डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
तिल का वानस्पतिक नाम ‘सेसामम इंडिकम’ हैं। तिल पेडिलिएसिई कुल का पौधा है, जो दो से चार फुट तक ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ तीन से पाँच इंच लंबी दीर्घवत् या भालाकार होती हैं तथा इनका निचला भाग तीन पालियों या खंडोवा होता है। इसके पुष्प का दलपुंज हलका गुलाबी या श्वेत, 3/4″ से 1′ तक लंबा, नलिकाकार तथा पाँच विदारों वाला होता है। इसके ऊपर के ओष्ठों के दो पिंडक छोटे होते हैं। तिल अथवा इसके लिये प्रयुक्त होने वाला अन्य शब्द जिंजेली क्रमश: संस्कृत तथा अरबी भाषा से प्राप्त हुए हैं। धार्मिक संस्कारों में इसके प्रयोग से ज्ञात होता है कि इसे अति प्राचीन काल से तिलहन के रूप में भारत में उगाया जाता था। तिल का उद्गम भारत या अफ्रीका माना जाता है। सभी गरम देश, जैसे भूमध्यसागर के तटवर्ती प्रदेश, एशिया माइनर, भारत, चीन, मंचूरिया तथा जापान में इसकी खेती होती है। भारत में तिल की पैदावार विश्व की लगभग एक तिहाई होती है। इसके लिये हल्की बुमट तथा दुमट मिट्टी अधिक उपयुक्त है। यह मुख्यत: वर्षा में और कई स्थानों में शरद ऋतु में भी बोया जाता है। भारत में मुख्य तौर पर दो प्रकार के तिल पाये जाते हैं सफेद और काला. यह चाहे सफेद हो या काला इसके दाने-दाने में सेहत की बात होती है. इसका हमारे खान-पान में बहुत महत्व है. आयुर्वेद में भी तिल का बड़ा महत्व है. आयुर्वेद के अनुसार तिल मिले हुए जल से स्नान तिल के तेल से मालिश करने से तिल से यज्ञ में आहुति देने से तिल मिश्रित जल को पीने से और भोजन में तिल का प्रयोग करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और पापो से मुक्ति मिलती है. तिल की तासीर गर्म होती है इसलिए इसका सेवन सर्दियों में करने से शरीर में ऊर्जा बनी रहती है. इसमे कई तरह के पोशाक तत्व जैसे प्रोटीन, कैल्शियम, काम्प्लेक्स बी, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, जिंक, कॉपर और मैग्नीशियम आदि प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. जो सेहत के लिए फायदेमंद है. तिल का प्रयोग प्राचीन काल से सेहत बनाए रखने के लिए किया जाता है. घर के व्यंजनो और खासतौर पर मकर संक्रांति पर तिल का प्रयोग लड्डू बनाने में किया जाता है. अपने खास गुणों के कारण इसके अनेक फायदे हैं.
दाने का रंग मुख्यत: श्वेत, भूरा तथा काला होता है। इसके तेल का प्रयोग खाने, जलाने ओर मारजरीन, साबुन दवाएँ तथा इत्र आदि बनाने में होता है। सप्लाई कमजोर होने से एक पखवाड़े के दौरान तिल तेल के भाव 300 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ गये। भविष्य में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है ग्राहकी निकलने से एक पखवाड़े में तिल तेल के भाव 300 रुपए बढ़कर 15000 रुपए प्रति क्विंटल हो गए। टिनों में इसके भाव 1550/1600 रुपए बोले गए। अन्य खाद्य तेलों की तुलना में तिल तेल के कीमतें ऊंची चल रही है तथा दूसरी ओर मिलावटी माल की बिक्री धड़ल्ले से होने के कारण तिल की खपत कमजोर पड़ गई है। उत्तर प्रदेश व गुजरात की मंडियों में नये तिल की आवक आवक का प्रेशर न होने के कारण तिल के भाव स्थिर रहे। कोलकाता मंडी में भी छिटपुट मांग से लाल तिल के भाव 6400/6500 रुपये प्रति क्विंटल पर टिके रहे। तिल तेल भी 15500 रुपये प्रति क्विंटल बोले गये। तिल का उत्पादन महाराष्ट्र, उड़ीशा, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, वेस्ट बंगाल, उत्तराखंड इत्यादि में होता है। गत वर्ष 2018-19 के दौरान खरीफ में तिली का उत्पादन 2.5 लाख के लगभग हुआ था। चालू सीजन के दौरान तिल की बिजाई का रकबा घटा है। बिजाई का रकबा घटने तथा पिछले दिनों हुई वर्षा के कारण उत्पादक क्षेत्रों में तिल फसल को नुकसान होने की खबर है। हालांकि तिल तेल की कीमतें अन्य खाद्य तेलों की तुलना में काफी ऊंची चल रही है जिसके कारण खपत कमजोर बनी हुई है। वर्तमान हालात को देखते हुए आगामी माह में तिल तेल की कीमतों में ज्यादा तेजी की संभावना नहीं है। बाजार सीमित दायरे में घूमता रह सकता है।