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उत्तराखंड में सपना बनी मेट्रो ट्रेन, करोड़ों खर्च भी हुए एक ईंट तक नहीं लगी

10/02/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

देश में नियो मेट्रो दौड़ाने का सपना देख रहे दून की उम्मीदों पर अभी इंतजार के बादल छाये हुए हैं। मेट्रो ट्रेन
एक सपना जैसा लगने लगा है. चार साल पहले सरकार ने मेट्रो ट्रेन चलाने का ऐलान किया था. मेट्रो के नाम
पर करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन हकीकत यही है कि मेट्रो के लिए अभी तक एक ईंट भी नहीं लगी है.
पिछले चार सालों से उत्तराखंड में मेट्रो के नाम पर केवल बातें की जा रही हैं. ऐसे में मेट्रो प्रोजेक्ट अधर में
लटका दिखाई दे रहा है. वर्ष 2017 में दून ने मेट्रो रेल का एक हसीन ख्वाब देखा था। ख्वाब में हसीन भविष्य
के इतने रंग उमड़-घुमड़ रहे थे कि सरकार ने भी झटपट उत्तराखंड मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन का गठन कर डाला।
हाथों-हाथ देहरादून से लेकर हरिद्वार, ऋषिकेश व मुनिकीरेती तक मेट्रोपोलिटन क्षेत्र घोषित कर दिया गया।
करीब दो साल के अथक प्रयास के बाद परियोजना की डीपीआर बनाई गई और तय किया गया कि पहले चरण
में करीब पांच हजार करोड़ रुपये की लागत से दून में आइएसबीटी से कंडोली व एफआरआइ से रायपुर के
कॉरीडोर का निर्माण किया जाएगा। इसके लिए तमाम संसाधन जोड़े गए और पांच करोड़ रुपये से अधिक की
राशि खर्च करने के बाद अब मेट्रो का सफर लगभग समाप्त भी हो गया है। इसी वर्ष नई सरकार आई। स्टडी के
लिए विदेश तक के टूर हुए। लेकिन, करीब 7 वर्ष का समय पूरा हो गया है। अब तक मेट्रो के नाम पर एक ईंट
भी नहीं लग पाई। बेशक, दिल्ली मेट्रो जैसे से लेकर केबिल कार, पॉड कार तक की प्लानिंग हो चुकी हैं। लेकिन,
ये सपना कब पूरा होगा, कोई कह नहीं सकता है। हां, इतना जरूर है कि मेट्रो कॉर्पोरेशन के नाम एमडी से
लेकर तमाम डायरेक्टर, अधिकारी व कार्मिकों की फौज तैनात है। हर माह लाखों रुपए खर्च हो रहे हैं। इसी पर
दैनिक जागरण आई नेक्स्ट से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोगों से राय जाननी चाही। मिली पब्लिक
ओपनियन में 50 परसेंट लोगों का कहना है कि अब मेट्रो का ही ऑफिस बंद कर देना चाहिए। जबकि, 48
परसेंट लोगों ने कहा कि मेट्रो के नाम पर हो रही बातें केवल हवा-हवाई ही हैं। राजधानी दून में वाहनों व
पॉल्यूशन बढ़ता जा रहा है। सरकार 7 सालों से मेट्रो संचालन की बात कह रही है। मेट्रो के नाम पर हर साल
करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैैं। क्या दून में मेट्रो का सपना पूरा होगा।? ज्यादा महीने नहीं हुए, जनवरी 2024 में
तत्कालीन सीएस की अध्यक्षता में मेट्रो को लेकर बैठक हुई। जिसें मेट्रो की कम संभावनाओं के बीच पॉड कार
को लेकर सर्वेक्षण के लिए कहा गया। जबकि, उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन क्र(यूकेएमआरसीक्र) ने दून में
नियो मेट्रो को लेकर प्रस्ताव दिया था। जिसके बाद केंद्र को प्रस्ताव भेजा गया। अब तक इस पर स्थिति साफ
नहीं है। सरकार हरिद्वार पीआरटी संचालन पर भी तैयार थी। यूकेएमआरसी ने निविदा निकाली। लेकिन, अब
तक कोई कंपनी सामने नहीं आई। अब तय किया गया है कि हरिद्वार व दून पीआरटी का निर्माण हाईब्रिड
एन्यूटी मॉडल (हैम) के तहत करेगी। मंथन हुआक सरकार डेवलपर को प्रोजेक्ट में होने वाले खर्च का 40
परसेंट पेमेंट काम शुरू होने से पहले कर देती है। बाकी 60 परसेंट डेवलपर को खुद लगानी होती है। 15 साल
बाद अगर डेवलपर को घाटा हुआ तो 60 परसेंट धनराशि प्रतिवर्ष 80 से 100 करोड़ डेवलपर को लौटा देगी।
मेट्रो रेल कार्पोरेशन के मुताबिक नियो मेट्रो प्रोजेक्ट करीब 1900 करोड़ रुपये की थी। डीपीआर राज्य के बाद
फाइनल टच देने के लिए केंद्र को भेजी गई। प्रोजेक्ट में राज्य व केंद्र 20-20 परसेंट बजट देंगे। बाकी 60 परसेंट
राशि लोन से जुटाई जाएगी। देश में नियो मेट्रो दौड़ाने का सपना देख रहे दून की उम्मीदों पर अभी इंतजार के
बादल छाये हुए हैं। उत्तराखंड मेट्रो रेल कारपोरेशन (यूकेएमआरसी) ने परियोजना को लेकर सभी तैयारियां कर
ली हैं। सबसे बड़ी चुनौती भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही भी हो चुकी है, लेकिन केंद्र सरकार से प्रोजेक्ट को हरी
झंडी नहीं मिली है। मेट्रो कॉरपोरेशन के कार्यालय में इस समय 28 कर्मचारी काम कर रहे हैं. कॉरपोरेशन का

कार्यालय भी किराए पर है. उसके बाद कर्मचारियों की सैलरी, ऑफिस किराया समेत अन्य खर्चों पर तकरीबन
सरकार हर महीने 55 से 60 लाख खर्च करती है. इसके अलावा मेट्रो के नाम पर अलग-अलग लेटेस्ट टेक्नोलॉजी
की आड़ में मंत्री और अधिकारी कई विदेश दौरे भी कर चुके हैं, लेकिन देहरादून में मेट्रो प्रोजेक्ट का रिजल्ट
शून्य है.मेट्रो प्रोजेक्ट की फाइल फिलहाल शासन स्तर पर लटकी है. कई बार प्लान चेंज होने के बाद बार-बार
डीपीआर बनाई जाती है. वित्त विभाग उस पर बजट की वजह से रोक लगा देता है. फाइल शासन के चक्कर काट
रही है और सरकार बजट पर करोड़ों खर्च कर रही है. पिछले चार सालों से मेट्रो फाइल सचिवालय में घूम रही
है. वहीं इसके पीछे राजनीतिक लोगों की कमजोर इच्छा शक्ति और अधिकारियों में दूरदर्शिता की कमी भी
साफ तौर पर देखी जा सकती है. लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत  हैं।

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