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भगवान के दरबार में भ्रष्टाचार वहां सुशासन की नई क्रांति का सूत्रपात हो

20/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
पृथ्वी पर संस्कृति और सभ्यता के स्थापना के आरंभ से भी पहले काल यानी समय गतिषील बना रहा है। काल की निरंतरता, अर्थात उसके आगे बढ़ते रहने की नियति है। संपूर्ण जीव-जगत, चल-अचल और चेतन-अचेतन की महत्ता व महिमा उसी की परिधि में हैं। वह काल ही है, जो सूर्य को अनुषासित रखता है और चंद्रमा की कलाओं को नियंत्रित करता है। सूर्य और चंद्रमा की गतियों व स्थितियों को जानने की पहली जिज्ञासाएं ही ज्ञान को स्थापित करने और उन्हें संस्कृति के रूप में जीवन से जोड़ने और जीवन-षैली को उनके अनुरूप ढालने की मान्यताएं हैं। ज्योतिश, गणित, खगोल और दर्षन सूर्य एवं चंद्रमा के उदय व अस्त होने के कारण और गणनाओं से जुड़़े समय को मापने की प्रणालियां विकसित हुईं। ज्ञान के इस दर्षन की पहली स्थापनाएं संस्कृत में ऋचाओं तथा ष्लोंको के माध्यम से रची गईं और इन्हें हजारों वर्श वाचिक परंपरा के माध्यम से अक्षुण्ण रखने के उपाय किए गए। इन ऋचाओं के रचियता पुरुशों को ऋशि और स्त्रियों को ऋशिका कहा गया। इन्हीं ऋचाओं का संग्रह ‘ऋग्वेद‘ है। इसमें कुल दस मंडल हैं, जिनमें 1028 सूक्त और 10,580 ऋचाएं हैं। भारतीय सनातन संस्कृति, धर्म, ज्ञान और विज्ञान के इस ग्रंथ ऋगवेद को दुनिया के मनीशियों ने निर्विवाद रूप से मान लिया है कि यह विष्व की पहली लिखित पुस्तक है। यानी प्रकृति के धरा पर मनुश्य के अवतरण के साथ उसके क्रमबद्ध विकास और प्रकृति विज्ञान को जानने का पहला अभिलेख ऋगवेद है। इसे वैदिक युग के पूर्व और वर्तमान का विष्व ज्ञान कोष कहा गया है। इसी एक तथ्य से प्रभाणित हो जाता है कि वैदिक और वेदोत्तर युग में भारत का जिस-जिस भूखंड में विस्तार था, सांस्कृतिक और सभ्यता की प्रमुख स्थापनाएं वहीं हुईं। विज्ञान की आरंभिक की स्थापनाएं भी इन्हीं सांस्कृतिक स्थापनाओं में अंतनिर्हित हैं। यही ज्ञान दुनिया के ज्ञान का आरंभिक स्रोत है। भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक दर्शन से नहीं है, बल्कि उन मंदिरों से भी है जो करोड़ों लोगों की आस्था, विश्वास और जीवन का आधार हैं। अयोध्या का श्रीराम मंदिर, बद्रीनाथ धाम, माता वैष्णोदेवी, तिरुपति, काशी विश्वनाथ, सोमनाथ, सालासर बालाजी, खाटू श्यामजी जैसे मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा के जीवंत प्रतीक हैं। इन मंदिरों में प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु इस विश्वास के साथ पहुंचते हैं कि यहां उन्हें केवल भगवान के दर्शन ही नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और नैतिक ऊर्जा भी प्राप्त होगी। लेकिन जब इन्हीं मंदिरों से चढ़ावे की चोरी, वित्तीय अनियमितताओं, वीआईपी संस्कृति, पुजारियों अथवा कर्मचारियों के अनुचित आचरण और श्रद्धालुओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरें सामने आती हैं, तब केवल कोई संस्था बदनाम नहीं होती, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था घायल होती है। हाल के वर्षों में श्रीराम मंदिर, बद्रीनाथ और अब माता वैष्णोदेवी मंदिर में चढ़ावे से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मंदिरों की व्यवस्था को केवल धार्मिक भावना के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। जिस धन को श्रद्धालु भगवान का अर्पण मानकर समर्पित करते हैं, वह किसी व्यक्ति या समूह की निजी संपत्ति नहीं है। उस धन का प्रत्येक रुपया सार्वजनिक विश्वास की धरोहर है। यदि उसी में अपारदर्शिता या चोरी का संदेह पैदा हो जाए तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि धार्मिक विश्वास के साथ विश्वासघात है। मंदिरों में बढ़ती अव्यवस्था का दूसरा गंभीर पक्ष है-वीआईपी दर्शन संस्कृति। आज देश का सामान्य श्रद्धालु कई-कई घंटे कतार