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अदरक में बढ़ी काश्तकारों की रूचि

19/04/26
in उत्तराखंड, देहरादून
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला

भारत में अदरक उत्पादन में अग्रणी स्थान के कई प्रमुख कारण हैं। भारत के कई राज्यों की उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु अदरक की खेती के लिए आदर्श परिस्थितियाँ प्रदान करती है। नियमित वर्षा, गर्म तापमान और उपजाऊ मिट्टी उच्च पैदावार में सहायक होती हैं। अदरक भारतीय कृषि, खानपान और पारंपरिक चिकित्सा में गहराई से समाहित है, जो ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक और निरंतर खेती को प्रोत्साहित करता है। भारत के कई हिस्सों में अदरक की खेती की जाती है, लेकिन कुछ क्षेत्र अपने विशाल उत्पादन क्षेत्रों और उच्च पैदावार के कारण विशेष महत्व रखते हैं। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, मेघालय, सिक्किम और कर्नाटक अदरक के प्रमुख उत्पादक राज्यों में शामिल हैं। इन क्षेत्रों में उपयुक्त ऊंचाई, वर्षा और मिट्टी की परिस्थितियाँ पाई जाती हैं जो प्रकंद के विकास और आवश्यक तेल की मात्रा को बढ़ाती हैं। हाल के अनुमानों के अनुसार, वैश्विक अदरक उत्पादन प्रतिवर्ष कई मिलियन मीट्रिक टन से अधिक है, जिसमें भारत का योगदान सबसे अधिक है। मौसम और कृषि पद्धतियों के कारण उत्पादन स्तर में साल-दर-साल उतार-चढ़ाव होता रहता है, लेकिन भारत लगातार चीन, नेपाल और इंडोनेशिया जैसे अन्य प्रमुख उत्पादकों से आगे पहले स्थान पर बना हुआ है। अदरक का उत्पादन करने वाले अन्य प्रमुख देशों में चीन, नेपाल, इंडोनेशिया और थाईलैंड शामिल हैं। ये देश भी बड़े पैमाने पर अदरक की खेती करते हैं और घरेलू बाजारों के साथ-साथ निर्यात चैनलों के माध्यम से भी इसकी आपूर्ति करते हैं। हालांकि, इनमें से कोई भी देश भारत के उत्पादन स्तर की बराबरी नहीं कर पाता। वैश्विक उत्पादन में अक्सर दूसरे स्थान पर रहने वाला चीन पर्याप्त मात्रा में अदरक का उत्पादन करता है, लेकिन फिर भी भारत से पीछे है। अदरक में जिंजरोल जैसे जैवसक्रिय यौगिक प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो इसे शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुण प्रदान करते हैं। पाचन संबंधी समस्याओं को शांत करने, मतली को कम करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इन्हीं स्वास्थ्य लाभों के कारण अदरक की चाय, अर्क और आहार पूरक वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो गए हैं। कहावत है कि ‘बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद’ भले बंदर को अदरक के स्वाद का पता न हो लेकिन, पहाड़ के काश्तकारों को अदरक का स्वाद खूब भा रहा है. जिन्होंने अब पारंपरिक खेती छोड़ अदरक की खेती शुरू कर दी है. वहीं, जंगली जानवर भी अदरक की खेती को नुकसान नहीं पहुंचाते, लिहाजा पहाड़ के काश्तकारों ने अदरक की खेती वरदान साबित हो रही है. पहाड़ के काश्तकार अदरक की खेती करके खूब मुनाफा कमा रहे हैं. पहाड़ के काश्तकार बंदर और जंगली जानवर के आतंक से परेशान हैं और खेती से मुंह मोड़ रहे हैं. ऐसे में पहाड़ के काश्तकारों के आगे रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा हो रहा है. तो पलायन भी मुख्य वजहों में से एक है. वहीं,अब पहाड़ के किसानों ने अपनी आजीविका चलाने के लिए पारंपरिक खेती छोड़कर अदरक की खेती को अपनाया है. काश्तकारों की मानें तो जंगली जानवर उनकी पारंपरिक खेती को काफी नुकसान किया करते थे. ऐसे में उन्होंने खेती करना छोड़ दिया था, लेकिन अब उन्होंने अदरक की खेती को अपनाया है, जिसे जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं. साथ ही अदरक की खेती से उन्हें अच्छा मुनाफा हो रहा है.