डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. राज्य में 30 जून 2026 के साथ ही उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और 1 जुलाई से मदरसों की निगरानी, मान्यता, पाठ्यक्रम और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण के हाथों में आ जाएगी., सरकारी रिपोर्ट्स के अनुसार राज्य में वर्तमान में 452 पंजीकृत मदरसे हैं. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन लगभग 500 मदरसों को लेकर है, जो बिना मान्यता या पंजीकरण के संचालित पाए गए हैं. पिछले डेढ़ साल में सरकार ने इनके खिलाफ व्यापक अभियान चलाया.साल 2025-26 के दौरान अवैध मदरसों के खिलाफ कार्रवाई में पहले 136 और बाद में 170 तक संस्थानों पर सीलिंग और अन्य कानूनी कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई. हालांकि, अभियान अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा है. ऐसे में 1 जुलाई के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शेष अपंजीकृत संस्थानों का क्या होगा. क्या उन्हें निर्धारित मानकों को पूरा करने का अवसर दिया जाएगा या फिर उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी. यह प्रश्न सरकार और प्रशासन दोनों के लिए अहम बना हुआ है. उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड का काउंटडाउन शुरू हो चुका है. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल मदरसों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों के सुरक्षित भविष्य की है. ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार ने मदरसा बोर्ड को भंग करने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में शैक्षणिक रूप से कुछ बड़े बदलाव का फैसला लिया है, जिसपर खासतौर से कई मदरसा स्वामी सहमत नहीं दिखाई दिए हैं. ऐसे में इन मदरसों का उत्तराखंड बोर्ड में रजिस्ट्रेशन करवाना और यहां पढ़ने वाले बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं. सरकार इस बदलाव को समान शिक्षा व्यवस्था और मुख्य धारा की शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मान रही है, लेकिन नई व्यवस्था लागू होने में अब कुछ ही दिन शेष हैं और कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब अभी भी नहीं मिले हैं. मदरसा बोर्ड के समाप्त होने के बाद इन सभी संस्थानों को राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण के अधीन आना होगा, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितने मदरसे नई शर्तों को पूरा करने के लिए तैयार हैं और कितनों ने अभी तक प्राधिकरण से जुड़ने की प्रक्रिया शुरू की है. विभागीय अधिकारियों के अनुसार कई संस्थानों ने आवश्यक दस्तावेजी प्रक्रिया शुरू कर दी है, जबकि कुछ अभी भी संशय की स्थिति में हैं. सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन लगभग 500 मदरसों को लेकर है, जो बिना मान्यता या पंजीकरण के संचालित पाए गए हैं. पिछले डेढ़ साल में सरकार ने इनके खिलाफ व्यापक अभियान चलाया.साल 2025-26 के दौरान अवैध मदरसों के खिलाफ कार्रवाई में पहले 136 और बाद में 170 तक संस्थानों पर सीलिंग और अन्य कानूनी कार्रवाई किए जाने की जानकारी सामने आई. हालांकि, अभियान अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा है. ऐसे में 1 जुलाई के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शेष अपंजीकृत संस्थानों का क्या होगा. क्या उन्हें निर्धारित मानकों को पूरा करने का अवसर दिया जाएगा या फिर उनके खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी. यह प्रश्न सरकार और प्रशासन दोनों के लिए अहम बना हुआ है. राज्य में मदरसों की सर्वाधिक संख्या हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून जिलों में है. विशेष रूप से तराई और सीमावर्ती क्षेत्रों में मदरसों का घनत्व अधिक माना जाता है. इसलिए नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन जिलों पर प्रशासन की विशेष नजर रहने वाली है. यदि नई शिक्षा नीति और एनसीईआरटी आधारित पाठ्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू करना है तो सबसे पहले इन्हीं जिलों में व्यापक निगरानी और संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी. नई व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष एनसीईआरटी आधारित पाठ्यक्रम को लागू करना है. सरकार लंबे समय से यह स्पष्ट करती रही है कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को भी विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और अन्य आधुनिक विषयों की शिक्षा मिलनी चाहिए ताकि वे प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं और उच्च शिक्षा में पीछे न रह जाएं, लेकिन वास्तविक चुनौती यह है कि कितने मदरसे इसके लिए तैयार हैं.कई संस्थानों में अभी तक आधुनिक विषयों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी बताई जाती है. विशेष रूप से विज्ञान और गणित जैसे विषयों के शिक्षकों की उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा बन सकती है. यदि शिक्षक ही नहीं होंगे तो समान शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य अधूरा रह सकता है. अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण के सामने केवल पाठ्यक्रम लागू करना ही चुनौती नहीं है. उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक मदरसे में आवश्यक शिक्षण संसाधन उपलब्ध हों. कई छोटे मदरसे अभी भी सीमित संसाधनों के साथ संचालित हो रहे हैं.