में खड़ा रहता है। वृद्ध, महिलाएं, दिव्यांग और छोटे बच्चों के साथ आए परिवार कठिन परिस्थितियों में अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं। लेकिन जैसे ही कोई मंत्री, विधायक, अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पहुंचता है, सामान्य दर्शन रोक दिए जाते हैं और वीआईपी दर्शन शुरू हो जाते हैं। आम श्रद्धालु की लाइन रोक दी जाती है, उसके दर्शन का समय बाधित होता है और उसे यह एहसास कराया जाता है कि भगवान के दरबार में भी सभी बराबर नहीं हैं। यह स्थिति भारतीय संस्कृति और धर्म की मूल भावना के विपरीत है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि ईश्वर के समक्ष राजा और रंक में कोई भेद नहीं होता। यदि मंदिरों में भी सामाजिक और राजनीतिक विशेषाधिकार का प्रदर्शन होगा तो यह धर्म के मूल स्वरूप का अपमान है। मंदिरों को लोकतांत्रिक समानता और आध्यात्मिक समरसता का सर्वोच्च उदाहरण बनना चाहिए, न कि सामाजिक असमानता का मंच। आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरे देश में ‘समान मन्दिर दर्शन नीति’ लागू की जाए। राष्ट्रीय सुरक्षा या अत्यंत विशिष्ट संवैधानिक परिस्थितियों को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को सामान्य श्रद्धालुओं की कतार से अलग विशेष दर्शन का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। यदि किसी कारणवश सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक हो, तब भी आम श्रद्धालुओं के दर्शन बाधित नहीं होने चाहिए। भगवान के दरबार में सबसे बड़ा वीआईपी केवल श्रद्धा होनी चाहिए, पद और सत्ता नहीं। इसी प्रकार मंदिरों की चढ़ावा व्यवस्था में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। आज डिजिटल भारत का युग है, फिर भी अनेक मंदिरों में दान और चढ़ावे की पारदर्शी व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है। प्रत्येक बड़े मंदिर में दान-पात्रों की इलेक्ट्रॉनिक निगरानी, सीसीटीवी कैमरे, बारकोड आधारित सीलिंग, नियमित स्वतंत्र ऑडिट तथा प्रत्येक माह आय-व्यय का सार्वजनिक विवरण वेबसाइट और सूचना पट्ट पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए। श्रद्धालु को यह जानने का अधिकार है कि उसके द्वारा दिया गया धन कहां और किस उद्देश्य में उपयोग किया जा रहा है।इसके साथ ही मंदिर प्रशासन में केवल धार्मिक पहचान ही नहीं, बल्कि चरित्र, ईमानदारी और प्रशासनिक दक्षता को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मंदिर प्रबंधन समितियों में ऐसे व्यक्तियों को स्थान मिले जिनकी सामाजिक प्रतिष्ठा निष्कलंक हो, जिनका सार्वजनिक जीवन पारदर्शी रहा हो और जिन पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार या आपराधिक आरोप न हों। समय-समय पर उनके कार्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन भी किया जाए। मंदिर प्रबंधन किसी का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि समाज के प्रति उत्तरदायित्व है। मंदिरों में सेवा करने वाले पुजारियों, कर्मचारियों और सुरक्षा कर्मियों के लिए भी आचार-संहिता बनाई जानी चाहिए। श्रद्धालुओं के साथ दुर्व्यवहार, अभद्र भाषा, दलालों से मिलीभगत, नशाखोरी या किसी भी प्रकार का अनुशासनहीन व्यवहार पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई हो। सालासर बालाजी में बाउंसरों द्वारा श्रद्धालु की पिटाई और खाटू श्यामजी में मुख्य पुजारी से जुड़े विवाद जैसे प्रसंग यह संकेत देते हैं कि केवल धार्मिक पहचान पर्याप्त नहीं, बल्कि नैतिक अनुशासन भी उतना ही आवश्यक है।