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दशरथ मांझी और चिपको की गौरा बन ग्रामीण बना रहे सड़क!

30/12/24
in उत्तराखंड, चमोली, देहरादून
Reading Time: 1min read
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

पिछले कुछ दिनों से जब पहाड में भारी बर्फ़बारी और बारिश की खबर से ही ठण्ड का आभास हो रहा है तब कडाके की ठंड में भी उत्तराखंड के टिहरी जिले के ग्रामीणों ने दशरथ मांझी की तर – कुदालें, फावड़े, सब्बल, रैक, गैंती, दरांती और थमाली के सहारे बंगशील से ओडारशु गाँव से ओडार्सू मोटर-मार्ग/ संपर्क मार्ग के निर्माण के लिए कमर कसी हुई है, गौरतलब है कि, इस क्षेत्र के ग्रामीण बड़े लम्बे समय से बंगशील से ओडारशु के एक छोटे से मोटर मार्ग के निर्माण के लिए मांग कर रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं और कड़ाके की ठंड में भी पुरुष, महिलाएँ, बुजुर्ग और बच्चे इस रास्ते को बनाने के लिए कुदाल-फावड़ा, दरांती लेकर रास्ता बनाने के लिए एकजुट हो गए हैं. बंगशील से ओडार्सू, दोनों गांव सड़क से तो जुडे़ हैं किन्तु दोनों गांवों के बीच 4 कि० मी० सड़क मार्ग से जुड़ नही़ पाए जिस कारण एक गांव से दूसरे गांव जाने के लिए लगभग 18 से 20 कि० मी० जाना पड़ता है. साथ ही अब ये मार्ग उत्तरकाशी एवं चिन्यालिसौड के लिए भी इन तमाम गाँवों को इकतरफ़ा कनेक्टिविटी प्रदान करने में सहायक होगा, जहां से कि जौनपुर के अधिकांश हित जुड़े हुए हैं. यदि यह 4 कि० मी० सड़क बन जाए तो दोनों गांव आपस में मोटर मार्ग से जुड़ जांएगे व लगभग 14 से 16 कि० मी० का फासला भी कम हो जाएगा. इसी दूरी को कम करने के लिए बंगशील ओडार्सू मोटर मार्ग निर्माण क्षेत्रवासियों की प्रमुख मांग रही है.ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भी मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार है और इस क्षेत्र में भी रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ, पर्यटन की सुविधा का लाभ सभी ग्रामीण उठा सकेंगे. असल में यह मोटर मार्ग जिसमे किस भी प्रकार से देवदार और अन्य प्रजाति के पेड़ पौधों को नहीं काटा जाएगा- उसके निर्माण में वन विभाग, इस क्षेत्र में कुछ होम स्टे संचालक और यह भी कहा जा रहा है लोकनिर्माण विभाग के इंजिनीयर भी रोड़ा अटकाने का कार्य कर रहे हैं. दूसरी और स्थानीय लोग बता रहे हैं कि, इस छोटे रास्ते जो कि पहले से ही एक चौड़े पैदल रास्ते के स्वरुप में है- उसको सिर्फ थोडा  चौड़ा करके हलके वाहनों और इमरजेंसी में एम्बुलेंस जैसे वाहनों, स्कूली बच्चों के लिए बनाया जाना बेहद जरूरी है साथ ही गांव की नगदी फसलों, अनाज सब्जी आदि बेचने के लिए  और क्षेत्र में इकोटूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए फायदेमंद होगा और इससे पलायन को रोकने में सहायता मिलेगी.इस मार्ग को बनाने के दौरान झाड़ियों के अलावा किसी भी वृक्ष प्रजाति का न तो कटान होना है और ना ही दबान होना है -महिलाओं और युवाओं के द्वारा हाथ के ओजारों से बनाई जा रही इस सड़क को -डग एंड फिल मेथड से बनाया जा रहा है , जिसमे भूमि के कटान से निकली मिटटी को ढाल पर भी नहीं फेंकना पड़ता है . लेकिन फिर भी स्थानीय महिला मंगल दल रोड के बनाने के साथ साथ -1000 देव रिंगाल और देवदार के 1000 के पौधों की नर्सरी का निर्माण भी कर रहे