मेडिकल पत्रिका लैंसेट के अध्ययन के अनुसार 7 करोड़ मधुमेह मरीजों की आबादी के साथ भारत विश्व के तीन शीर्ष मधुमेह पीड़ित देशों में से एक है. तिल का तेल मधुमेह की रोकथाम में मदद करता है, इसलिए विशेषज्ञों ने तिल के तेल के प्रयोग की सिफारिश की है. भारत में 2014 और 2015 में 20-70 साल के आयु समूह के बीच मधुमेह के मामले क्रमश: 6.68 करोड़ और 6.91 करोड़ पाए गए हैं. केएनजी एग्रो फूड के निदेशक सिद्धार्थ गोयल ने कहा, “देश में तिल के तेल का बाजार बहुत व्यापक है जिसका प्रयोग मधुमेह को मात देने के लिए किया जा सकता है. विश्वभर में हर साल लगभग 30 लाख टन तिल का उत्पादन किया जाता है और भारत में इसका लगभग 30 प्रतिशत उत्पादन होता है. मुख्य रूप से महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में तिल की खेती होती है. यहां तीन किस्मों पीली, लाल और काली तिल की खेती की जाती है.”तिल/तिल के तेल में विटामिन ई और अन्य एंटीऑक्सिडेंट्स, जैसे कि लिगनैंस, प्रचुर मात्रा में होते हैं. ये सभी तत्व टाइप 2 मधुमेह में फायदेमंद होते हैं. शोध के अनुसार, वे मधुमेह पीड़ित मरीज जो खराब कार्डियोवैस्कुलर सेहत से प्राय: पीड़ित होते हैं, और जिनकी बीमारी फ्री रेडिकल्स से और भी बिगड़ सकती है, उसे हटाने में तिल के ऑक्सीडेंट्स सहायता करते हैं.” राष्ट्रीय कैंसर, मधुमेह, कार्डियोवैस्कुलर रोग एवं आघात निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपीसीडीसीएस) के तहत व्यवहार और जीवनशैली परिवर्तन को लेकर लोगों को जागरूक किया जाता है. इसके तहत ज्यादा जोखिम से जुड़े लोगों की स्क्रीनिंग कर जांच की जाती है. साथ ही मधुमेह सहित गैर-संचारी रोगों के उपयुक्त प्रबंधन के लिए लोगों को जागरूक किया जाता है. इस कार्यक्रम के तहत तिल के तेल द्वारा प्रदान किए जाने वाले फायदों के प्रति भी लोगों को जागरूक किया जाता है. तिल के फायदे बेहद ही खास होते हैं। अक्सर सर्दियों में तिल और तिल से बनी गजक, चिक्की और लड्डू खाने का मजा ही अलग होता है। हिन्दू धर्म में जनवरी के महीने में आने वाले ‘मकर संक्राति’ और ‘संकेष्टि चतुर्थी’ के त्यौहार पर भी खास तौर पर तिल से पूजा की जाती है,साथ ही तिल से बने व्यंजनों को खाना शुभ माना जाता है। आमतौर पर तिल के साथ गुड़ और चीनी मिलाकर बहुत सारी मीठी चीजें(गजक, चिक्की और लड्डू) बनाई जाती है। छोट-छोटे काले-सफेद रंग के तिल में बहुत सारे औषधिय गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। तिल की तासीर गर्म होती है, जिसकी वजह से इसका सेवन सर्दियों में करना फायदेमंद होता है। तिल के सेवन से जहां शरीर को गर्माहट मिलती है, तो वहीं तिल में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट तत्व कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को रोकने में कारगर साबित होते हैं। तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड भी होता है जो शरीर से बुरे कोलेस्ट्रोल को कम करता है। हीं नहीं तिल का इस्तेमाल पूजा-पाठ में भी किया जाता है। शास्त्रों के मुताबिक, भगवान विष्णु की पूजा तिल के अनुपस्थिति में हमेशा अधूरी मानी जाती है। ऐसे में आज हम आपको तिल के फायदे बता रहे हैं, तिल से कई सारी और चीजें भी बनती हैं, जिनमें तिल को सड़ाने से सिरका बनता है, तो वहीं तिल को पीसकर तेल भी निकाला जाता है जो बेहद उपयोगी होता है। यद्यपि, उत्तराखंड उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन चक्र से में पर्वतीय इलाकों में पारंपरिक व स्थानीय फसलों के साथ ही नकदी फसलों को बढ़ावा देने की बात हुई, मगर इच्छाशक्ति के अभाव में इस मामले में कवायद ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली साबित हुई। ऐसा नहीं कि खेती की दशा सुधारने के प्रयास न हो रहे हों। हो रहे हैं, मगर ऐसे कि जो व्यवहार से कहीं मेल नहीं खाते। कृषि को बढ़ावा देने के लिए भारी-भरकम महकमे के साथ तमाम योजनाएं भी हैं, लेकिन नहीं है तो सूबे में कृषि के विकास की सोच और उस पर अमल करने की रणनीति। खैर! अब भी वक्त है। सरकार को खेती की दशा सुधारने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार कर इसे धरातल पर उतारना होगा।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












