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हरेला से मानी जाती है सावन की शुरुआत, प्रकृति के संरक्षण से जुड़ा है यह लोकपर्व

14/07/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला

उत्तराखंड अपनी समृद्ध लोक परंपराओं, कृषि संस्कृति और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए जाना जाता है। राज्य के पारंपरिक पर्व केवल धार्मिक आस्था के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक एकता और प्रकृति के प्रति सम्मान तथा कृतज्ञता का संदेश भी देते हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र का प्रमुख लोक पर्व ‘हरेला’ हरियाली, खुशहाली और नए कृषि सत्र की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। यह राज्य के सबसे महत्वपूर्ण पारंपरिक त्योहारों में से एक है। इस वर्ष हरेला पर्व 16 जुलाई को मनाया जाएगा। सावन महीने की शुरुआत में मनाया जाने वाला हरेला पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। कुमाऊं क्षेत्र में लोग इस त्योहार को पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाते हैं। धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, जंगलों की रक्षा, जैव विविधता को बचाने और प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखने का संदेश भी देता है। हरेला वृक्षों, जंगलों और पर्यावरण के प्रति स्नेह और जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देता है। उनके अनुसार, यह त्योहार लोगों को प्रकृति के साथ संतुलन में रहने का महत्व सिखाता है और समुदायों तथा उनके प्राकृतिक परिवेश के बीच संबंधों को मजबूत करता है। हरेला पर्व की तैयारियां सावन शुरू होने से करीब नौ-दस दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। इस दौरान परिवार रिंगल (स्थानीय बांस) से बनी टोकरियों या मिट्टी के बर्तनों में हरेला के बीज बोते हैं। बीज बोने से पहले टोकरियों में तिमिल और मालू के पत्तों की परत बिछाई जाती है, फिर उसमें मिट्टी भरकर बीज डाले जाते हैं। इसके बाद टोकरी में पांच या सात तरह के अनाज के बीज बोए जाते हैं। इनमें आमतौर पर जौ, गेहूं, धान, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट (काला सोयाबीन) शामिल होते हैं। कुछ ही दिनों में इन बीजों से हरे-भरे अंकुर निकल आते हैं। ये अंकुर अच्छी फसल, खुशहाली और उत्तराखंड की समृद्ध प्राकृतिक और जैव विविधता के प्रतीक माने जाते हैं। सावन के पहले दिन, जब कोंपलें पूरी तरह से उग जाती हैं, तो हरेला की कटाई की जाती है। इसे सबसे पहले कुल देवता को कृतज्ञता और भक्ति के प्रतीक के रूप में अर्पित किया जाता है। इसके बाद, घर के बड़े-बुजुर्ग सभी परिवार के सदस्यों के लिए पारंपरिक हरेला अनुष्ठान करते हैं। कुमाऊं क्षेत्र में हरेला पर्व का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इस अवसर पर परिवार के बुजुर्ग हरेला के हरे अंकुरों को पैरों से लेकर सिर और कानों तक हल्के से स्पर्श कराते हैं। इसके बाद वे इन अंकुरों को आशीर्वाद और शुभकामना के प्रतीक के रूप में कानों के पीछे लगा देते हैं। इस अनुष्ठान के दौरान परिवार के बुजुर्ग पारंपरिक कुमाऊनी आशीर्वाद भी देते हैं। वे कामना करते हैं कि व्यक्ति लंबी उम्र पाए, हमेशा स्वस्थ और खुश रहे। उसकी जड़ें दुबक घास की तरह मजबूत हों, उसका जीवन पौल के पौधे की तरह फलता-फूलता रहे और उसमें सियार जैसी ताकत हो। साथ ही, वे आशीर्वाद देते हैं कि जब तक हिमालय पर बर्फ और गंगा में जल रहेगा, तब तक उसके जीवन में हरेला पर्व की खुशियां बनी रहें। यह आशीर्वाद लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, खुशहाली, ज्ञान और समृद्धि की कामना का प्रतीक है। साथ ही, यह इस विश्वास को भी दर्शाता है कि जैसे हिमालय पर हमेशा बर्फ रहती है और गंगा निरंतर बहती है, वैसे ही हरेला पर्व की खुशियां भी पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के जीवन में बनी रहें। हरेला पर्व का सीधा संबंध खेती और मिट्टी की उर्वरता से है। पारंपरिक मान्यता है कि हरेला के अंकुर जितने हरे-भरे और स्वस्थ होते हैं, आने वाले साल में फसल उतनी ही अच्छी होने की उम्मीद रहती है। पहाड़ी इलाकों के किसानों के लिए यह पर्व अच्छी पैदावार और जमीन की सेहत का शुभ संकेत माना जाता है। खेती से गहरे जुड़ाव के कारण हरेला केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है। यह सदियों पुरानी कृषि परंपराओं का प्रतीक है और हमें याद दिलाता है कि मानव जीवन स्वस्थ पर्यावरण, उपजाऊ मिट्टी और प्रकृति पर निर्भर है। हरेला पर्व की सबसे खास परंपराओं में से एक छायादार और फलदार पेड़ लगाना है। पीढ़ियों से लोग इस अवसर पर पौधारोपण करते आ रहे हैं। यह परंपरा पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता को बढ़ावा देने और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश देती है। आज के समय में जब जलवायु परिवर्तन, वनों की कटाई और जल संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियां सामने हैं, तब हरेला पर्व का संदेश पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यह पर्व लोगों को याद