डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पहाड़ों की ठंडी हवाओं में कभी एक अलग ही गूंज हुआ करती थी. छोलिया नर्तकों की थिरकन, मशकबीन और नगाड़े की थाप और इन सबके आगे शान से लहराता हुआ एक झंडा, जिसे हमारे बुजुर्ग ‘निशाण’ कहते थे. आज जब पलायन के सूनेपन ने पहाड़ों को घेरा है, तो सिर्फ लोग ही गांव से दूर नहीं हुए, बल्कि हमारी समृद्धि लोक संस्कृति के कई अनमोल रंग भी इतिहास के पन्नों में सिमटते जा रहे हैं.इन्हीं में से एक बहुत खास परंपरा है विवाह में ‘निशाण’ ले जाने की परंपरा. यह परंपरा धीरे-धीरे उत्तराखंड के पहाड़ों से खत्म होती जा रही है, क्योंकि पलायन के चलते पहाड़ के गांव खाली होते जा रहे हैं और ज्यादातर लोग अपने बच्चों की शादी वही करते हैं, जहां वे शहरों में बस गए हैं. देहरादून के बुजुर्ग ने जानकारी दी कि उनकी जब शादी हुई थी, जो रस्में पहले होती थी, अब धीरे-धीरे वे खत्म होती जा रही है. उन्हीं में से एक है निशाण की परंपरा. उन्होंने बताया कि उनकी शादी में निशाण की परंपरा थी. पुराने समय में जब दूल्हा-दुल्हन के घर बारात लेकर जाता था, तब लोग दो तरह के झंडे लेकर चलते थे, एक लाल रंग का होता था और दूसरा सफेद रंग का होता था. इन्हें स्थानीय भाषा में निशाण कहा जाता था. उन्होंने कहा कि जब लड़का बारात लेकर जाता था, तब आगे सफेद और पीछे लाल निशाण ले जाया जाता था. इसके बाद जब बारात घर लौटती थी, तब लाल निशाण को आगे और सफेद निशाण को पीछे रखा जाता था. पहाड़ में जगह-जगह पर देवी- देवताओं से भावनात्मक रूप से जुड़ाव होता है. उन्होंने बताया बारात से पहले पूजा की जाती थी और देवी -देवताओं से कुशल मंगल तरीके से बारात और दूल्हा- दुल्हन की सुरक्षा के लिए कामना की जाती थी, इसीलिए लोग बोलते थे कि ये निशाण दूल्हा-दुल्हन और बाराती की बुरी शक्तियों से रक्षा करते थे. उन्होंने कहा कि पहले माना जाता था जैसे पहाड़ में नदी-नाले और जंगल में रास्ते होते थे. जिनसे वे गुजरते थे ,वहां छल-कपट की संभावनाएं बहुत ज्यादा होती हैं. इनसे उनके बचाव में निशाण मददगार होते थे. उत्तराखंड के इतिहासकार बद्रीदत्त पांडे की किताब ‘कुमाऊं का इतिहास’ में इस परंपरा का बड़ा ही रोचक ज़िक्र मिलता है. इसमें 700 ईस्वी के समय के चंद राजवंश के संस्थापक राजा सोमचंद के विवाह में पहली बार ‘निशाण’ के उपयोग का जिक्र दिया गया है. इसका सीधा अर्थ है कि यह परंपरा आज की नहीं, बल्कि 1300 साल से भी ज़्यादा पुरानी है.इनमें सफेद और लाल दो झंडे लिए जाते हैं. इस सफेद झंडे के पीछे ढाल और तलवार से लैस सैनिकों की एक टुकड़ी होती थी, जिनके साथ तमाम पारंपरिक वाद्य यंत्र बजते चलते थे और कुछ सैनिक तलवार आदि लेकर नाचते थे. इसी नृत्य को आगे चलकर छोलिया नृत्य के रूप में किया जाने लगा. बारात में लिए गए निशान बहुत पवित्र माने जाते हैं. यही वजह है कि दूल्हा-दुल्हन की ये बुरी शक्तियों से सुरक्षा करते हैं. आज के बदलते परिवेश में कुछ पुरानी