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उत्तराखंड की सरकारी शिक्षा व्यवस्था पर सवाल

14/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
सरकारी स्कूलों में पठन-पाठन को लेकर केंद्र और राज्य की सरकारें प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये व्यय कर रही हैं, लेकिन सरकारी शिक्षा की व्यवस्था साल दर साल बद से बदतर होती जा रही हैराज्य आज भी प्रचेष्ठा-एक श्रेणी में है। केंद्र सरकार की परफारमेंस इंडेक्स ग्रेडिंग फार डिस्ट्रिक (पीजीआइ-डी) सर्वेक्षण रिपोर्ट में उत्तराखंड का हरिद्वार जनपद सबसे फिसड्डी रहा हैछह अलग-अलग मानकों में किए गए जनपद स्तर के राष्ट्रीय सर्वे में हरिद्वार ने 600 में से केवल 310 अंक प्राप्त किए। ऊधम सिंह नगर 12वें, रुद्रप्रयाग व उत्तरकाशी 11वें, स्थान पर रहा352 अंक अर्जित कर चमोली पहले, 344 अंक लेकर पिथौरागढ़ दूसरे और 343 अंकों के साथ बागेश्वर तीसरे स्थान पर है।केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय परफारमेंस ग्रेडिंग के अंतर्गत जनपद स्तर पर स्कूलों की समुचित प्रगति जानने के लिए छह मानक दिए हैं। इनमें प्रदर्शन के आधार पर जनपदों को अंक दिए गए हैं।सरकारी स्कूलों से घटती छात्र संख्या पर चिंता जताई गई है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में उच्च प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर पहुंचते-पहुंचते 10 में से चार बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं।प्रदेश के सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था भरोसे के संकट से गुजर रही है, यही वजह है कि स्कूलों में छात्रों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि राज्य में 2959 स्कूल ऐसे हैं जो एकल शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। वहीं, 39 स्कूल ऐसे हैं, जिनमें 33 शिक्षक दर्शाए गए हैं पर छात्र एक भी नहीं हैनीति आयोग की इस रिपोर्ट में सरकारी स्कूलों से घटती छात्र संख्या पर चिंता जताई गई है। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में उच्च प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर पहुंचते-पहुंचते 10 में से चार बच्चे स्कूल छोड़ रहे हैं। इसकी एक वजह यह बताई गई है कि प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तरों के विपरीत माध्यमिक स्तर आरटीई के तहत नहीं आता। जो केवल 14 वर्ष की आयु तक मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है।परिणामस्वरूप कक्षा आठवीं के बाद पढ़ाई जारी रखने का वित्तीय बोझ, ट्यूशन, यूनिफॉर्म, किताबें और परिवहन आदि का खर्च परिवारों पर पड़ता है। जिससे अक्सर विशेष रूप से कम आय वाले परिवारों के बच्चों को स्कूल छोड़ना पड़ता है।नीति आयोग ने वर्तमान ढांचे को पूरी तरह से बदलने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों की वर्तमान व्यवस्था पिरामिड जैसी है। जिसमें निचले स्तर पर कई प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं, लेकिन माध्यमिक स्तर के स्कूलों की संख्या कम है। आयोग ने इसे सिलिंडर मॉडल में बदलने की सिफारिश की है। जहां जितने बच्चे प्राथमिक में आएं, उतने ही 12 वीं पास करके निकलें।नीति आयोग ने रिपोर्ट में एकीकृत स्कूल परिसर बनाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कक्षा एक से 12 वीं तक की पढ़ाई एक ही छत के नीचे हो। जिससे छात्रों को स्कूल बदलने की दिक्कत नहीं होगी, इससे ड्रॉपआउट को कम किया जा सकेगा।