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उत्तराखंड में भीषण लैंडस्लाइड मची तबाही

11/08/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में लैंडस्लाइड जोन की संख्या लगातार बढ़ रही है. स्थिति ये है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी लैंडस्लाइड को लेकर उत्तराखंड शुरुआती 3 राज्यों में शामिल हैं. खास बात ये है कि इसमें संवेदनशील लैंडस्लाइड जोन की भी अच्छी खासी संख्या है, जो प्रदेश के लिए बड़ी चिंता बना हुआ है.उत्तराखंड के ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो हर साल मानसून में सरकार के लिए चिंता बने रहते हैं. हालांकि यहां प्राकृतिक आपदाओं का एक लंबा इतिहास मौजूद है, लेकिन परेशानी इस बात की है कि हर मानसून एक नया क्षेत्र लैंडस्लाइड के रूप में पहचान बना लेता है. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने भी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे लैंडस्लाइड जोन चिन्हित किए हैं. खास बात यह है कि सर्वेक्षण के बाद भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने जो आंकड़ा सार्वजनिक किया है, वो देश के कई राज्यों के साथ ही उत्तराखंड के लिए भी चिंता पैदा करने वाला है. भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण देश में लैंडस्लाइड का पूर्वानुमान भी देता है.आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड में 14,780 लैंडस्लाइड क्षेत्र मौजूद हैं. लैंडस्लाइड क्षेत्र के हिसाब से उत्तराखंड देश में तीसरे नंबर पर आता है. इसके अलावा अरुणाचल प्रदेश में 26,213 लैंडस्लाइड जोन मौजूद हैं, जो पहले नंबर है. इसी तरह दूसरे नंबर पर हिमाचल प्रदेश है, यहां 17,102 लैंडस्लाइड जोन हैं. उत्तराखंड की बात करें तो GSI ने उत्तराखंड में कुल 39,009 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र का भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण किया. इसमें 14,780 लैंडस्लाइड क्षेत्र मिले हैं. उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग के सचिव ने बताया कि राज्य भी अपने स्तर पर लगातार भूस्खलन क्षेत्र चिह्नित करता रहा है. राज्य में इस समय 53 लैंडस्लाइड क्षेत्र चिन्हित हैं, जिनका पूरा डाटा आपदा प्रबंधन के पास मौजूद है. इन सभी लैंडस्लाइड क्षेत्रों पर सरकार की तरफ से काम किया जा रहा है, ताकि उनकी संवेदनशीलता को कम किया जा सके. उत्तराखंड के मुख्य रूप से चार जिले लैंडस्लाइड को लेकर सबसे ज्यादा प्रभावित दिखते हैं. इसमें रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी जिले शामिल हैं. हालांकि भूस्खलन को लेकर राज्य के 9 जिलों में कहीं ना कहीं संवेदनशील भूस्खलन क्षेत्र मौजूद हैं.  भूस्खलन के क्षेत्र में कई संस्थाएं काम कर रही हैं. यहां बात केवल उत्तराखंड की नहीं है बल्कि पूरे हिमालय रीजन में यदि किसी भी तरह की छेड़छाड़ या बदलाव होता है तो भूस्खलन की आशंका बहुत ज्यादा बन जाती है. इसके अलावा फॉरेस्ट फैलिंग के चलते भी पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन के मामले बढ़ रहे हैं, जबकि लगातार हो रहे विकास कार्यों के कारण पहाड़ों में हो रही छेड़छाड़ ने ऐसी घटनाओं को और बढ़ा दिया है. जिन क्षेत्रों में जितना ज्यादा विकास कार्य हो रहे हैं, उन्हीं क्षेत्रों में लैंडस्लाइड जोन भी बढ़ रहे हैं. इस दौरान कई जगह पर बड़े लैंडस्लाइड क्षेत्र भी रिकॉर्ड हुए हैं, जो अक्सर राष्ट्रीय राजमार्गों के बंद होने की भी वजह बने हैं.उत्तराखंड में पिछले एक दशक के भीतर कई बड़ी योजनाएं संचालित की गई हैं. इन क्षेत्रों में भी लैंडस्लाइड रिकॉर्ड किया जा रहे हैं. जानकार यह भी बताते हैं कि हिमालय क्षेत्र में बारिश की मात्रा बढ़ रही है और यह पर्वतीय क्षेत्र के लिए भूस्खलन को लेकर अच्छी बात नहीं है. जाहिर है कि इन स्थितियों के कारण भूस्खलन की घटनाओं को बल मिला है और इस तरह के मामलों में बढ़ोत्तरी हुई है. जोशीमठ में लैंडस्लाइड का भयावह नजारा देखने को मिला है। घटना जोशीमठ से करीब 40 किलोमीटर दूर तमक वैली की है। यहां पर बीआरओ की ओर से वैली ब्रिज का निर्माण कराया गया था। यह ब्रिज भी सैलाब की चपेट में आ गया। पुल के बहने का पूरा नजारा कैमरे में रिकॉर्ड हुआ था।  