्ट होती है।

सीजन में आप कंकोड़ों को सुखाकर किसी भी मौसम में आप सुक्सों की सब्जी बना सकते हैं। सुक्सों को भिगोकर बनाई गई तरीदार सब्जी का भी कोई जवाब नहीं। सब्जी के
साथ इसके बीज खाने में खराब लगते हैं। लेकिन, यदि बीजों को अलग से भूनकर खाने में आनंद आता है।

जब कंकोड़े छोटे-छोटे होते हैं तो उन्हें कच्चा भी खाया जा सकता है। कच्चे खाने में यह खूब स्वादिष्ट
लगते हैं और ककड़ी (खीरा) की तरह हल्की महक देते हैं। कड़वा करेला जहां डायबिटीज का दुश्मन है, वहीं मीठा करेला यानी कंकोड़ा भी डायबिटीज की प्रभावशाली दवा है।

सभी तरह के चर्म रोग व जलन में भी यह उपयोगी है। इसकी पत्तियों का रस पेट के कीड़ों को मारने सहायक है। कुष्ठ रोग में भी कंकोड़ा को लाभकारी माना जाता है। इसका स्वरस कील-मुहांसों को ठीक करने के भी काम आता है, जबकि इसकी जड़ को सुखाकर बनाया गए चूर्ण का लेप चर्म रोगों के लिए बहुत उपयोगी है।एक शोध में पता चला है कि कंकोड़ा में न केवल पर्याप्त मात्रा में आयरन मौजूद है, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटीऑक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व भी इसमें हैं।

बता दें कि आयरन की कमी होने से एनीमिया, सिरदर्द, चक्कर आना, हीमोग्लोबिन बनने में परेशानी होना जैसी परेशानियां शरीर को पस्त कर देती हैं। इसके अलावा एंटीऑक्सीडेंट अक्सर अच्छे स्वास्थ्य और बीमारियों को रोकने का काम करते है।

कंकोड़ा फाइबर, प्रोटीन और कॉर्बोहाइड्रेट की भी खान है।इसके पौधे पर बीमारियों का प्रकोप भी नहीं होता, जिस कारण यह पहाड़ों में खूब पनपता है। अब तो देहरादून व हल्द्वानी जैसे शहरों में कंकोड़ा मिलने लगा है।

कंकोड़ा लौकी कुल की सब्जी है। इसका वैज्ञानिक नाम सिलेंथरा पेडाटा (एल) स्चार्ड है।
इसका एक नाम राम करेला भी है। यह नाम कैसे पड़ा, इस बारे में किसी को जानकारी नहीं, लेकिन किंवदंती है कि भगवान राम ने वनवास के दौरान इसका सेवन किया था। सो, इसे राम करेला कहा जाने लगा। भले ही सीमांत में बहुतायत में मिलने वाले मीठे करेले को सब्जी के तौर पर पहचान मिली है।

लेकिन अपने स्वाद के लिए पहचाने जाने वाला मीठा करेला औषधीय गुणों से भी भरपूर है। शोध में पता चला है कि इसमें न केवल पर्याप्त मात्रा में आयरन मौजूद है, बल्कि शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटी ऑक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व भी हैं। मीठा करेला सीमांत के किसानों की आय का जरिया भी बना है।

जिला मुख्यालय के बाजार में बिकने वाला मीठा करेला लोगों को खूब भा रहा है। मीठा करेला को उत्तराखंड में कई नामों से जाना जाता है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में इसे परला, मीठा करेला, राम करेला, गुजकरेला, काकोड़े, किंकोड़ा, घुनगड़ी, केकुरा आदि नामों से पहचान मिली है।
नेपाल में इसे बडेला कहा जाता है।

इसका वैज्ञानिक नाम सिलेंथरा पेडाटा स्चार्ड है। सितंबर से लेकर दिसंबर तक ये सब्जी पहाड़ में बेलों पर खूब उगती है। आम तौर पर मीठा या राम करेले को सब्जी के तौर पर जाना जाता है। लेकिन जानकारी के अभाव में लोग इसके औषधीय गुणों से अंजान हैं।

इसमें पर्याप्त मात्रा में आयरन मौजूद है। साथ ही इसमें प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले एंटी ऑक्सीडेंट और खून को साफ करने वाले तत्व मौजूद हैं। आखों की रोशनी बढ़ाने के लिए भी मीठा करेला रामवाण है। इसे फाइबर, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की खान भी कहा जाता है।

इसका नाम राम करेला या मीठा करेला क्यों पड़ा किसी को भी इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन किवदंती के अनुसार वनवास के दौरान राम के इसका सेवन करने से इसे राम करेले के नाम से प्रसिद्धि मिली। खासकर यह डायबिटीज के लिए कारगर सिद्ध होता है।

आप जानते होंगे की कड़वा करेला जहां डायबिटीज का दुश्मन है, वहीं मीठा करेला यानी कंकोड़ा भी डायबिटीज की प्रभावशाली दवा है। सभी तरह के चर्म रोग व जलन में भी यह उपयोगी है। इसकी पत्तियों का रस पेट के कीड़ों को मारने सहायक है।

कुष्ठ रोग में भी कंकोड़ा को लाभकारी माना जाता है। इसका स्वरस कील-मुहांसों को ठीक करने के भी काम आता है, जबकि इसकी जड़ को सुखाकर बनाया गए चूर्ण का लेप चर्मरोगों के लिए बहुत उपयोगी है। सिर्फ मीठा करेला या कड़वा करेला ही हमारे स्वास्थ को सुचारु रूप से नहीं
चलाते बल्कि सभी प्राकृतिक सब्जिया हमारे शरीर को स्वस्थ बनाये रखती है।

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