डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
भारत का पहला चुनाव 1950 के दशक के विश्व के सबसे चुनौतीपूर्ण प्रशासनिक कार्यों में से एक था। इसके अभूतपूर्व पैमाने और प्रचलित सामाजिक परिस्थितियों ने कई समस्याएं पैदा कीं। आपको यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि लगभग 28 लाख महिलाओं के नाम, जिनमें से अधिकांश हिंदी पट्टी में थीं, को मतदाता सूची से हटा दिया गया था क्योंकि वे पुरुषों से अपने संबंध से पहचानी जाना चाहती थीं- फलां की मां, चिलां की पत्नी, उनकी की बेटी आदि। वर्षों से मतदाताओं और प्रतिनिधियों के रूप में चुनावों में भारतीय महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, लेकिन प्रगति इतनी धीमी है कि आज भी भारत अधिकांश प्रमुख देशों से बहुत पीछे है। सरकार की महिलाओं को राजनीति में पावरफुल बनाने योजना विपक्ष के अड़ंगे के चलते धरी की धरी रह गई. राजनीति में महिलाओं को 33% आरक्षण दिलाने के लिए केंद्र की सरकार 3 बिल, केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026, संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 और परिसीमन विधेयक 2026 सदन में लेकर आई थी.लेकिन, वोटिंग के बाद विधेयकों को दो तिहाई बहुमत (352 वोट) नहीं मिला. 528 सांसदों में से पक्ष में 298 वोट मिले, जबकि 230 ने खिलाफ मतदान किया. इसके चलते ये बिल पास नहीं हो पाए और महिला आरक्षण लटक गया. जबकि, दुनिया के 7 देश ऐसे हैं जहां की संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी 64% तक है. भारत की राजनीति में महिलाओं की स्थिति पहले के मुकाबले अब बदल रही है. यह अब भागीदारी से नेतृत्व की ओर बढ़ रही है. आंकड़ों पर नजर डालें तो देश में आम चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की कुल संख्या 1957 में 3% से बढ़कर 2024 में 10% हो गई है. यही नहीं, चुनी गई महिला सदस्यों की संख्या, जो पहली लोकसभा में 22 और दूसरी लोकसभा में 27 थी, वो अब 18वीं लोकसभा में बढ़कर 75 हो गई है. यानी 543 में से 14% सांसद महिला हैं. राज्यसभा में भी, 1952 में महिला सदस्यों की कुल संख्या 15 थी, जबकि वर्तमान में 39 है. यह कुल सदस्यों का लगभग 17% है. इसके अलावा, देश में पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 14.5 लाख चुनी हुई महिला प्रतिनिधि हैं. जो कुल चुने हुए प्रतिनिधियों का लगभग 46% है. देश में ऐसे 21 राज्य हैं, जिन्होंने महिलाओं के लिए न्यूनतम 33% आरक्षण के संवैधानिक आदेश के मुकाबले पंचायती राज में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान किया हुआ है. इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन और UN Women के नए डेटा के अनुसार महिलाएं अभी भी समान राजनीतिक शक्ति से बहुत दूर हैं. दुनिया भर में कैबिनेट पदों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 22.4% और संसदीय सीटों में 27.5% है. हालांकि, 14 देशों ने कैबिनेट में लैंगिक समानता हासिल कर ली है, जिससे यह साबित होता है कि समान प्रतिनिधित्व संभव है. फिर भी, आठ देशों में अभी भी कोई महिला मंत्री नहीं है. दुनिया भर में संसदीय सीटों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 27.5% है, जो 2025 के 27.2% से थोड़ी ज्यादा है. सिर्फ 0.3 प्रतिशत अंकों की यह बढ़ोतरी, 2017 के बाद से दर्ज की गई सबसे धीमी वृद्धि का लगातार दूसरा साल है. यह इस बात को उजागर करता है कि राजनीतिक निर्णय लेने की प्रक्रिया में महिलाएं कितनी धीमी गति से आगे बढ़ रही हैं. डेटा के अनुसार राजनीति