पहाड़ से पानी और मलबे का सैलाब ऐसा आया कि उसने अपने साथ कई लोगों को बहा दिया। जब तक लोग कुछ समझ पाते, तब तक पूरा इलाका उजड़ गया था। दरअसल, तमक वैली में बीआरओ की ओर से वैली ब्रिज का निर्माण कराया गया है। इसके जरिए इलाके के दर्जनों गांवों के लोग पास के शहर तक पहुंचते हैं। जोशीमठ के तमक वैली के नाले में सैलाब का वीडियो सामने आया है। इस में दिख रहा है कि पहाड़ की चोटियों की तरफ से तेज आवाज आती है। ऐसा लगता है कि बारिश के कारण पहाड़ बीच में जमा पानी नीचे की तरफ आ रहा है। इसके साथ-साथ मलबा भी आता है। देखते ही देखते पूरा नाला मलबे और पानी से भर जाताहै।पानी की तेज रफ्तार को देखते हुए पुल पार करने की तैयारी कर रहे कुछ लोग रुक जाते हैं। इस दौरान एक पिकअप गाड़ी पुल के पास खड़ी दिखती है। यह गाड़ी सैलाब के साथ ही बह जाती है।  आपदा की दृष्टि से संवेदनशील उत्तराखंड में वर्षाकाल के दौरान पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन की डरावनी तस्वीर है। कब कहां अतिवृष्टि से जमीन दरक जाए, कहा नहीं जा सकता। आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं उत्तराखंड में 9 अगस्त और 10 अगस्त को भारी से बहुत भारी बारिश का ऑरेंज अलर्ट जारी किया गया है भारी बारिश को देखते हुए एडवाइजरी भी जारी कर दी गई है. वही भारी बारिश से पिछले दिनों काफी नुकसान हुआ था. राज्य में अभी भी 120 सड़कें मलबा ,पत्थर और भूस्खलन के कारण बंद हैं. उत्तराखंड में कई ग्रामीण सड़क भी अभी भी बंद पड़ी हैं. क्योंकि लगातार मॉनसून सीजन में उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश हो रही है. राज्य के 13 जिलों की बात करें तो अल्मोड़ा में पांच सड़के बंद हैं, बागेश्वर में तीन, चमोली में 21, देहरादून में 17, नैनीताल में पांच, पौड़ी में 07, पिथौरागढ़ में 18, रुद्रप्रयाग में 8 ,टिहरी में 17 उत्तरकाशी में भी 17 सड़के अभी भी बंद हैं. पुल के बहने से नीती घाटी की ओर आवाजाही पूरी तरह प्रभावित हो गई है और क्षेत्र का जिला मुख्यालय से सड़क संपर्क बाधित हो गया है. बताया जा रहा है कि तमक इलाके में एक के बाद एक तीन बार अतिवृष्टि हुई. इसके बाद नाले में अचानक पानी का प्रवाह बढ़ गया और तेज बहाव अपने साथ वैली ब्रिज को भी बहा ले गया. वहीं, मौके पर भारी बारिश एवं अंधेरा होने के कारण रेस्क्यू कार्य में कठिनाई आ रही है. अब सुबह व्यापक स्तर पर रेस्क्यू अभियान शुरू किया जाएगा.सुरक्षा के मद्देजनर सुरईथोटा से तमक की ओर वाहनों की आवाजाही प्रतिबंधित कर दी गई है. साथ ही धौलीगंगा नदी के जलस्तर में संभावित वृद्धि को देखते हुए तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने के लिए सूचित किया जा रहा है. वहीं, जल विद्युत परियोजनाओं में कार्यरत संबंधित कंपनियों को भी सतर्क रहने के निर्देश दिए गए हैं, घटनास्थल एवं आसपास के क्षेत्रों में पुलिस बल तैनात कर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की गई है. किसी भी तरह की जोखिम भरी यात्रा न करें और प्रशासन की ओर से जारी सूचना के बाद ही आगे बढ़ें. चमोली में पिछले कुछ समय से लगातार बारिश का दौर जारी है. मौसम विभाग की ओर से भी प्रदेश में भारी बारिश को लेकर अलर्ट जारी किया गया था. इसी बीच नीती घाटी जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र में अतिवृष्टि फटने की घटना ने एक बार फिर डरा दिया है. तमक नाले में आए उफान के बाद एक बीआरओ कर्मचारी के बहने की सूचना है. आपदा के दूसरे दिन भी उसका कोई पता नहीं चल सका है. सीएम ने वैली ब्रिज बहने के कारण आसपास के गांवों में राशन, खाद्य सामग्री, दवाइयों एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित न हो, इसके लिए प्रशासन को विशेष व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए. उन्होंने कहा कि आवश्यकता पड़ने पर वैकल्पिक मार्गों से ग्रामीणों तक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए. अतिवृष्टि व बादल फटने से भूस्खलन की घटनाएं भी बढ़ी हैं। इन्हीं में अधिक क्षति हो रही है। लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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