डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
सच कहूं तो पौड़ी को ब्रिटिश प्रशासन के दौर में भी कुछ इसी शिद्दत के साथ बसाया गया था। जहां से सम्पूर्ण हिमालयन की नयनाभिराम चोटियां कटोरे की भांति दिखें। जहां किंकालेश्वर पर्वत शिखर में डूबते सूर्य की अप्रितम किरणें मन लुभायें, जहां आस्था और विश्वास का प्रतीक गोरिल कंडोलिया व नागदेव पूरे नगर वासियों को शुभाषीष दें। भला वहां किसका मन प्राण आत्मा का वास न हो। सन् 1962 के अप्रत्याशित चीनी आक्रमण ने गढ़वाल और कुमाऊं की सामरिक महता को बढ़ा दिया, जिसके फलस्वरूप पौड़ी की एक तहसील चमोली और टिहरी की तहसील उत्तरकाशी को पूर्ण सीमान्त जिला बना दिया गया और छठे दशक के अन्त तक जब गोपाल रेड्डीउ.प्र. के गर्वनर थे, स्वनामधन्य स्व. मुकुन्दीलाल बॅरिस्टर व तत्कालीन कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता हेमवतीनन्दन बहुगुणा के सदप्रयास से देहरादून सहित गढ़वाल के पांच जिलों का कुमाऊं मण्डल से पृथक एक गढ़वाल मंडल बना दिया गया और अपनी विशेष भौगोलिक स्थिति के कारण पुणे पौड़ी मंडलीय मुख्यालय के पद पर प्रोन्नत हो गई इस प्रकार कभी की अल्हड़ पहाड़ी घसियारिन पहले रानी और फिर पटरानी बन गई. किंतु आज पौड़ी गढ़वाल मंडल की नकली पटरानी है. असली मलका तो नूरजहां के समान दाल भात में मुसल चंद की भांति बीच में ही टपक पड़ी देहरादून नगरी है. जिस पर प्रशासन का जहांगीर बुरी तरह फिदा है नतीजा मंडल के औद्योगिक विकास का शरबत ए आजमइसके ही गुलाबी पेट में जाता है और केवल तलछट ही पटरानी व अन्य रानियों को नसीब हो पाता है. पौड़ी प्राकृतिक रूप से हसीन है तो हुआ करें! क्योंकि कहावत मशहूर है कि जिसे पिया चाहे वही सुहागन.पहाड़ों में चारधाम यात्रा शुरू होते ही यहां के धार्मिक स्थलों के अलावा पर्यटन स्थल भी चहल-कदमी से गुलजार होने लगे हैं। अपवाद को छोड़ दिया जाए तो यात्रा ही यहां की आर्थिकी का एक बड़ा आयाम भी है। अफसोस यह कि पौड़ी जनपद के कई पर्यटक व धार्मिक स्थल ऐसे हैं जो अभी भी यात्रियों की आंखों से ओझल हैं। हिमालय की लंबी बर्फीली चोटियों का दीदार भी पौड़ी से नजर आता है, लेकिन यात्राकाल के दौरान यहां से यात्रियों के न के बराबर गुजरने से यात्रियों की आंखों से ये स्थल मानो ओझल से हैं। इस सब के बीच देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले तीर्थ यात्री व पर्यटक पौड़ी का भी रुख करें तो इन धार्मिक व पर्यटक स्थलों से भी वाकिफ हो सकते हैं।पौड़ी से 2 किमी की दूरी पर स्थित कंडोलिया देवता के मंदिर को भूमि देवता के रूप में पूजा जाता है। यहां के स्थानीय लोग इस मंदिर को बहुत मानते हैं। यह मंदिर गढ़वाल की देवी कंडोलिया देवी को समर्पित है। हर साल मंदिर में मेला लगता है, जिसको देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। कंडोलिया मंदिर के समीप खूबसूरत पार्क और खेल परिसर भी स्थित है। गर्मियों के दौरान कंडोलिया पार्क में पर्यटकों की भारी मात्रा में भीड़ देखी जा सकती है। कंडोलिया मंदिर से कुछ दूरी पर ही एशिया का सबसे ऊंचा स्टेडियम रांसी स्टेडियम भी है। कंडोलिया मंदिर से सर्दियों में हिमालय बहुत सुंदर दिखाई देता है। कंडोलिया मंदिर से हिमालय की बंदरपूंछ, चौखंभा, केदारनाथ, नीलकंठ और त्रिशूल आदि चोटियों के बहुत खूबसूरत दर्शन होते हैं।हाड़ी कोटी-बनाल शैली में तैयार यह थीम पार्क स्थानीय संस्कृति और आधुनिक सोच का एक बेहतरीन उदाहरण बन सकता था, लेकिन आज यह परियोजना लापरवाही और अनदेखी का प्रतीक बन चुकी है।तत्कालीन जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल की पहल पर तैयार इस पार्क से लोगों को काफी उम्मीदें थीं। स्थानीय निवासियों के लिए रोजगार के अवसर सृजित होने की संभावना भी जताई गई थी। साथ ही, यह स्थान पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता था।