हैं इस प्रकार से ग्रामीण – सड़क के साथ चिपको आन्दोलन के पर्यावरण के सन्देश को भी टिहरी गढ़वाल की 4 पट्टियों जैसे – पट्टी पालीगाड़ के साथ साथ दशजूला ग्रामीणों ने ख़ुद यहाँ पर संपर्क मार्ग तैयार करने की ज़िद ठान ली है उनकी शिकायत है कि फारेस्ट के अधिकारी ख़ुद लोगों से जंगली जानवरों की डर से घरों से बाहर ना निकालने की अपील करते हैं तो ऐसे में वो अपने बच्चों को स्कूल भी कैसे भेज पाएँगे? इन जंगलों से आवाजाही समय के साथ और भी ख़तरनाक होती जा रही है, यदि इलाक़े में पलायन को रोकना है तो उसके लिए उन्हें सड़क और सुविधाएँ भी चाहिए. आज वहाँ पर श्रमदान करने के लिए हर जाति और वर्ग के लोग एकजुट हो रखे हैं. इस क्षेत्र में लोकसभा चुनाव के बीच ‘रोड नहीं तो वोट नहीं’ के नारे भी लगे थे और ग्रामीणों ने मतदान का बहिष्कार भी किया था. दोनो गांवों को सड़क से जोड़कर पूरे क्षेत्र का विकास भी संभव है, लेकिन इन सब बातों के बीच कुछ छद्म पर्यावरणविद ( दिल्ली- देहरादून वाले  जिन्होंने इस क्षेत्र को अपनी रोजी रोटी का साधन बना रखा है बाकि उनको उत्तराखंड के सरोकारों से कोई लेना देना नही है ) और कुछ . गैर-सरकारी संगठन वाले  अपने सरकारी ग्रांट के धंधे के लिए इस सड़क का निर्माण नहीं होने देना  चाहते हैं . गैर-सरकारी संगठन वालों ने फर्जी तरीके से ग्रामीणों पर देवदार की ईमारती लकड़ियों की तस्करी की शिकायत भी की है . उनके द्वारा यह झूठ और भ्रम फैलाया ज रहा है कि,  इस सड़क निर्माण से कई पेड़ कटेगें, लेकिन जिस पुराने पैदल मार्ग या वन विभाग की पुरानी निरिक्षण बटिया या फायर लाइन से इन  जंगलो की सुरक्षा की जाती है ग्रामीण सिर्फ उस सड़क को ही थोडा चौड़ा मार्ग  बना रहे हैं- इससे वन विभाग को ही जंगलों की सुरक्षा  और जंगल की आग रोकने में मदद मिलेगी .जनप्रतिनिधियों से बात चीत में उन्होंने बताया कि, इस बार भी जब श्रमदान कर रास्ता बनाने के लिए लोग एकजुट हुए तो उनके कार्य में तरह-तरह की बाधा डालने के प्रयास हो रहे हैं. गैर-सरकारी संगठन और उनके हैंडलर्स के नाम से उन्हें डराने और धमकाने के साथ-साथ फारेस्ट के अधिकारियों पर दबाव बनाने का भी कार्य किया जा रहा है टिहरी जनपद में बन रही ग्रामीणों की इस सड़क की माँग का मामला टिहरी ज़िलाधिकारी के पास भी  पहुँच गया है जिसमें उन्होंने संबंधित अधिकारियों को उचित कार्रवाही करते हुए इस मामले का समाधान निकालने के आदेश दिये हैं. हाल ही में मुख्यमंत्री के पास जब यह मामला पहुंचा  तो उन्होंने इसका संज्ञान लेते हुए यह आश्वासन दिया है कि आचार संहिता हटने के बाद वे ख़ुद इस सड़क मार्ग के लिए स्थानीय नागरिकों के हित में उचित कार्रवाई करेंगे. हालाँकि, 45 गाँवों के ये ग्रामीण अपने श्रमदान से कड़ाके की ठंड, बर्फ और बारिश के बीच भी मौक़े पर डटे हुए हैं और मार्ग बनाने में जुटे हैं. आजकल के समय में जब विकास और मूलभूत आवश्यकताओं के आवरण में जनशक्ति एकजुट हो जाए तो फिर राह में कोई काँटा नहीं बिछा सकता. इस एकजुटता का एक बड़ा उदाहरण पट्टी पालीगाड़ के साथ साथ दशजूला जैसी चार पट्टियों के ग्रामीणों ने ख़ुद यहाँ पर संपर्क मार्ग तैयार कर स्थापित करने की जिद्द के साथ स्थापित कर दिया है.।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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