प्राधिकरण को यह आकलन करना होगा कि कितने संस्थानों के पास पर्याप्त कक्षाएं, पुस्तकालय, विज्ञान प्रयोगशालाएं और प्रशिक्षित शिक्षक मौजूद हैं. यदि यह व्यवस्था समय पर नहीं हो पाई तो नई नीति के क्रियान्वयन में व्यावहारिक कठिनाइयां सामने आ सकती हैं. नई व्यवस्था का सबसे सीधा प्रभाव छात्रों पर पड़ेगा. हजारों विद्यार्थी वर्तमान में मदरसों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं. ऐसे में अभिभावकों और छात्रों के बीच भी यह जिज्ञासा बनी हुई है कि 01 जुलाई के बाद उनकी पढ़ाई का स्वरूप क्या होगा.सरकार का कहना है कि किसी भी छात्र की शिक्षा प्रभावित नहीं होने दी जाएगी, लेकिन यह सुनिश्चित करना होगा कि बोर्ड समाप्त होने के बाद प्रमाणपत्र, परीक्षा प्रणाली, पाठ्यक्रम और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न न हो. मदरसा बोर्ड समाप्त होने के बाद राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण पहली बार इतने बड़े स्तर पर जिम्मेदारी संभालेगा. उसे एक साथ सैकड़ों संस्थानों का पंजीकरण, निरीक्षण, पाठ्यक्रम निर्धारण, शिक्षक व्यवस्था और नियामक नियंत्रण सुनिश्चित करना होगा.दिलचस्प बात यह है कि नई व्यवस्था लागू होने में अब केवल कुछ दिन ही शेष हैं, जबकि कई प्रक्रियाएं अभी भी पूरी तरह अंतिम रूप नहीं ले सकी हैं. ऐसे में विभागीय अधिकारियों पर भी भारी दबाव है कि 1 जुलाई से किसी प्रकार का प्रशासनिक शून्य न बने. राज्य सरकार इस बदलाव को शिक्षा सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई व्यवस्था जमीन पर कितनी प्रभावी साबित होती है. यदि मदरसों को मुख्य धारा की शिक्षा से जोड़ा जाता है. आधुनिक विषयों के शिक्षक उपलब्ध कराए जाते हैं और छात्रों को बेहतर अवसर मिलते हैं, तो यह प्रयोग सफल माना जाएगा. हालांकि, इसके विपरीत यदि पंजीकरण, शिक्षक, पाठ्यक्रम और निगरानी से जुड़े सवाल अनसुलझे रह जाते हैं तो सरकार को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ सकता है. 30 जून के बाद उत्तराखंड मदरसा बोर्ड इतिहास का हिस्सा बन जाएगा. इसके बाद राज्य में मदरसा शिक्षा की पूरी तस्वीर बदलने वाली है, लेकिन इस बदलाव के साथ कई ऐसे सवाल भी खड़े हैं जिनका जवाब आने वाले दिनों में ही मिलेगा. 452 पंजीकृत मदरसों का भविष्य, लगभग 500 अपंजीकृत संस्थानों पर कार्रवाई, एनसीईआरटी पाठ्यक्रम का क्रियान्वयन, आधुनिक विषयों के शिक्षकों की उपलब्धता और हजारों छात्रों की शिक्षा, यह सभी मुद्दे अब सीधे राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण की परीक्षा लेने वाले हैं. एक जुलाई से शुरू होने वाला यह नया अध्याय उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में कितना सफल होगा, इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं. उत्तराखंड देवभूमि है और देवभूमि में वैध या अवैध किसी तरह के मदरसों की कोई जरूरत नहीं है. परमार्थ आश्रम के परमाध्यक्ष स्वामी ने कहा कि, मदरसा बोर्ड भंग करने का उद्देश्य यही है कि देश की जो शिक्षा नीति है, उसमें सबको शिक्षा का सामान अधिकार मिले. केवल धर्म की शिक्षा नहीं बल्कि बच्चे विज्ञान गणित और भूगोल भी पढ़ें. सरकार का मानना है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में शिक्षा का स्तर बेहतर होगा और छात्रों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने में मदद मिलेगी. साथ ही संस्थानों की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता आएगी और सरकारी सहायता का सही उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा.अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार जून और जुलाई तक नई व्यवस्था को किस तरह लागू करती है और मदरसों सहित अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान इन नियमों को किस रूप में स्वीकार करते हैं. क्योंकि आने वाले समय में यही व्यवस्था प्रदेश में अल्पसंख्यक शिक्षा की दिशा और स्वरूप तय करने वाली है. , यह सभी मुद्दे अब सीधे राज्य अल्पसंख्यक शिक्षण प्राधिकरण की परीक्षा लेने वाले हैं. एक जुलाई से शुरू होने वाला यह नया अध्याय उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में कितना सफल होगा, इस पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं., इसका मूल उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना और छात्रों को बेहतर अवसर देना है. मामला इसलिए भी अहम हो जाता है, क्योंकि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में अल्पसंख्यक समुदायों के शैक्षणिक संस्थान लंबे समय से सामाजिक ताने बाने का हिस्सा रहे हैं. अब जब सरकार ने इन्हें संस्थागत ढांचे में और व्यवस्थित करने की पहल की है, तो इसे लेकर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं. लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.











