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उत्तराखंड में’आफत’ टेढ़ी चाल बनी साल दर साल बदल रहा मानसून पैटर्न, बारिश और बर्फबारी

18/02/25
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
उत्तराखंड में फरवरी से ठंड की विदाई शुरू हो गई है, जबकि पिछले कुछ सालों के दौरान जनवरी-फरवरी महीने में अच्छी बारिश और बर्फबारी देखी जाती रही है. वैश्विक समस्या जलवायु परिवर्तन का मौसम चक्र पर भी बड़ा असर देखने को मिल रहा है. लंबे समय से बारिश और बर्फबारी ना होना आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. हालांकि, फरवरी में कुछ जगहों पर हल्की बारिश और बर्फबारी देखी गई है, लेकिन, इस सीजन प्रदेश के उच्च हिमालय क्षेत्रों में बहुत कम बर्फबारी हुई है. जिसका सीधा असर ग्लेशियर पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है. दरअसल, पिछले कुछ सालों से मौसम चक्र में बड़ा परिवर्तन देखा जा रहा है. हालांकि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन एक बड़ी वजह बताई जा रही है, लेकिन लगातार मौसम चक्र में हो रहे बदलाव की वजह से बारिश और बर्फबारी में काफी गिरावट आई है. पिछले कुछ सालों में हुई बारिश बर्फबारी पर गौर करें, तो शीतकाल के दौरान लगातार मौसम चक्र में परिवर्तन हो रहा है. शीतकाल के दौरान दिसंबर से फरवरी महीने के बीच अत्यधिक बारिश और बर्फबारी का सिलसिला देखा जाता रहा है, लेकिन समय के साथ बारिश-बर्फबारी का पैटर्न बदल गया है. साथ ही जिस मात्रा में बारिश और बर्फबारी होनी चाहिए, लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है. मौसम विज्ञान केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार, मौसम चक्र में साल दर साल बड़ा परिवर्तन देखा जा रहा है. जिसके तहत कुछ सालों के भीतर अक्टूबर और कभी जनवरी महीने में अत्यधिक बारिश और बर्फबारी का सिलसिला देखा गया है. साल 2020 के अक्टूबर महीने में 99 फीसदी कम बारिश और बर्फबारी हुई थी, जबकि 2021 के अक्टूबर महीने में 476 फीसदी अधिक एक्टिविटी हुई थी. इसी तरह साल 2022 के अक्टूबर महीने में 279 फीसदी अधिक बारिश और बारिश हुई थी, जबकि साल 2023 के अक्टूबर महीने में 35 फीसदी कम और 2024 के अक्टूबर महीने में 91 फीसदी कम एक्टिविटी हुई थी. यानी अक्टूबर महीने में होने वाली बारिश और बर्फबारी की एक्टिविटी में बड़ा बदलाव देखा गया है. वहीं, अगर नवंबर महीने की बात करें तो, 2020 के नवंबर महीने में 34 फीसदी अधिक बारिश और बर्फबारी हुई थी. लेकिन इसके बाद के सालों में हर साल नवंबर महीने में बारिश और बर्फबारी की एक्टिविटी में कमी देखी गई है. जिसके तहत, साल 2021 में 86 फीसदी, साल 2022 में 69 फीसदी, साल 2023 में 66 फीसदी और साल 2024 के नवंबर महीने में 90 फीसदी कम बारिश और बर्फबारी हुई है. दिसंबर महीने की बात करें तो, 2024 के दिसंबर महीने में 89 फीसदी अधिक बारिश और बर्फबारी हुई थी, लेकिन इसके पहले के सालों में हर साल दिसंबर महीने में बारिश और बर्फबारी की एक्टिविटी में कमी देखी गई थी. जिसके तहत, साल 2020 में 55 फीसदी, साल 2021 में 14 फीसदी, साल 2022 में 99 फीसदी और साल 2023 के नवंबर महीने में 75 फीसदी कम बारिश और बर्फबारी हुई है. जनवरी महीने की बात करें तो, साल 2020 और 2022 के जनवरी महीने में अधिक बर्फबारी और बारिश हुई थी, लेकिन इसके बाद के सालों में एक्टिविटी में काफी कमी देखी गई है. जिसके तहत, साल 2020 के जनवरी महीने में 217 फीसदी अधिक