————– प्रकाश कपरुवाण।।
ज्योतिर्मठ।
सनातन धर्म के सर्व श्रेष्ठ धाम बद्रीनाथ की महिमा को धूमिल करने के प्रयास आजादी से पूर्व भी होते रहे हैं, तब की हुकूमतों ने भी बद्रीनाथ धाम की गरिमा को बचाने के लिए अनेक प्रयास किए और धाम की गरिमा और पारदर्शी व्यवस्था बनाने के लिए श्री बद्रीनाथ मंदिर अधिनियम का विशेष राजपत्र जारी किया जिसके तहत आज भी व्यवस्थाओं का संचालन हो रहा है।
श्री बद्रीनाथ धाम सनातन हिन्दू तीर्थ के सबसे पवित्र स्थलों मे से भी श्रेष्ठ है, वर्ष 1899की प्रस्तावना के अनुसार बद्रीनाथ मंदिर की प्रबंधन व्यवस्था रावल के हाथ मे थी और पर्यवेक्षी शक्तियां टिहरी दरवार मे निहित थी, तब के दौर मे भी मंदिर की स्थिति असंतोषजनक और तीर्थ यात्रियों की सुविधाएँ भी उपेक्षित होती रही, प्रबंधन व्यवस्था संभाल रहे रावल जब स्वेच्छाचारी होने लगे तो वर्ष 1928मे जनआंदोलन की शुरुवात हुई और “हिन्दू धार्मिक एवं धार्मिक बंदोबस्ती” समिति ने बद्रीनाथ धाम के गंभीर विषय को तत्कालीन सयुंक्त प्रान्त सरकार के सम्मुख रखा।
आजाद भारत से पूर्व की सरकार ने भी बद्रीनाथ धाम के महत्व को समझा, अध्ययन व गंभीर चिंतन किया और वर्ष 1939मे श्री बद्रीनाथ मंदिर अधिनियम का विशेष राजपत्र जारी किया, वर्ष 1948मे केदारनाथ मंदिर व सहवर्ती मंदिरों को भी सम्मलित करते हुए श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर अधिनियम अस्तित्व मे आया।
लेकिन आज जिस प्रकार के भ्र्ष्टाचार, चढ़ावा -दान चोरी जैसी घटनाएं सामने आ रही है उससे तो यही लग रहा है कि 1939से पहले रावल शाही के दौरान भी इसी प्रकार की घृणित घटनाएं होती थी और तब की सरकार ने रावल के अधिकार को सिर्फ पूजा तक नियंत्रित कर दिया था, परन्तु आज जिस प्रकार की घटनाएं हुई है यह बद्रीनाथ धाम की गरिमा के लिए वाकई बेहद चिंताजनक है।
जब आजादी से पूर्व एवं उत्तर प्रदेश मे रहते हुए भी सनातन धर्म के सर्व श्रेष्ठ धाम की गरिमा धूमिल व कलंकित होने से बचाया जाता रहा तो आखिर क्या कारण है कि उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद उत्तराखंड की आर्थिकी की सबसे मजबूत रीढ़ चारधामों मे सर्वश्रेष्ठ धाम बद्रीनाथ की महिमा को तार -तार करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है.?।
कारण जो भी हो किन्तु प्रमुख कारणों मे एक यह भी है कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के मुख्यालय जोशीमठ का अस्तित्व धीरे धीरे समाप्त करते हुए पहले देहरादून और अब ऋषिकेश से व्यवस्थाएँ संचालित होने लगी है, जबकि मंदिर समिति के प्रस्ताव दिनांक 05मार्च 1941 के अनुसार मंदिर समिति का मुख्यालय जोशीमठ मे ही स्थापित किया गया था और वह प्रस्ताव तब की सरकार द्वारा अनुमोदित है, प्रस्ताव तो आज भी अस्तित्व मे है परन्तु मुख्यालय अस्तित्व ने नहीं है।
इस प्रकार के निर्णय से ऋषिकेश-देहरादून के कार्यालयों की भव्यता तो बनी किन्तु यात्रा मार्ग पर यात्री विश्राम गृहों की दुर्दशा और धामों को कलंकित करने वाली घटनाओं ने देवभूमि उत्तराखंड को ही शर्मसार कर दिया है।
हालांकि मुख्यमंत्री ने बद्रीनाथ धाम की घटना को बेहद गंभीरता से लेते हुए भगवान बद्रीविशाल के नाम से चढ़ने वाले दान-चढ़ावे व अन्य सामग्रियों की हेरा फेरी व चोरी को “गौहत्या” जैसा पाप बताया है, और एसआईटी इसी के अनुरूप कार्य भी कर रही है। परन्तु प्रश्न यह है कि जिस भगवान बद्रीविशाल के दर्शन मात्र के लिए प्रति वर्ष लाखों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं उनकी आस्था पर गहरी चोट पहुँचाने की स्थिति आखिर क्यों सामने आ रही है?, इस पर गहन चिंतन व मंथन किए जाने की जरूरत है ताकि भगवान बद्रीविशाल के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था को अक्षुण रखा जा सके।
अब समय है किसी निर्दोष के उत्पीड़न से बचते हुए सनातन आस्था के सर्वोच्च केन्द्र बद्रीनाथ की गरिमा को चोट पहुँचाने व विवादों मे घसीटने की साजिश करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही हो ताकि भविष्य मे वर्तमान मे घटित घटनाओं को अंजाम देने का दुस्साहस कोई भी न कर सके।