लेकिन रखरखाव के अभाव में इसकी संरचनाएं धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रही हैं। बच्चों के लिए लगाए गए झूले और अन्य सुविधाएं अब उपयोग के लायक नहीं रह गई हैं। सुरक्षा और स्वच्छता की स्थिति भी चिंताजनक हो चुकी है।यह स्थिति कहीं न कहीं राज्य सरकार और पर्यटन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। पौड़ी प्रशासन की निष्क्रियता भी इस बदहाली के लिए कम जिम्मेदार नहीं मानी जा सकती।सवाल यह है कि आखिर कब तक योजनाएं सिर्फ उद्घाटन तक ही सीमित रहेंगी? क्या विकास का मतलब केवल बजट खर्च करना रह गया है?पौड़ी जैसे सुंदर शहर में अपार पर्यटन संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन ठोस योजना और निरंतर देखरेख के अभाव में ये संभावनाएं धीरे-धीरे खत्म होती नजर आ रही हैं।आवश्यक है कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दें। मौजूदा ढांचे के रखरखाव और सुधार के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। तभी ऐसे ड्रीम प्रोजेक्ट अपनी वास्तविक पहचान बना पाएंगे और क्षेत्र का समग्र विकास संभव हो सकेगा।पर्यटन सर्किट से मंदिरों के जुड़ने के बाद चारधाम यात्रा पर जाने वाले यात्री पौड़ी की ओर भी आएंगे. यहां कई मंदिर हैं, जो बेहद पौराणिक और खूबसूरत हैं. लेकिन वहां तक उतनी संख्या में श्रद्धालु नही पहुंच पाते हैं. पर्यटन सर्किट बनने के बाद उम्मीद है कि यहां तक भी यात्री पहुंच सकेंगे. जिससे पौड़ी को नई पहचान मिलेगी. यह स्थिति कहीं न कहीं राज्य सरकार और पर्यटन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है। पौड़ी प्रशासन की निष्क्रियता भी इस बदहाली के लिए कम जिम्मेदार नहीं मानी जा सकती।सवाल यह है कि आखिर कब तक योजनाएं सिर्फ उद्घाटन तक ही सीमित रहेंगी? क्या विकास का मतलब केवल बजट खर्च करना रह गया है?पौड़ी जैसे सुंदर शहर में अपार पर्यटन संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन ठोस योजना और निरंतर देखरेख के अभाव में ये संभावनाएं धीरे-धीरे खत्म होती नजर आ रही हैं।आवश्यक है कि सरकार और प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीरता से ध्यान दें। मौजूदा ढांचे के रखरखाव और सुधार के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। तभी ऐसे ड्रीम प्रोजेक्ट अपनी वास्तविक पहचान बना पाएंगे और क्षेत्र का समग्र विकास संभव हो सकेगा। प्रदेश में पर्यटन विकास की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, उसे आर्थिकी से जोड़ने के दावे भी किए जाते हैं, लेकिन व्यवहार में होता-जाता कुछ नहीं। इसका प्रमाण है गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी का दो दशक पुराना कंडोलिया पार्क। रखरखाव के लिए पैसा नहीं मिलने से यह पार्क अब इस कदर बदहाल है कि पर्यटक भी भूले-भटके ही इधर का रुख करते हैं।वर्ष 1996 में वन विभाग के सिविल सोयम प्रभाग ने पौड़ी में कंडोलिया पार्क की नींव रखी। इसके संचालन की जिम्मेदारी कंडोलिया वन पंचायत को सौंपी गई। बेमिसाल खूबसूरती के चलते पार्क कुछ ही समय में प्रसिद्ध भी हो गया। नतीजा, पर्यटकों की आवाजाही होने लगी, जिससे क्षेत्र के लोगों को रोजगार भी मिला। लेकिन, यह सब बहुत दिनों तक नहीं चला। जिम्मेदारों की उपेक्षा के चलते धीरे-धीरे पार्क बदहाल होता चला गया। और.आज स्थिति यह है कि पार्क के झूले, कुर्सियां, बेंच, यहां तक कि कूड़ेदान भी टूट चुके हैं। हरियाली सूखी घास में तब्दील हो चुकी है। पार्क के आकर्षण का केंद्र हट्स भी तीन साल से बंद पड़े हैं। सो, पर्यटक भी पार्क से मुंह मोड़ने लगे हैं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












