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उत्तराखंड में डेमोग्राफिक बदलाव कैसे हो रहा!

24/05/25
in उत्तराखंड, देहरादून, नैनीताल
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डॉ. हरीश चन्द्र अन्डोला
देवभूमि उत्तराखंड में दिख रहे जनसांख्यिकीय बदलाव और इसके चलते हो रहा पलायन कुछ वर्षों से बुद्धिजीवियों के बीच विमर्श का विषय बना हुआ है. इसके साथ ही सरकार इस मामले में जल्द ही कुछ बड़ा निर्णय ले सकती है. यह किसी से छिपा नहीं है कि उत्तराखंड का पहाड़ी क्षेत्र पलायन की मार से जूझ रहा है. इस परिदृश्य के बीच बड़े पैमाने पर बाहर से आए व्यक्तियों, विशेषकर एक समुदाय विशेष के व्यक्तियों ने पिछले 10-11 वर्षों में यहां न सिर्फ ताबड़तोड़ जमीनें खरीदीं, बल्कि उनकी बसावट भी तेज हुई है.इस सबको देखते हुए पिछले वर्ष से उत्तराखंड में लैंड जिहाद शब्द लगातार चर्चा में है. इंटरनेट मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्म पर तो इसे लेकर बहस का क्रम जारी है तो अब आमजन के बीच भी यह चिंता का विषय बनकर उभरा है. क्योंकि हाल ही में विश्व प्रसिद्ध जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के प्रतिबंधित क्षेत्र में कथिर मजारें बनाए जाने की खबरें सामने आई हैं. ये वो क्षेत्र हैं जहां बिना अनुमति लोगों के जाने पर भी मनाही है. ऐसे में इन क्षेत्रों में कथित मजारें बनाने से जनसांख्यिकीय बदलाव की खबरों कुछ हद तक पुख्ता भी हो रही हैं.वहीं दूसरी ओर बीते एक साल में लगातार सरकार के कई विधायक भी इस बात पर चिंता जाहिर करते रहे हैं कि राज्य में अचानक से कुछ अनजान लोगों की संख्या बढ़ी है. पूर्व विधायक ने तो उत्तराखंड में रोहिंग्या की घुसपैठ की बात भी सरकार तक पहुंचाई थी.  जनसांख्यिकीय बदलाव कोई अचानक होने वाली प्रक्रिया नहीं है. उत्तराखंड में इस परिवर्तन की नींव अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौरान पड़ गई थी. उत्तराखंड राज्य गठन के बाद इस दिशा में तेजी आई है. लेकिन सरकारें जाने-अनजाने इसकी अनदेखी करती रहीं. प्रदेश में यह परिवर्तन दो तरह का है. देहरादून, हरिद्वार एवं उधमसिंह नगर जैसे जिलों में बाहरी प्रदेशों से लोग विभिन्न कारणों से आ बसे हैं. यह प्रक्रिया सामान्य है, लेकिन एक समुदाय विशेष के लोग इन जिलों के क्षेत्र विशेष में जमीन खरीद कर या अतिक्रमण कर भी बड़ी संख्या में बसे हैं. इस कारण वहां पहले से बसे लोगों ने अपनी भूमि औने-पौने दामों पर बेच कर अन्यत्र बसना उचित समझा. अब इन जिलों के कुछ क्षेत्रों में मिश्रित जनसंख्या के बजाय समुदाय विशेष की किलेबंदी जैसी दिखने लगी है. सीमांत राज्य उत्तराखंड में नियोजित या अनियोजित ढंग से हो रहा जनसांख्यिकीय बदलाव बड़े खतरे की आहट है. देश एवं राज्य हित चाहने वाला कोई भी व्यक्ति इसे नकार नहीं सकता. उत्तराखंड गठन के बाद से कांग्रेस व भाजपा की सरकारें आईं और गईं, लेकिन इस आहट को सुनने में नाकाम रहीं या सियासी लाभ के लिए जानबूझ कर नकारती रही हैं. अब जब स्थिति विकट होने के कगार पर है, तब भी सरकार जिला प्रशासन एवं पुलिस को सतर्क रहने तक की ही हिदायत दे पाई है. जिसमें जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की मांग की थी. 