मंदिरों में दलाल संस्कृति भी समाप्त की जानी चाहिए। दर्शन, प्रसाद, पूजा और विशेष अनुष्ठानों के नाम पर होने वाली अनधिकृत वसूली श्रद्धालुओं के विश्वास को कमजोर करती है। सभी सेवाओं की दरें सार्वजनिक हों, ऑनलाइन बुकिंग उपलब्ध हो और किसी भी अतिरिक्त वसूली पर कठोर दंड का प्रावधान हो। भारत आज विश्व का आध्यात्मिक केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद दुनिया भर से करोड़ों लोग भारतीय मंदिरों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। धार्मिक पर्यटन भारत की अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण आधार बन रहा है। ऐसे समय यदि मंदिरों की व्यवस्थाओं पर भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अव्यवस्था के आरोप लगते हैं तो केवल मंदिर ही नहीं, बल्कि पूरे भारत की छवि प्रभावित होती है। विश्व यह संदेश ग्रहण करता है कि जिस देश ने धर्म और नैतिकता का संदेश दिया, वह अपने ही धर्मस्थलों को पारदर्शी नहीं बना पाया, वहां भी व्यापक भ्रष्टाचार पसरा है।भारत सरकार और राज्य सरकारों को अब इस विषय पर व्यापक राष्ट्रीय नीति बनानी चाहिए। ‘राष्ट्रीय मंदिर सुशासन आयोग’ जैसी स्वतंत्र संस्था का गठन किया जा सकता है, जो बड़े मंदिरों की वित्तीय पारदर्शिता, प्रशासनिक जवाबदेही, दर्शन व्यवस्था और श्रद्धालुओं के अधिकारों की निगरानी करे। प्रत्येक मंदिर के लिए सेवा-मानक निर्धारित हों तथा शिकायत निवारण की समयबद्ध व्यवस्था हो। धार्मिक संगठनों और संत समाज को भी आत्ममंथन करना होगा। धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सत्य, ईमानदारी, सेवा और उत्तरदायित्व है। यदि मंदिरों के भीतर ही इन मूल्यों का ह्रास होगा तो समाज को नैतिक दिशा कौन देगा? मंदिर केवल पूजा के केंद्र नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण के विद्यालय भी होने चाहिए।आज आवश्यकता किसी छोटे-मोटे सुधार की नहीं, बल्कि मंदिर प्रशासन में एक नैतिक क्रांति की है। यह क्रांति पारदर्शिता, जवाबदेही, समानता और सेवा के चार स्तंभों पर आधारित होनी चाहिए। मंदिरों को तकनीक से जोड़ना होगा, वित्तीय व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल और ऑडिट-आधारित बनाना होगा, वीआईपी संस्कृति को समाप्त करना होगा तथा हर श्रद्धालु को समान सम्मान देना होगा। याद रखना होगा कि मंदिरों की सबसे बड़ी संपत्ति उनका स्वर्ण, रजत या चढ़ावा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का विश्वास है। यदि विश्वास टूट गया तो सबसे भव्य मंदिर भी अपनी आत्मा खो देगा। इसलिए समय की पुकार है कि मंदिरों को भ्रष्टाचार से मुक्त, दर्शन व्यवस्था को समान, प्रशासन को पारदर्शी और सेवा को मानवीय बनाया जाए। यही भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी, यही भारतीय संस्कृति का वास्तविक सम्मान होगा और यही वह परिवर्तन होगा जो भारत को केवल आध्यात्मिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक महाशक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा। आज आवश्यकता किसी छोटे-मोटे सुधार की नहीं, बल्कि मंदिर प्रशासन में एक नैतिक क्रांति की है। यह क्रांति पारदर्शिता, जवाबदेही, समानता और सेवा के चार स्तंभों पर आधारित होनी चाहिए। मंदिरों को तकनीक से जोड़ना होगा, वित्तीय व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल और ऑडिट-आधारित बनाना होगा, वीआईपी संस्कृति को समाप्त करना होगा तथा हर श्रद्धालु को समान सम्मान देना होगा। याद रखना होगा कि मंदिरों की सबसे बड़ी संपत्ति उनका स्वर्ण, रजत या चढ़ावा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों का विश्वास है। यदि विश्वास टूट गया तो सबसे भव्य मंदिर भी अपनी आत्मा खो देगा। इसलिए समय की पुकार है कि मंदिरों को भ्रष्टाचार से मुक्त, दर्शन व्यवस्था को समान, प्रशासन को पारदर्शी और सेवा को मानवीय बनाया जाए। यही भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी, यही भारतीय संस्कृति का वास्तविक सम्मान होगा और यही वह परिवर्तन होगा जो भारत को केवल आध्यात्मिक महाशक्ति ही नहीं, बल्कि नैतिक महाशक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा।।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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