में महिलाओं को जनता की तरफ से, ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों ही जगहों पर बढ़ती हुई शत्रुता और डराने-धमकाने का सामना करना पड़ रहा है. सर्वे में शामिल 76% महिला सांसदों ने बताया कि उन्हें जनता द्वारा डराया-धमकाया गया, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा 68% था. यह एक ऐसा चलन है जो महिलाओं को चुनाव लड़ने से रोकता है और समान राजनीतिक सत्ता की दिशा में हो रही प्रगति को धीमा कर रहा है. में, राजनीतिक नेतृत्व में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है, और सबसे शक्तिशाली निर्णय अब भी अधिकतर पुरुषों द्वारा ही लिए जाते हैं। अंतर-संसदीय संघ (आईपीयू) और संयुक्त राष्ट्र महिला द्वारा जारी नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, 2026 में केवल 28 देशों में ही महिला राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख होंगी, जबकि 101 देशों में कभी भी कोई महिला नेता नहीं रही है । जब महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व से बाहर रखा जाता है, तो शांति, सुरक्षा और आर्थिक प्राथमिकताओं को निर्धारित करने वाले निर्णय दुनिया के आधे से अधिक लोगों के अनुभव के बिना ही लिए जाते हैं। नए वैश्विक आंकड़े महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व में ठहराव और कुछ मामलों में गिरावट को दर्शाते हैं साल 1997 में केवल पांच देशों स्वीडन, नॉर्वे, फिनलैंड, डेनमार्क और नीदरलैंड में 30 प्रतिशत से अधिक सांसद महिलाएं थीं, लेकिन अब यह संख्या 63 हो चुकी है, यानी दोगुनी से ज्यादा। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सिर्फ 6 देशों की संसद के किसी एक सदन या निचले सदन में 50 प्रतिशत से अधिक सांसद महिलाएं हैं। 23 देशों में 40 प्रतिशत से अधिक सांसद महिलाएं हैं। 22 देश ऐसे बचे हैं, जहां महिला सांसद 10 प्रतिशत से कम हैं। कई अहम देशों जैसे भारत, ब्राजील, रूस आदि का प्रतिशत वैश्विक औसत से कहीं पीछे है। दुनिया में कानूनी तौर पर महिलाओं को संसद में आरक्षण देने वाला पहला देश अर्जेंटीना है उसने 1991 में कुल प्रत्याशियों में 30 प्रतिशत महिलाएं होना अनिवार्य किया। 1991 में 5.4% से बढ़कर इस समय वहां की संसद में 44.75 प्रतिशत सांसद महिलाएं हैं। मानव विकास सूचकांक में हाई रैंकिंग वाले देशों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अधिक होता है। उदाहरण के लिए, न्यूजीलैंड में 50% से अधिक महिला सांसद हैं। स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, यूके और इटली में भी निचले सदन में प्रत्येक में 30% से अधिक महिला प्रतिनिधि हैं। भारत न केवल इन अमीर देशों से बल्कि अपने पड़ोसियों नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी पीछे है। हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय संगठनों में नेताओं या उच्च पदस्थ अधिकारियों के रूप में कर्तव्य निभाने वाली महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है. जर्मनी स्थित सांख्यिकी कंपनी स्टेटिस्टा के आंकड़ों के अनुसार, 1960 और 2021 के बीच कुल 58 देशों पर एक महिला द्वारा शासन किया गया. वहीं, संयुक्त राष्ट्र के संयुक्त राष्ट्र महिला प्रभाग के अनुसार, 19 सितंबर, 2022 तक 30 महिलाएं 28 देशों में राज्य प्रमुख और/या सरकार के प्रमुख के रूप में कार्यरत थीं. हाल ही में लोकसभा में महिला आरक्षण बिल से जुड़ा अहम संविधान संशोधन विधेयक पास नहीं हो सका. लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।