2021 के विधानसभा सत्र के दौरान भी प्रदेश में जनसांख्यिकीय बदलाव का मुद्दा सदन में उठा था. इसके बाद बीजेपी और आरएसएस के तमाम बड़े नेताओं ने इस मामले को लेकर एक बैठक की थी. आरएसएस से जुड़े संगठनों का कहना है कि देहरादून, हरिद्वार, उधम सिंह नगर और नैनीताल जैसे जनपदों में बीते कुछ सालों में तेजी से मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि हुई है.उत्तराखंड में आ रहे डेमोग्राफिक बदलाव के लिए सबसे बड़ा कारण माना गया, बाहरी लोगों और उनमें भी खासकर समुदाय विशेष की घुसपैठ को. मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इसे लेकर कई बार गंभीर रूप से चिंता जता चुके है. लेकिन इसके बावजूद भी घुसपैठियों की आमद थम नहीं रही है. आखिर इतनी बड़ी तादाद में प्रदेश में ‘घुसपैठियों’ के आने की बड़ी वजह क्‍या है और कौन इन्‍हें शह या ऐसा करने की वजह दे रहा है, उत्तराखंड में प्रदेश भर में खोले गए कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए 100 से अधिक सरकारी सेवाएं संचालित की जाती हैं, जिनमें आधार, पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आय प्रमाण पत्र, जाति प्रमाण पत्र जैसे दस्तावेज बनाना या अपडेट करना भी शामिल है. इन्ही कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए कई जगह बड़ा गड़बड़झाला हो रहा है. इन्हीं में से एक है सहसपुर ब्लॉक के खुशहालपुर पंचायत का घमोला कॉमन सर्विस सेंटर. इस सेंटर पर आरोप है कि मार्च में यहां से परिवार रजिस्टर की छह फर्जी नकलें जारी की गई.. जिसमें 24 लोगों का नाम शामिल था. स्कू्टनी के दौरान पकड़ में आई इस गड़बडी को ग्राम पंचायत विकास अधिकारी ने निरस्त कर दिया..इस फर्जीवाड़े की रिपोर्ट मार्च में ही पुलिस से लेकर प्रदेश भर में कॉमन सर्विस सेंटर चलाने वाली एजेंसी सीएससी ई-गर्वनेंस सर्विस इंडिया लिमिटेड को भी दे दी गई थी.. लेकिन ताज्जुब की बात है कि डेढ़ महीने बाद भी कोई एक्शन नहीं हुआ. फर्जीवाडे का खुलासा करने के बाद सोमवार को एजेंसी हरकत में आई और तत्काल प्रभाव से इस कॉमन सर्विस सेंटर की आईडी ब्लॉक कर दी गई.प्रदेश में ऐसे ही फर्जी राशन कॉर्ड, परिवार रजिस्टर की नकल, आधार कार्ड, वोटर आईडी का फायदा उठाकर बॉर्डर इलाकों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हो रही है..लोग रातों-रात उत्तराखंड के स्थाई निवासी बन जा रहे हैं. यही कारण है कि सीएम को अब जिलाधिकारियों को व्यापक लेवल पर सत्यापन अभियान चलाने के निर्देश देने पड़े हैं. प्रदेश में ऐसे ही फर्जी राशन कॉर्ड, परिवार रजिस्टर की नकल, आधार कार्ड, वोटर आईडी का फायदा उठाकर बॉर्डर इलाकों में बड़े पैमाने पर घुसपैठ हो रही है..लोग रातों-रात उत्तराखंड के स्थाई निवासी बन जा रहे हैं. यही कारण है कि सीएम को अब जिलाधिकारियों को व्यापक लेवल पर सत्यापन अभियान चलाने के निर्देश देने पड़े हैं. देवभूमि उत्तराखंड में समुदाय विशेष की नियोजित बसावट को रोका जाना क्यों जरूरी है, इसके तीन ठोस आधार हैं. सबसे पहले देवभूमि के मूल स्वरूप को बचाना आवश्यक है. देवभूमि के मूल चरित्र के कारण जो कभी यहां आए भी नहीं, वे भी इस स्वरूप को संरक्षित रखना चाहते हैं. वहीं, जो भौतिकवादी सोच के लोग हैं, वे भी राज्य की आर्थिकी के लिए इस स्वरूप को कायम रखना चाहते हैं. क्योंकि सब जानते हैं कि उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग की रीढ़ तीर्थाटन ही है.