डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
आज 14 अप्रैल 2026है—भारत के संविधान निर्माता, बोधिसत्व डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती। पूरे देश में उत्साह है, नीले झंडों की बहार है और हर गली में ‘जय भीम’ के नारे गूँज रहे हैं। लेकिन इस शोर-शराबे के बीच आज एक गंभीर सवाल खुद से पूछने की जरूरत है: क्या हम बाबा साहब के दिखाए रास्ते पर चल रहे हैं, या हमने उन्हें भी सिर्फ एक मूर्ति और उत्सव तक सीमित कर दिया है?
शिक्षासंघर्ष का असली हथियार
बाबा साहब ने कहा था— “शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” उन्होंने अपना पूरा जीवन किताबों और पढ़ाई को समर्पित कर दिया ताकि वे अपने समाज को अज्ञानता और गुलामी की बेड़ियों से बाहर निकाल सकें। उन्होंने दुनिया के सबसे कठिन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई की और अपनी विद्वत्ता से भारत का भाग्य लिखा।
आज हम उनकी जयंती पर नाचते हैं, रैलियां निकालते हैं और बड़े-बड़े डीजे पर गानों का आनंद लेते हैं। उत्सव मनाना गलत नहीं है, लेकिन क्या हम उनके उस “अध्ययन” और “कड़ी मेहनत” वाले अनुशासन को अपना रहे हैं? क्या आज का युवा अपनी शिक्षा के प्रति उतना ही गंभीर है जितना बाबा साहब थे?
अंधभक्ति बनाम वैचारिक क्रांति
विडंबना यह है कि जिस महापुरुष ने पूरी जिंदगी अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ लड़ाई लड़ी, आज कुछ लोग उन्हें ही ‘अंधश्रद्धा’ का पात्र बना रहे हैं। हम उनकी पूजा तो कर रहे हैं, पर उनके सिद्धांतों को नहीं पढ़ रहे। हम रैलियों की भीड़ का हिस्सा तो बन रहे हैं, पर समाज की बुराइयों को मिटाने के लिए बौद्धिक चर्चाओं का हिस्सा नहीं बन पा रहे।
दिखावे की दौड़ या बदलाव की राह?
आज समाज में एक अंधी दौड़ मची है—बड़ी रैलियां करने की, ऊंचे स्वर में गाने बजाने की और दिखावे की। बाबा साहब चाहते थे कि समाज का हर व्यक्ति उच्च शिक्षित बने, प्रशासनिक पदों पर पहुंचे और नीति-निर्माता बने। वे चाहते थे कि हम अपने आचरण और शिक्षा से समाज का स्तर ऊंचा उठाएं।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.












