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करोड़ों खर्च भी हुए एक ईंट तक नहीं लगी मेट्रो का कहीं अता-पता नहीं

09/06/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में मेट्रो की बात अब एक सुनहरे सपने जैसी हो चुकी है. पिछले कई सालों से उत्तराखंड में मेट्रो के नाम पर केवल बातें ही की जा रही हैं. मगर आज तक इस बारे में कुछ भी धरातल पर देखने को नहीं मिला है. बीते सालों में तमाम विदेश दौरों और लाखों के खर्च के बाद भी मंत्री, सचिव और मेट्रो कॉर्पोरेशन एक फाइनल प्लान तैयार नहीं कर पाए हैं. पहले मेट्रो की बात हुई, फिर लाइट रेल ट्रांजिट की, फिर रोप वे और अब नियो मेट्रो की बात हो रही है. मेट्रो के बहाने हर महीने सरकार कर्मचारियों पर वेतन के नाम पर 50 लाख रुपए खर्च कर रही है. आश्चर्य की बात है कि अभी तक उत्तराखंड में सपनों की मेट्रो के काम के नाम पर एक कील तक नहीं ठोंकी गई है. उत्तराखंड में मेट्रो परियोजना को लेकर अब तक क्या कुछ हुआ है, उत्तराखंड के सबसे व्यस्ततम शहर देहरादून में जाम की समस्या किसी से छिपी नहीं है. जब शहर अपनी पूरी रफ्तार पर होता है तब सड़कें चौक-चौराहे सभी जाम हो जाते हैं. देहरादून आरटीओ के मुताबिक हर साल सड़क पर 50 हजार नये वाहन उतरते हैं. जिससे इस छोटे से शहर पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ जाता है. इन्हीं सारी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए उत्तराखंड में मेट्रो की जरुरत महसूस हुई. उत्तराखंड के सबसे व्यस्ततम शहर देहरादून में जाम की समस्या किसी से छिपी नहीं है. जब शहर अपनी पूरी रफ्तार पर होता है तब सड़कें चौक-चौराहे सभी जाम हो जाते हैं. देहरादून आरटीओ के मुताबिक हर साल सड़क पर 50 हजार नये वाहन उतरते हैं. जिससे इस छोटे से शहर पर ट्रैफिक का दबाव बढ़ जाता है. इन्हीं सारी समस्याओं को ध्यान में रखते हुए और भविष्य की जरूरतों को देखते हुए उत्तराखंड में मेट्रो की जरुरत महसूस हुई. साल 2017 में जब उत्तराखंड में मेट्रो की घोषणा हुई तो उत्तराखंड के लोगों के सपनों को मानो पंख लग गये. मगर आज 4 साल बीतने के बाद भी मेट्रो के नाम पर एक ईंट भी नहीं लगाई जा सकी है. बता दें 2017 में उत्तराखंड में मेट्रो कॉरपोरेशन का गठन हुआ. मौजूदा समय में इस कार्यालय में 28 लोग काम कर रहे हैं.खर्च की बात करें तो हर महीने इस कार्यालय और इन कर्मचारियों की तनख्वाह और अन्य खर्चे मिला कर 45 से ₹50 लाख का व्यय होता है. इस हिसाब से 2017 से अब तक इस पर करोड़ों खर्च हो चुके हैं. मगर हासिल अब तक कुछ नहीं हो पाया है. बात यहीं खत्म नहीं हो जाती है इसके अलावा मेट्रो के नाम पर और अलग अलग लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की आड़ में मंत्री और अधिकारी कई विदेश यात्राएं भी कर चुके हैं. शहरी विकास मंत्री और तत्कालीन मुख्य सचिव द्वारा आखिरी दौरा कोलम्बिया के मेडलिन शहर का किया गया था. जहां से रोपवे का कांसेप्ट लाया गया, लेकिन वो भी आखिर में बदल दिया गया. हर बार इसी तरह नये-नये प्लान लाये और बदले जाते हैं.  उत्तराखंड में मेट्रो को लेकर जबसे काम शुरू हुआ है, उसके बाद से यहां किस तरह की मेट्रो होगी, क्या टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जाएगी, इसको लेकर मंथन किया गया. मगर बार-बार यह प्लान भी चेंज होते रहे. जिसके पीछे राजनीतिक लोगों की कमजोर इच्छा शक्ति और अधिकारियों में दूरदर्शिता की कमी साफ तौर पर जाहिर होती है. पहली बार जब मेट्रो देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार में प्लान की गई तो पाया गया कि दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में चलने वाली मेट्रो यहां पर व्यवहारिक नहीं होगी.