धर्मनगरी हरिद्वार जिले में जनसांख्यिकीय संतुलन तेजी से बदल रहा है. हरिद्वार शहर विधानसभा क्षेत्र को छोड़कर बाकी सभी विधानसभा सीटों में समुदाय विशेष की आबादी की दर बढ़ रही है. जिले की कुल आबादी में करीब 37.39 फीसदी समुदाय विशेष की हो गई है. आबादी के साथ धार्मिक शिक्षा संस्थान और इबादत स्थल बनने से हिंदू संगठनों की ओर से अक्सर विवाद भी होता है. पर्वतीय क्षेत्र में भी जनसांख्यिकी में धीरे-धीरे बदलाव होना शुरू हो गया है. अल्मोड़ा में बाहरी हिस्सों से लोग पहुंच रहे हैं. भवन और जमीन खरीदकर यहीं रहने लगे हैं. ऐसे लोगों पर खुफिया एजेंसियां भी नजर बनाए हुए हैं. अल्मोड़ा नगर क्षेत्र का ही उदाहरण लें तो पिछले पांच सालों में बाहर से आए लोगों की बसासत में करीब 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. अल्मोड़ा नगर में पूर्व तक पालिका क्षेत्र में ऐसे लोगों की संख्या छह से सात हजार के करीब थी. एलआईयू से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक पिछले पांच सालों में विशेष वर्ग के लोगों की संख्या करीब एक हजार से डेढ़ हजार तक बढ़ी हैं. ये लोग यहां रोजगार की तलाश में आते हैं और कुछ समय बाद यहीं भूमि और मकान खरीदकर स्थायी रूप से बस रहे हैं. नैनीताल में पहाड़ के अलावा मैदानी इलाकों में समुदाय विशेष के लोगों ने जमीनें खरीदी हैं. उत्तर प्रदेश के बरेली, रामपुर, पीलीभीत और मुरादाबाद के लोगों ने यहां आकर घर बना लिए हैं. हल्द्वानी के गौलापार, लामाचौड़, रामनगर और कालाढूंगी क्षेत्र में विशेष समुदाय ने जमीनें खरीदीं हैं. वन क्षेत्र बागजाला में पहले जहां दो मकान थे. अब बड़ी बस्ती विशेष समुदाय की स्थापित हो गई है. रहमपुर, बरेली, मुरादाबाद, पीलीभीत से विशेष समुदाय के लोग आकर किराए के कमरे में रह रहे हैं और वहीं कुछ लोगों ने अपने मकान बना लिये हैं. उत्तराखंड सरकार ने मैदानी व पहाड़ी जिलों में हो रहे जनसांख्यिकीय परिवर्तन को लेकर जिला प्रशासन को सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं. जिला व पुलिस प्रशासन को जिला स्तरीय समितियों के गठन, अन्य राज्यों से आकर बसे व्यक्तियों के सत्यापन और धोखा देकर रह रहे विदेशियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं.सरकार के इस कदम का एक और ठोस आधार देश की सीमाओं की सुरक्षा भी है. नेपाल एवं चीन की सीमा से लगने वाले इस राज्य की सीमाओं में मूल निवासियों के पलायन को रोकना जितना जरूरी है, उतना ही तर्कसंगत बाहर से आकर बसने वालों की स्क्रीनिंग करना भी है. इस राज्य के सीमांत जिलों के हर गांव-परिवार के स्वजन सीमाओं पर सैनिक के रूप में तैनात हैं. जो गांवों में हैं वे बिना वर्दी के समर्पित सैनिक हैं. इनकी भूमिका को सेना द्वारा सराहा जाता रहा है. इन क्षेत्रों में सुनियोजित बाहरी बसावट की ओर यूं ही आंख मूंद कर नहीं बैठा जा सकता है. पहले लव जिहाद, फिर लैंड जिहाद और अब जनसांख्यिकीय बदलाव यानी डेमोग्राफिक चेंज के मामले देवभूमि में चर्चा में आ गए हैं. इससे उत्तराखंड के समाज में तमाम तरह की शंका-आशंका घर कर रही है. प्रदेश की स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो हरिद्वार, उधमसिंह नगर, देहरादून एवं नैनीताल ऐसे जिले हैं, जहां जनसांख्यिकीय बदलाव देखने में आ रहा है. प्रदेश में डेमोग्राफिक चेंज को लेकर जो बातें कही जा रही है उसको लेकर ये सबसे बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है 2011 के बाद कोई बड़ी जनगणना नहीं हुई। *लेखक विज्ञान व तकनीकी विषयों के जानकार दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।*

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