रस्में अप्रासंगिक होते हुए भी हम लकीर के फकीर बनकर परम्पराओं की दुहाई देते नहीं थकते. आशय ये नहीं है कि हम अपनी पुरानी परम्पराओं व रस्मों से विद्रोह करें, आवश्यकता इस बात की है कि जो रस्म परिस्थितिवश तब प्रांसगिक और अब अप्रांसगिक हो चुकी है, उनमें समयानुकूल तब्दीली लायें. भारतीय वैदिक संस्कृति, सनातन धर्म की अनमोल धरोहर है,इसी संस्कृति की देन है कि विवाह के बाद दम्पत्ति अग्नि को साक्ष्य मानकर सात फेरों में जो बचन दिये जाते हैं, उन्हें ताउम्र निभाने का प्रयास करते हैं. यही कारण है कि हिन्दू समाज में तलाक जैसे मामले बहुत विरल ही मिलते हैं. लेकिन कुछ रस्में जो धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा नहीं हैं, और समय व परिस्थितिवश बूढ़ी हो चुकी, ऐसी रस्मों को हम संस्कृति व परम्परा का हिस्सा मानकर ढोते न रहें और यदि वैदिक परम्परा व सनातन संस्कृति पर आस्था रखते हों तो जयमाला जैसी रस्मों को वैवाहिक वैदिक रस्मों के सम्पन्न होने के बाद करें, लेकिन यदि जयमाला वैवाहिक रस्म से पहले ही करना है तो फिर पाणिग्रहण संस्कार जैसी रस्मों का औचित्य ही क्या रह जाता है ? उत्तराखंड के पहाड़ों में शादियां सिर्फ एक परिवार का नहीं, बल्कि पूरे गांव का उत्सव मानी जाती हैं. यहां आज भी कई पुरानी परंपराएं बड़े प्यार और सम्मान के साथ निभाई जाती हैं. ऐसी ही एक खास परंपरा है शादी के घर में चावल, दही और दूध ले जाने की रस्म. जब गांव में किसी के घर शादी होती है, तो आस-पास के लोग अपने-अपने घरों से थोड़ा-थोड़ा चावल, दही और दूध लेकर शादी वाले घर पहुंचते हैं. यह रस्म लड़की और लड़के, दोनों पक्षों में निभाई जाती है. इसे एक अत्यंत शुभ सगुन माना जाता है और मान्यता है कि इससे नए जोड़े को पूरे समाज का सामूहिक आशीर्वाद मिलता है. पहाड़ों में इस परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं छिपी हैं. लोग मानते हैं कि चावल मां लक्ष्मी का रूप होते हैं, जो नए दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली लाते हैं. वहीं दूध और दही को पवित्रता, मिठास और अटूट रिश्तों का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि शादी जैसे मांगलिक अवसर पर इन चीजों को भेंट के रूप में ले जाया जाता है. यह रस्म दर्शाती है कि पहाड़ी समाज में संसाधनों से ज्यादा भावनाओं और परंपराओं को महत्व दिया जाता थी आज के समय हमारे समाज मे विवाह के समय ध्वज के उपयोग के पीछे यह सोच किसी की भी नहीं होती कि वे लड़की को जीतने जा रहे हैं या जीतकर आ रहे हैं, पर पुराने जमाने से यह प्रथा चल रही है और अब हमारी संस्कृति का अहम हिस्सा है इसलिए इसे त्यागना हम उचित नहीं समझते न उचित है। आज के परिप्रेक्ष्य के अनुसार परम्पराओं के मायने बिल्कुल बदल चुके हैं, और अब यह निशाण केवल शादियों में नहीं ले जाए जाते बल्कि लगभग हर शुभ कार्य मे इनकी अहम भूमिका है।.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