इसके बाद विदेशों के दौरे किए गए. तब यह सुनिश्चित किया गया कि देहरादून में रोपवे और हरिद्वार में एलआरटी सिस्टम लगाया जाएगा. उस समय तकनीकी एजेंसियों द्वारा आगाह भी किया गया था कि यह प्लान यहा सक्सेसफुल नहीं होगा. उसके बाद भी तकनीकी परामर्श को दरकिनार करते हुए इस पर आगे काम किया गया. आखिर में यह प्लान भी फेल हो गया. अब नियो मेट्रो पर काम किया जा रहा है. उत्तराखंड में मेट्रो को लेकर जबसे काम शुरू हुआ है, उसके बाद से यहां किस तरह की मेट्रो होगी, क्या टेक्नोलॉजी इस्तेमाल की जाएगी, इसको लेकर मंथन किया गया. मगर बार-बार यह प्लान भी चेंज होते रहे. जिसके पीछे राजनीतिक लोगों की कमजोर इच्छा शक्ति और अधिकारियों में दूरदर्शिता की कमी साफ तौर पर जाहिर होती है. पहली बार जब मेट्रो देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार में प्लान की गई तो पाया गया कि दिल्ली, मुंबई जैसे शहरों में चलने वाली मेट्रो यहां पर व्यवहारिक नहीं होगी.इसके बाद विदेशों के दौरे किए गए. तब यह सुनिश्चित किया गया कि देहरादून में रोपवे और हरिद्वार में एलआरटी सिस्टम लगाया जाएगा. उस समय तकनीकी एजेंसियों द्वारा आगाह भी किया गया था कि यह प्लान यहा सक्सेसफुल नहीं होगा. उसके बाद भी तकनीकी परामर्श को दरकिनार करते हुए इस पर आगे काम किया गया. आखिर में यह प्लान भी फेल हो गया. अब नियो मेट्रो पर काम किया जा रहा है. आज के आधुनिक दौर में मेट्रो एक बेहद लेटेस्ट टेक्नोलॉजी है जो कि समय की जरूरत के अनुसार बेहद महत्वपूर्ण है. वहीं इसके निर्माण, निर्माण की कार्यशैली और गुणवत्ता को अन्य निर्माणों से बेहतर बनाने लिए कई सख्त और खर्चीले मानकों पर खरा उतरना पड़ता है. यही वजह है कि मेट्रो में खर्च बहुत ज्यादा होता है. उत्तराखंड में पहले चरण में देहरादून में बनाई जाने वाली मेट्रो का बजट 1700 करोड़ है. ऐसा अनुमान है कि मेट्रो का काम पूरा होते होते यह लागत 1,700 करोड़ से बढ़ कर 1,850 करोड़ तक पहुंच जाएगी. उत्तराखंड में लंबे समय से एक रैपिड ट्रांसपोर्ट सिस्टम का इंतज़ार किया जा रहा है. उम्मीद की जा रही थी कि ये सिस्टम बढ़ते ट्रैफिक से दम घुटते शहर के लिए संजीवनी बनेगा. मेट्रो से शुरू हुआ ये इंतजार अब अन्य आधुनिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम के सपने दिखाने लगा है. पिछले कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने यह महसूस किया कि पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी क्षेत्रों में रोपवे परिवहन अधिक व्यावहारिक और किफायती विकल्प साबित हो सकता है. यही वजह है कि का फोकस मेट्रो परियोजना के साथ-साथ रोपवे नेटवर्क विकसित करने पर भी बढ़ा है. जब तक मेट्रो राजनीतिक मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक सपना पूरा नहीं होगा। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सरकार की प्राथमिकताओं में ही नहीं है। राजनीतिक इच्छा शक्ति होती, तो अब तक मेट्रो सिटी बन गई होती। यह सरकार का फेल्योर है, जो अपनी बाद केंद्र में दमदार ढंग से नहीं रख पा रही है। राजधानी दून में बढ़ते ट्रैफिक को कंट्रोल करने के लिए प्रस्तावित मेट्रो प्रोजेक्ट अब तक हवा में नजर आ रही है। कॉरपोरेशन का कार्यालय भी किराए पर है. उसके बाद कर्मचारियों की सैलरी, ऑफिस किराया समेत अन्य खर्चों पर तकरीबन सरकार हर महीने 55 से 60 लाख खर्च करती है. इसके अलावा मेट्रो के नाम पर अलग-अलग लेटेस्ट टेक्नोलॉजी की आड़ में मंत्री और अधिकारी कई विदेश दौरे भी कर चुके हैं, लेकिन देहरादून में मेट्रो प्रोजेक्ट का रिजल्ट शून्य है.  पिछले 9 साल में सरकारों ने मेट्रो सिटी का जो सपना दिखाया, वह अभी भी पूरा नहीं हो पाया है। आगे भी यह सपना पूरा होना, इसकी भी फिलहाल दूर-दूर तक संभावना नजर नहीं आ रही है, मेट्रो के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च भी किए गए, लेकिन हकीकत यही है कि मेट्रो के लिए अभी तक एक ईंट भी नहीं लगी है।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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