डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड को प्रकृति का कोई अनोखा वरदान प्राप्त है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का भंडार देवभूमि अपने कई प्राकृतिक फलों और हरी-भरी सब्जियों के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। उनके अंदर कई ऐसे औषधीय गुण मौजूद रहते हैं प्रकृति अनेक जड़ी बूटियों के भंडार से भरी हुई है। कुछ पौधों और फलों का हम अनायास ही सेवन कर लेते हैं। मगर इनके औषधीय गुणों से हम अनजान रहते हैं। ऐसा ही एक पौष्टिक फल है जिसे कुमाऊं में पांगर के नाम से जाना जाता है। इस फल के आवरण पर अनगिनत कांटे होते हैं। इसके औषधीय गुणों से अनजान होने के कारण इसका उचित प्रयोग नहीं हो पा रहा है। जिनसे हम अनजान रहते हैं मगर फिर भी कुछ पौधों और फलों का हम अनायास सेवन कर लेते हैं। यह पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन को रोकने और जल संरक्षण के लिए भी बेहद उपयोगी है। लगभग 1500 से अधिक ऊंचाई वाले पांगर वृक्ष की औसत आयु 300 साल से भी अधिक होती है।राज्य में मौजूद गुणों की खादान लिए और बड़ी से बड़ी बीमारियों की क्षमता रखने वाले फल एक ऐसा ही पौष्टिक फल है जिसे कुमाऊं में पांगर के नाम से जाना जाता है। आपको बता दें कि इस फल में काफी कांटे होते हैं जिस कारण इस फल को इतना अधिक नहीं खाते हैं। मगर अगर आप इसके औषधीय गुणों से अवगत होंगे तो आप हैरान रह जाएंगे। चलिए आपको बताते हैं कि कुमाऊं में पांगर के नाम से प्रचलित यह उत्तराखंड का कांटेदार फल कितना पौष्टिक है उसके अंदर क्या-क्या गुण हैं जो कि कई बीमारियों से लड़ने में सहायक हैं।पांगर एक ऐसा फल है जिसका पेड़ ठंडे इलाकों में पाया जाता है और यह फल खाने में भी होती स्वादिष्ट होता है. पहाड़ में उगने वाला यह फल 80 सालों से उत्तराखंड के लोगों की जेब भर रहा है. इसे ड्राईफ्रूट ‘चेस्टनट’ के नाम से भी जाना जाता है. यह फल अब भी स्थानीय लोगों की आजीविका का जरिया बना हुआ है. इस फल को पानी में बॉयल कर वह आग में पका कर भी खाया करते हैं.इस फल के पेड़ नैनीताल, रामगढ़, मुक्तेश्वर, पदमपुरी आदि इलाकों में पाए जाते है. बजारों में यह फल 200 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिकता है. यह फल कैल्शियम, आयरन, विटामिन बी6 से भरपूर है. जिसे दुनिया चेस्टनट के नाम से बेहतर जानती है. इस फल का पूरा कवर कांटेदार होता है इसलिए तोड़ने में खासी मेहनत लगती है. इस फल से जुड़ा इतिहास बड़ा दिलचस्प है, लेकिन इसके औषधीय गुणों की बात करें तो यह इम्यून सिस्टम के लिए रामबाण बताया जाता है. हृदय रोग के खतरे को कम करने के साथ ही डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसे रोगों में भी यह फायदेमंद है. चेस्टनेट में कैल्शियम, आयरन, पोटैशियम, विटामिन सी और मैग्नीशियम भरपूर होते इसकी मार्केट में अच्छी-खासी मांग है, जिसके चलते बाजार में पांगर 200 से 300 रुपये प्रति किलो तक आसानी से बिकता है इसलिए यह स्वरोज़गार का भी ज़बरदस्त साधन बन रहा है. मई और जून में इसके पेड़ में फूल आते हैं और अगस्त-सितंबर तक फल भी पक जाते हैं. स्थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों में भी खासे लोकप्रिय इस फल की बाजार में खासी मांग है. इसलिए यह स्वरोजगार का भी साधन बन रहा है. खास बात यह है कि इस फल को जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.मई और जून में इसके पेड़ में फूल आते हैं और अगस्त-सितंबर तक फल पक जाते हैं. इस वृक्ष का फल बाहर से नुकीले कांटों की परत से ढका रहता है. फल पकने के बाद यह खुद-ब-खुद गिर जाता है. इसके कांटेदार आवरण को निकालने के बाद इसके फल को निकाल लिया जाता है. इसे हल्की आंच में भुना या उबाला जाता है. फिर इसका दूसरा आवरण चाकू से निकालने के बाद इसके मीठे गूदे को खाया जाता है. यह फल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह फल बहुत मीठा होता है और इसी के साथ औषधीय गुणों से भरपूर होता है। बता दें कि पांगर के नियमित सेवन से गठिया रोग हमेशा-हमेशा के लिए चला जाता है। गठिया रोग के लिए इस फल को बेहद कारगर दवा के रूप में लिया जाता है। यदि पांगर फल को व्यवसायिक खेती के रूप में उगाया जाएगा तो निश्चित तौर पर अच्छी आर्थिक कमाई की जा सकती है क्योंकि यह बाजार में 300 से 400 रुपए किलो मिलता है और इसकी मार्केट में जबरदस्त डिमांड है। पांगर फल की परिष्कृत प्रजाति को व्यवसायिक खेती के रूप में उगाया जाता है, तो निश्चित ही काश्तकारों की आर्थिकी बेहतर होगीलेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