किसानों का कहना है कि हल्द्वानी के गौलापार क्षेत्र में जंगली जानवरों का ज्यादा आतंक है. ऐसे में उनकी धान, गेहूं और मक्के जैसी पारंपरिक फसलों को जंगली जानवर लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं. ऐसे में उन्होंने अब पारंपरिक खेती छोड़ अदरक की खेती को अपनाया है, जो मुनाफे की खेती साबित हो रही है. पहाड़ के काश्तकार बंदर और जंगली जानवर के आतंक से परेशान है ऐसे में किसान अब खेती को धीरे-धीरे मुँह मोड़ रहे है। ऐसे में पहाड़ के काश्तकारों के आगे रोजी-रोटी का संकट भी खड़ा हो रहा है साथ ही पलायन भी मुख्य जरिया बन रहा है। ऐसे में अब पहाड़ के किसानों ने अपनी आजीविका चलाने के लिए पारंपरिक खेती छोड़ अदरक की खेती को अपनाया है। काश्तकारों की मानें तो जंगली जानवर उनके पारंपरिक खेती को काफी नुकसान किया करते थे ऐसे में उन्होंने खेती करना छोड़ दिया था लेकिन अब उन्होंने अदरक की खेती को अपनाया है जिसे जंगली जानवर भी नुकसान नहीं पहुंचा रहे हैं साथ ही अच्छा मुनाफा भी कमा रहे हैं। किसानों का कहना है कि यहां के अदरक की क्वालिटी अन्य अदरक की क्वॉलिटी के तुलना में बेहतर है । उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में अदरक की खेती तेजी से किसानों की पसंद बनती जा रही है. उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों में किसान अब पारंपरिक फसलों की जगह अदरक उत्पादन की ओर रुख कर रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कम लागत में अच्छा मुनाफा और कम जोखिम. पहाड़ों की जलवायु और मिट्टी अदरक के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है, जिससे इसकी गुणवत्ता भी बेहतर होती है, बाजार में अच्छी कीमत मिलती है. अदरक की खेती की खास बात यह है कि इसमें सिंचाई की ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि यह फसल मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर रहती है. हालांकि, खेत में पानी का रुकाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए. जलभराव होने से कंद सड़ सकते हैं और पूरी फसल खराब हो सकती है. इसलिए अच्छी जल निकासी की व्यवस्था बेहद जरूरी होती है. फसल की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर मिट्टी चढ़ाना (अर्थिंग अप) जरूरी होता है. इससे कंद का विकास बेहतर होता है, उत्पादन भी बढ़ता है. इसके अलावा बीज उपचार करना और फसल चक्र अपनाना भी जरूरी है, ताकि रोगों और कीटों का प्रकोप कम हो सके.अदरक की फसल आमतौर पर 5 से 6 महीने में तैयार हो जाती है. अक्टूबर से नवंबर के बीच इसकी खुदाई की जाती है. अच्छी देखभाल और सही तकनीक अपनाने पर किसान इस फसल से अच्छा लाभ कमा सकते हैं. पहाड़ों में जंगली जानवरों से भी इस फसल को कम नुकसान होता है, जो इसे और भी सुरक्षित बनाता है. अदरक की खेती पहाड़ी किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रही है, जो कम मेहनत में ज्यादा आमदनी का रास्ता खोल रही है.सरकार को चाहिए कि उत्तराखंड में पैदा होने वाले अदरक को लेकर कोई ठोस नीति बनाएं जिससे कि यहां के किसानों की आय में वृद्धि हो और यहां के अदरक की पहचान उत्तराखंड सहित देश-विदेश में हो सके।लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं.

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