दिलाता है कि जंगल, नदियां, मिट्टी और मानव जीवन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा करना हम सभी की जिम्मेदारी है। कुमाऊं की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा हरेला लोगों को अपनी परंपराओं, खेती और प्रकृति से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश देने वाला लोक पर्व है, जो हरित, स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य के सामूहिक संकल्प का भी प्रतीक है हरेला इस साल आज, यानी 16 जुलाई को मनाया जा रहा है, जो मॉनसून के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। यह राज्य की कृषि के लिए एक महत्वपूर्ण समय है। “हरेला” शब्द उत्तराखंड के कुमाऊंनी शब्द “हरियाला” से आया है, जिसका अर्थ है “हरियाली का दिन।” ऐसा माना जाता है कि इसकी उत्पत्ति कुमाऊं क्षेत्र में हुई थी।हरेला उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में मनाया जाने वाला एक त्यौहार है। यह मुख्य रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में लोकप्रिय है और इसे बहुत उत्साह और जोश के साथ मनाया जाता है।हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, शिमला, सिरमौर और जुब्बल तथा किन्नौर क्षेत्रों में हरियाली या रिहाली के नाम से इस त्यौहार को मनाया जाता है। लोग अच्छी फसल और समृद्धि की प्रार्थना करके इसे मनाते हैं।हरेला श्रावण-मास के पहले दिन पड़ता है, जो मॉनसून के मौसम और नई फसलों के रोपाई का प्रतीक है।शांति, समृद्धि और हरियाली का त्योहार, हरेला का त्यौहार परंपराओं से भरा हुआ है और इसका सांस्कृतिक और पर्यावरणीय महत्व बहुत अधिक है। यह भगवान शिव और पार्वती के विवाह के औपचारिक पालन के साथ-साथ ईश्वर से भरपूर फसल और समृद्धि की कामना करने वाले लोगों की आस्था और प्रार्थना का प्रतीक है।इस दिन पांच से सात प्रकार की फसलों – मक्का, तिल, उड़द, सरसों, जई के बीज त्यौहार से नौ दिन पहले पत्तों से बने कटोरे, रिंगाल या पहाड़ी बांस की टोकरियों में बो दिए जाते हैं।नौवें दिन इन्हें काटा जाता है और पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है। फसलों का फलना-फूलना आने वाले साल में समृद्धि का प्रतीक है। खीर, पुवा, पूरी, रायता, छोले और अन्य व्यंजन उत्सव के रूप में तैयार किए जाते हैं।त्यौहार के दिन स्थानीय लोग कुमाऊंनी भाषा में निम्नलिखित पंक्तियां गाते हैं:
“लाग हरयाव, लाग दशे, लाग बगवाव।
जी रये जागी रया, यो दिन यो बार भेंटने रया।
दुब जस फैल जाए, बेरी जस फली जाया।
हिमाल में ह्युं छन तक, गंगा ज्यूं में पाणी छन तक,
यो दिन और यो मास भेंटने रया।
अगाश जस उच्च है जे, धरती जस चकोव है जे।
स्याव जसि बुद्धि है जो,स्यू जस तराण है जो।
जी राये जागी रया। यो दिन यो बार भेंटने रया।”
अपनी सांस्कृतिक जड़ों से परे, हरेला पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देता है। इस त्यौहार के साथ-साथ व्यापक वृक्षारोपण अभियान भी चलाया जाता है, जिससे हरियाली बढ़ती है और प्रकृति के आशीर्वाद का जश्न मनाया जाता है, जो पहाड़ी कृषि के लिए महत्वपूर्ण है।इस त्यौहार का समय चातुर्मास के समय से मेल खाता है, जो पहाड़ी फसलों के लिए फायदेमंद बारिश का समय है। यह स्थानीय मान्यता के अनुरूप है कि हरेला के दौरान पोषित पौधे प्रचुर मात्रा में खिलते हैं, जिससे फसल अच्छी होती है।हरेला सामुदायिक आनंद का समय है, जिसमें लोकगीत गाए जाते हैं और घर पर पूजा के लिए भगवान शिव के परिवार की मिट्टी की मूर्तियां बनाई जाती हैं। यह सांस्कृतिक सामंजस्य स्थानीय परंपराओं में इसके गहरे महत्व को उजागर करता है।हरेला त्यौहार न केवल सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाता है बल्कि उत्तराखंड में टिकाऊ कृषि पद्धतियों और सामुदायिक एकता को भी दर्शाता है। जैसे-जैसे यह त्यौहार आगे बढ़ता है, यह प्रकृति के प्रति क्षेत्र की श्रद्धा और उसके आशीर्वाद की पुष्टि करता है। कुल मिलाकर देखा जाय तो हरेला पर्व में लोक कल्याण की एक अवधारणा निहित है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूँजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। ऐसे में निश्चित तौर पर लोक के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व हमें प्रकृति के करीब आने का सार्थक सन्देश देता है।समाज और प्रकृति में हरेले की महत्ता को देखते हुए उत्तराखण्ड सरकार भी पिछले साल से सरकारी स्तर पर हरेला मनाने की कवायद कर रही है जिसके तहत राज्य में पर्यावरण और सांस्कृतिक गतिविधियों के जरिए जन चेतना और जागरुकता पैदा करने के प्रयास हो रहे हैं। हरेला को लेकर धार्मिक मान्‍यता है कि अनाज की नरम मुलायम पंखुड़ियां परिवारजनों के बीच रिश्तों में प्रगाढ़ता और मधुरता बनाये रखता है। हरेला को लेकर यह भी मान्यता है कि बोया गया हरेला जितना अधिक बढ़ेगा फसल में भी वैसी ही वृद्धि होगी। हरेला पूजन के बाद लोग अपने घरों और आस-पास खाली पड़ी जगहों पर पौधारोपण भी करते हैं। यह लोक पर्व पर्यावरण संरक्षण को भी प्रोत्साहन देता है।,.लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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