बारिश और बर्फबारी हुई थी. साल 2021 के जनवरी महीने में 34 फीसदी कम बारिश और बर्फबारी हुई थी. साल 2022 के जनवरी महीने में 161 फीसदी अधिक बारिश और बर्फबारी हुई थी. इसके अलावा, साल 2023 में 27 फीसदी, साल 2024 में 99 फीसदी और साल 2025 में 88 फीसदी कम बारिश और बर्फबारी हुई है. उत्तराखंड में जो बारिश और बर्फबारी होती है, वो पश्चिमी विक्षोभ की वजह से होती है, लेकिन इस साल पश्चिमी विक्षोभ काफी कम सक्रिय रहा है. यानी पश्चिमी विक्षोभ काफी कमजोर रहा है. जिसके चलते बारिश और बराबरी की एक्टिविटी में काफी कमी देखी गई है. हालांकि ग्लोबल वार्मिंग भी एक गंभीर समस्या बनी हुई है, लेकिन कम डाटा की वजह से इसके इंपैक्ट पर ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के ग्लेशियोलॉजिस्ट ने बताया कि शीतकाल के दौरान बारिश और बर्फबारी होती है. कभी दिसंबर-जनवरी में तो कभी फरवरी और मार्च में बर्फबारी होती है. हालांकि, पिछले साल फरवरी-मार्च में भी अधिक बर्फबारी हुई थी. ऐसे में बर्फबारी का एक पैटर्न है, जो विंटर में देखने को मिलता है. लेकिन ग्लेशियर के लिए बर्फबारी की क्वांटिटी काफी महत्वपूर्ण होती है. उन्होंने बताया कि प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में पहले चार से पांच फीट तक की बर्फ पड़ती थी, लेकिन अब कुछ इंच ही बर्फबारी होती है. यानी पिछले कुछ सालों में बर्फबारी की क्वांटिटी में काफी कमी आई है. ग्लोबल वार्मिंग के खतरों को भांपते हुए हिमालय के इको सिस्टम को समझने की कोशिश की जा रही है. धरती का गर्म होना, हिमालय के लिए किन परिस्थितियों को पैदा करेगा, इस पर भी विचार किया जा रहा है. भारत में इसके लिए कई राष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं अपने-अपने क्षेत्र के लिहाज से अध्ययन में जुटी हुई हैं तापमान बढ़ने पर वन्यजीव और वनस्पतियों पर पड़ने वाले असर का आकलन कर रहा है. उधर, बाकी कुछ संस्थान हिमालय में ग्लेशियर और बुग्यालों के साथ ही पानी की स्थिति को भी भांपने में जुटे हैं. वैज्ञानिक ये स्पष्ट कर चुके हैं कि धरती गर्म होने के साथ ही हिमालय पर इसका एक अलग असर देखने को मिलेगा. इसमें जैसे-जैसे तापमान बढ़ेंगे, वैसे-वैसे हिमालय पर ट्री लाइन, बुग्याल और ग्लेशियर्स भी ऊपर की ओर खिसकेंगे. यानी हिमालय का स्वरूप बढ़ेगा और खुद को सर्वाइव करवाने के लिए अपने अनुकूल वाले तापमान को पाने के लिए हिमालय में हर वनस्पति और वन्यजीव पर ऊपर की ओर जाएंगे. ऐसे प्रदेश के जंगलों में कई जगह काफल पकने को तैयार है। मौसम विशेषज्ञ मौसम चक्र में परिवर्तन को ही इसकी वजह मानते हैं। पेड़-पौधों का समय से पहले खिलना और फल देना जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का स्पष्ट संकेत है। पहाड़ी क्षेत्रों में बुरांश का एक-दो महीने पहले खिलना, काफल, आड़ू, नाशपाती आदि फलों का जल्दी पकना इसी का परिणाम है। उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों ने बागवानी और फल उत्पादन पर गहरा असर डाला है। बढ़ते तापमान, अनियमित बारिश और चरम मौसम की घटनाओं ने विशेष रूप से आम, लीची, और अमरूद जैसे फलों की पैदावार को प्रभावित किया है। बारिश और बर्फबारी की कमी के कारण इन प्रजातियों को अनुकूल तापमान मिल रहा है, जो चिंता का विषय है।लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं।लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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