नीति आयोग ने रिपोर्ट में एकीकृत स्कूल परिसर बनाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कक्षा एक से 12 वीं तक की पढ़ाई एक ही छत के नीचे हो। जिससे छात्रों को स्कूल बदलने की दिक्कत नहीं होगी, इससे ड्रॉपआउट को कम किया जा सकेगा।रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकारी स्कूलों में वर्ष 2005-06 में जहां 71.13 बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे थे, वहीं, 2024-25 तक यह आंकड़ा घटकर 49.24 रह गया है। पहली बार देश के आधे से अधिक बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। जो सरकारी शिक्षा के प्रति घटते भरोसे को दर्शाता है।नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) आने के बाद भले ही स्कूली शिक्षा में सुधार के बड़े कदम उठाए गए हैं, लेकिन स्थिति यह है कि देश में अभी भी एक लाख से अधिक स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। जो स्कूलों में पहली से लेकर पांचवीं तक के बच्चों को सभी विषय पढ़ा रहे हैंवहीं, देश में अभी भी पांच हजार से अधिक स्कूल ऐसे हैं जिनमें एक भी बच्चे का नामांकन नहीं है। यह स्थिति तब है, जब रिपोर्ट में स्कूलों में शिक्षकों की संख्या के बढ़ने का दावा किया गया हैपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में देश के स्कूलों में शिक्षकों की संख्या जहां 1.01 करोड़ थी, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 1.02 करोड़ हो गई है।देश में स्कूली शिक्षा की स्थिति को लेकर यह बात यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फार एजुकेशन प्लस ( यूडीआइएसई प्लस) की 2025-26 की रिपोर्ट के जरिये सामने आई है।रिपोर्ट में शिक्षकों की संख्या में हुई बढ़ोतरी को सबसे बड़ी उपलबब्धि के तौर पर पेश किया गया है। इसमें बताया गया है कि 2024-25 में देश में शिक्षकों की कुल संख्या 1,01,22,420 थी, वहीं 2025-26 में यह बढ़कर 1,02,73,020 हो गई है।स्कूलों में पिछले साल के मुकाबले जो बड़ा बदलाव इस बार देखने को मिला है, उनमें स्कूलों में बच्चों की ड्रापआउट दर का घटना है।रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों में पारंभिक और माध्यमिक स्तर पर पिछले साल की तुलना में ड्रॉपआउट दर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। स्कूलों में प्रारंभिक स्तर पर 2024-25 में ड्रॉपआउट दर जहां 2.3 प्रतिशत थी, वहीं 2025-26 में यह 1.8 रह गई है।माध्यमिक स्तर पर भी 2024-25 में ड्राप आउट दर 8.2 थी, जबकि 2025-26 में यह 7.0 प्रतिशत ही रह गई है। हालांकि मिडिल स्तर पर ड्राप आउट 2024-25 की तुलना में बढ़ा है। जो 3.5 से बढ़कर 3.6 प्रतिशत हो गया है।स्कूलों में पिछले साल के मुकाबले जो बड़ा बदलाव इस बार देखने को मिला है, उनमें स्कूलों में बच्चों की ड्रापआउट दर का घटना है।रिपोर्ट के अनुसार, स्कूलों में पारंभिक और माध्यमिक स्तर पर पिछले साल की तुलना में ड्रॉपआउट दर में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। स्कूलों में प्रारंभिक स्तर पर 2024-25 में ड्रॉपआउट दर जहां 2.3 प्रतिशत थी, वहीं 2025-26 में यह 1.8 रह गई हैमाध्यमिक स्तर पर भी 2024-25 में ड्राप आउट दर 8.2 थी, जबकि 2025-26 में यह 7.0 प्रतिशत ही रह गई है। हालांकि मिडिल स्तर पर ड्राप आउट 2024-25 की तुलना में बढ़ा है। जो 3.5 से बढ़कर 3.6 प्रतिशत हो गया है  यदि बड़ी संख्या में छात्र पहुंचते हैं, तो कांग्रेस इसे युवाओं के भरोसे का प्रमाण बताएगी, लेकिन यदि उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रहती है, तो पंजीकरण के आंकड़ों पर सवाल उठना तय माना जा रहा है. ।’लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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